कीट के आक्रमण की आंशका गन्ना छिद्रक के प्रकोप से ग्रस्त फसल कीट की समय पर रोकथाम हेतु इसकी पहचान, जीवनचक्र, संक्रमण समय, क्षति के लक्षण और प्रबंधन के उपाय की जानकारियां गन्ना उत्पादक को होनी अति आवश्यक हैं। अधिक दिनों तक लगातार भारी वर्षा, फसल में जल-जमाव की स्थिति, उच्च तापमान और उच्च आपेक्षिक आर्द्रता होने पर इस कीट के आक्रमण की आशंका काफी प्रबल हो जाती है। कीट की पहचान इस कीट की चार अवस्थाएं होती हैं। जो अंडा, लार्वा, प्यूपा एवं वयस्क हैं। अंडा ताजा अंडा आकार में चपटा तथा मटमैले सफेद रंग का होता है। अंडे के ऊपर हल्के रंग की झलक होती है। एक अंडे का औसत व्यास 0.5 मि.मी. होता है। अंडा समूहों की लंबाई 8-10 मि.मी. तथा चौड़ाई 2-4 मि.मी. तक होती है। ये अंडे 2-4 की पंक्तियों में खपरैल की छत के आकार में ऊपर की पहली से तीसरी खुली पत्तियों के नीचे स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते हैं। लार्वा नवनिर्मित लार्वा का शरीर अत्यधिक बालों से घिरा रहता है और गहरा भूरा रंग लिए होता है। सिर चौड़ा एवं शरीर के अन्य भागों की अपेक्षा गाढ़े भूरे रंग का होता है। इसकी लंबाई 1.5 मि.मी. तथा चौड़ाई 0.5 मि.मी. होती है। काले बिंदुओं की चार पंक्तिया एक-दूसरे के समानांतर सारे शरीर पर लंबवत रहती हैं। लार्वा के शरीर का आकार बढ़ने पर इन बिंदुओं की पंक्तियां अधिक स्पष्ट होती जाती हैं। पूर्ण विकसित लार्वा 25-30 मि.मी. लंबा एवं 3-4 मि.मी. चौड़ा होता है। लार्वा की पीठ पर चार गुलाबी रंग की स्पष्ट धारियां दिखाई देती हैं, जिसमें से दो उपपृष्ठीय तथा दो आधारीय होती हैं। लार्वा के आकार में अंतर जलवायु के परिवर्तन पर आधारित होता है। प्यूपा प्यूपा, प्राथमिक अवस्था में हल्के बादामी रंग का होता है, जो 4-8 दिनों के पश्चात गहरे बादामी रंग में परिवर्तित हो जाता है। नर एवं मादा प्यूपा के आकार में काफी अंतर होता है। नर प्यूपा की लंबाई 10-12 मि.मी. और मादा की 15-17 मि.मी. होती है। सिर के अग्र भाग पर दो काइटिनिक प्रक्षेप ऊपर की ओर उठे रहते हैं। पांचवें, छठे और सातवें उदरीय खंडों को कांटे घेरे रहते हैं, जो पांचवें तथा छठे खंड पर अधूरे तथा सातवें खंड पर पूर्ण वृत्त बनाते हैं। सभी कांटे द्विविभाजित तथा अत्यधिक सख्त होते हैं। वयस्क कीट नर वयस्क कीट (तितली) मादा से छोटे तथा रंग में गाढ़े होते हैं। पंख फैलावस्था में नर का आकार 21-26 मि.मी. तथा मादा का 28-31 मि.मी. होता है। अग्र पंख दालचीनी या हल्का पीलापन लिए हुए बादामी रंग के होते हैं। काले रंग के बहुत से धब्बे पंख के समस्त भाग पर फैले रहते हैं। पिछला पंख श्वेत होता है, परंतु नर वयस्क के पंखों के पिछले भाग में कुछ हल्के भूरे रंग के धब्बे होते हैं। प्यूपा अवस्था सितम्बर-अक्टूबर में 18-26 दिनों की होती है, परंतु प्यूपा अवस्था वातावरण परिवर्तन के साथ परिवर्तित भी हो सकती है। जुलाई से अक्टूबर में वायुमंडल का उच्चतम तापमान 29-350 सेल्सियस तथा आपेक्षिक आर्द्रता 59-83 प्रतिशत होती है। उस समय में इस कीट का एक जीवन-चक्र 44-83 दिनों में पूर्ण होता है। क्षति के लक्षण गन्ने के खेत में इस कीट की उपस्थिति का संकेत गन्ने के पुंजों में कुछ गन्नों के शिखर सूखे होने पर मिलता है। ग्रसित गन्ने के तनों का निकट से निरीक्षण करने पर दो प्रकार के अलग-अलग प्रकोप का स्पष्ट रूप से पता चल जाता है, जिसको प्राथमिक तथा द्वितीय आक्रमण कहते हैं। प्राथमिक आक्रमण गन्ने की तीन से चार गुल्लियों (पोर) के बीच नवनिर्मित लार्वा किसी एक गुल्ली में इकट्ठे होकर अंदर ही अंदर गन्ने को ग्रिसत करते रहते हैं। ऐसी गुल्लियों को चीरकर देखा जाये तो लार्वा की संख्या 15-20 तक हो सकती है। ग्रसित गुल्लियों के छिद्रों से ताजा कीट मल गीला तथा चमकीले रंग का बाहर निकलता हुआ दिखाई देता है। ग्रसित गन्नों की ऊपरी पत्तियां कुछ समय बाद पूर्ण रूप से सूख जाती हैं। गन्ने की ग्रसित गुल्लियां इस प्रकार छिद्रित हो जाती हैं कि तनों को थोड़ा सा झटका देने पर अथवा तेज हवा चलने पर ये आसानी से टूटकर गिर जाते हैं। द्वितीय आक्रमण इस प्रकोप में विकसित पिल्लुओं द्वारा आसपास के स्वस्थ पौधों या प्राथमिक ग्रसित पौधों के निचले स्वस्थ भागों को दोबारा ग्रसित किया जाता है। इसमें ग्रसित पौधों के अगोले नहीं सूखते हैं। द्वितीय प्रकोप की स्थिति का जायजा निम्न लक्षणों से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता हैः पिल्लुओं का मल लकड़ी के बुरादे के आकार में प्रचुर मात्रा में ग्रसित पौधों से छिद्रों में निकलता रहता है। पौधे हरे रंग के दिखाई देते हैं। अत्यधिक क्षतिग्रस्त पौधों का ऊपरी भाग हवा के झोकों से सरलतापूर्वक नहीं टूटता है और पौधों का अगोला नहीं सूखता है। पिल्लुओं के अधिक संख्या में एक स्थान पर एकत्रित होकर पौधों को ग्रसित करने से कई प्रवेश छिद्रक(6-10) एक ही पोरी में पाये जा सकते हैं। जीवन चक्र गन्ना छिद्रक कीट के प्रौढ़ रात्रिचर होते हैं। प्रौढ़ कीटों का बनना गोधूलि से प्रारंभ हो कर अर्धरात्रि तक चलता रहता है। यह सक्रियता 8-11 बजे रात्रि में होती हैं। इस कीट के प्रौढ़ अत्यन्त ही प्रकाश धनात्मक होते हैं और प्रकाश पर सरलता से आकर्षित होते हैं। मादा द्वारा अंडे 2-4 की पंक्तियों में ऊपर की पहली से तीसरी पत्तियों की निचली सतह पर समूहों में दिये जाते हैं। एक मादा कीट एक ही रात्रि में 3-4 अंड समूहों का अवपात कर देती है। प्रत्येक अंडे के समूह में 80-250 अंडे हो सकते हैं। मादा अपने पूरे जीवनकाल में 4-5 अंड समूहों में 800 अंडे तक भी दे सकती है। अंडों से लार्वा बनने की अवधि यद्यपि 7-11 दिनों की होती है, परंतु अधिकांश अंडे 8 दिनों में फूट जाते हैं। अंडों से लार्वा बनने का क्रम प्रातःकाल होता है, जो एक ही अंड समूह में 2-3 दिनों तक चलता रहता है। इस कीट के नवनिर्मित लार्वा व्यवहार में संगठित तथा चलने-फिरने में आलसी होते हैं। एक अंड समूह के समस्त लार्वा गन्ने की फसल के अधिक प्रकाशमय किनारे की तरफ जाते हैं। वे 15-20 के झुंड में इकट्ठा होकर पत्तियों की सतह पर खाते रहते हैं। पत्तियों की सतह पर खाते हुए चलते-चलते पर्णच्छद (लीफशीथ) की भीतरी सतह पर पहुंच कर तने के अंदर प्रविष्ट कर जाते हैं। इसके पश्चात लार्वा का झुंड ऊपर की पोरियां (गुल्लियों) में एक या कई छिद्रों के द्वारा तने के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। लार्वा के झुंड लगभग 10 दिनों तक संगठित अवस्था में रह कर अलग-अलग गन्ने को ग्रसित कर क्षति पहुंचाते रहते हैं। इस कीट की यही लार्वा अवस्था गन्ने को क्षति पहुंचाती है। क्षति की सीमा इस कीट का फरवरी-मार्च में रोपे गए गन्नों एवं पेड़ी फसल की अपेक्षा अक्टूबर में रोपे गए गन्ने में अधिक प्रकोप देखा गया है। इसके प्रकोप से गन्ने के विभिन्न प्रभेदों में 25-85 टन प्रति हैक्टर तक पैदावार में कमी हो सकती है। चीनी की उपलब्धता में भी 3-25 प्रतिशत तक कमी हो सकती है। क्षति की अनुकूल परिस्थितियां मध्यम से उच्चतम तापमान तथा उच्च आर्द्रता, जो जुलाई से सितम्बर तक पाई जाती है, इस छिद्रक कीट की वृद्धि के लिए उपयुक्त होती है। चिकनी मिट्टी, जल जमाव तथा बाढ़ से आक्रान्त गन्ने की फसल जिससे वातावरण में आर्द्रता बढ़ती है, इस कीट की वृद्धि के लिए सहायक होती है। पेड़ी फसल में इस कीट का अत्यधिक प्रकोप देखा गया है। समेकित प्रबंधन गन्ने के खेत का निरीक्षण समय-समय पर अवश्य करते रहें। यदि जल जमाव की स्थिति दिखाई दे तो अविलंब जल निकास की व्यवस्था करें। एकल फसल प्रणाली नहीं अपनानी चाहिए। रोपण के समय दो कतारों के बीच की दूरी 90 सें.मी. से कम नहीं रखें। फसल में नाइट्रोजन की अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन की अधिक मात्रा देने पर फसल की अनावश्यक बढ़वार होती रहेगी और फसल गिरने की आशंका बन सकती है। ऐसी स्थिति बनने पर कीट के आक्रमण की आशंका प्रबल हो सकती है। गन्ने की पत्तियों पर यदि अंडे नजर आयें तो उनको पत्तियों समेत नष्ट कर दें। इसके साथ ही प्रकाश पाश खेत के पास लगा दें। ऐसा करने से वयस्क कीट प्रकाश चर होने के नाते प्रकाश पाश के द्वारा एकत्रिात किए जा सकते हैं। फलस्वरूप कीट की वृद्धि रुक जायेगी, जिससे फसल सुरक्षित हो सकती है। एक हैक्टर में तीन से चार प्रकाश पाश लगाये जा सकते हैं। प्रयास रहे कि प्रकाश पाश का वितरण फसल में समान रूप से हो एवं इसकी ऊंचाई सदैव ऊपर रहे, ताकि प्रकाश कीटों को दिखाई दे सके। यदि इस कीट का आक्रमण हो गया है तो अविलंब ग्रसित गन्नों को काटकर एक स्थान पर एकत्रित कर नष्ट कर देना चाहिए। अत्यधिक प्रकोप होने पर कटाई का कार्य साप्ताहिक अंतराल पर करते रहना चाहिए ताकि इस कीट की वृद्धि को रोका जा सके। परिणामों से यह निष्कर्ष निकल कर आया है कि रासायनिक नियंत्रण इस विनाशकारी कीट के लिए कम प्रभावी है। प्राकृतिक शत्रु, जो इस कीट के अंडे एवं लार्वा को ग्रसित करते पाये गए हैं, उनमें ट्राइकोग्रामा किलोनिस प्लासी छिद्रक के अंडों का प्रभावी परजीवी है। ‘अपेन्टेलेस प्लौविपस’ इस कीट के लार्वा का परजीवी है। इस प्रकार इन दोनों परजीवियों के प्रयोग करने से इस कीट के प्रकोप को काफी हद तक रोका जा सकता है। गन्ना फसल में अंतर-फसलचक्र के लिए संशोधित ट्रेंच श्री जबरपाल सिहं सपुत्रु श्री कहेरी सिहं, निवासी करनपुर गांव, मीरगंज ब्लाकॅ, बरेली, उत्तर प्रदेश द्वारा पारपंरिक विधि से गन्ना की खेती की जाती थी। इन्होनें ट्रेंच ओपनर का उपयोग करते हुए अंतर-फसलों के साथ गन्ना रोपाई की ट्रेंच विधि को अपनाया। ट्रेंच ओपनर द्वारा हटाई गई मृदा असमतल हुई जिससे अंतर फसल की बुआई के लिए बीज क्यारियां तैयार करने हेतु 20-25 अतिरिक्त श्रमिकों की आवश्यकता पड़ी। इसमें बीज क्यारियों में सुधार करने में समय लगता है, इसलिए उसमें से नमी समाप्त हो गई जिससे कि अतंर-फसल का अंकुरण प्रभावित हुआ। श्री सिहं द्वारा ट्रेंच ओपनर को संशोधित किया गया। एक लेवलिंग अटेचमेंट के साथ 120 से 180 से.मी. का समायोज्य अंतराल रखा गया, जो कि अंतर-फसलों के लिए बीज क्यारियां बनाता है। शाकीय मटर, आलू, टमाटर, फूलगोभी, बदंगोभी, मसूर और सरसों जैसी अंतर-फसलों की समय से बुआई करने पर मृदा मेंउपलब्ध नमी का उपयोग सुनिश्चित किया गया। गन्ना रोपाई की ट्रेंच विधि से जहां गन्ना की उपज तिगुनी, वहीं इससे अंतर-फसल की अतिरिक्त उपज भी हासिल हुई। वर्तमान में बरेली क्षेत्र में 25 प्रतिशत से अधिक गन्ने की खेती ट्रेंच विधि से की जाती है। समायोज्य ट्रेंच ओपनर द्वारा दो ट्रेंच के बीच में120 से180 से.मी. तक आवश्यकता अनसुार स्थान बढ़ाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है और इससे प्रति हैक्टेर लगभग 20-25 श्रमिकों की बचत हुई है। लेवलर समायोजन से समय पर बीज क्यारियों को तैयार करने में मदद मिलती है। इससे मृदा की नमी का सरंक्षण करते हुए तुरंत बुआई में समय एवं श्रमिक की बचत होती है। इनके फार्म का दौरा करने वाले किसानों और इनके व्हाटस्एप्प ग्रुप के सदस्यों ने लेवलर के साथ इस संशोधित समायोज्य ट्रेंच ओपनर को अपनाया। स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर),हरी चन्द, अनिल कुमार और नागेन्द्र कुमार कीट विज्ञान विभाग, गन्ना अनुसंधान एक,डा. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर-848125 (बिहार)