भारतीय आहार में खाद्य तेल की महत्वपूर्ण भूमिका है। खाद्य तेल, ऊर्जा के समृद्ध स्रोत होते हैं और ये अत्यावश्यक वसीय अम्ल के संघटक भी हैं। इसके साथ ही खाने को स्वादिष्ट भी बनाते हैं। लगातार बढ़ रही जनसंख्या, परिवर्तनशील खानपान प्रवृतियों और साथ ही उपभोक्ता की बढ़ती क्रयशक्ति के कारण हमारे देश में खाद्य तेल की मांग में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। मौजूदा आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2030 में खाद्य तेल की अनुमानित मांग 34 मिलियन मीट्रिक टन होने की संभावना है। वर्तमान में आयात (लगभग 60-70 प्रतिशत) करके खाद्य तेलों की घरेलू मांग को काफी हद तक पूरा किया जाता है। इस स्थिति में बदलाव लाने की जरुरत है। वर्ष 2030 तक भारत में खाद्य तेल की समस्या का समाधान करने के लिए अनुसंधान जरुरतों, नीतिगत सहयोग तथा अन्य संबंधित मुद्दों को यहाँ प्रस्तुत किया गया है। घरेलु उत्पादन बहुत कम भारत, विश्व में वनस्पति तेलों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है और काफी हद तक खाद्य तेलों के आयात पर निर्भर है। खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन का स्तर मांग की तुलना में बहुत कम है। आयातित खाद्य तेलों में तेल-ताड़ का हिस्सा सबसे अधिक है, जो कि कुल खाद्य तेलों का लगभग 60 प्रतिशत है। इसका मुख्य कारण तेल-ताड़ की उच्च उपज क्षमता और प्रति इकाई क्षेत्रफल तेल उत्पादन की सस्ती दर का होना है। इसके अलावा तेल-ताड़ उत्पादन के अनेक लाभ हैं लाभ यह उच्चतम तेल उत्पादन (अन्य तिलहनी फसलों के मुकाबले 4 गुना अधिक) वाली एक बारहमासी फसल है। इसका आर्थिक जीवनकाल 30 वर्ष तक होता है। नाशीजीवों व रोगों के प्रति कम संवेदनशील खाद्य एवं गैर-खाद्य क्षेत्रों दोनों में अनेक उपयोग हैं, जो कि इसे एक अनूठी फसल बनाते हैं। तेल-ताड़ के लाभ आमतौर पर लोगों का यह मानना है कि तेल-ताड़ स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। इसमें संतृप्त वसा का अधिक स्तर पाया जाता है। तेल-ताड़ के फलों से दो प्रकार का तेल तैयार किया जाता है : मिसोकॉर्प से कच्चा तेल-ताड़ तथा आंतरिक गुठली से ताड़-गुठली तेल। कच्चे तेल-ताड़ को लाल तेल-ताड़ भी कहा जाता है। यह विटामिन ई (600-1000 पीपीएम} को-एंजाइम क्यू 10 (18-25 मि.ग्रा./कि.ग्रा.) तथा स्टेरॉल्स (325-365 मि.ग्रा./कि.ग्रा.) का समृ) स्रोत है। तेल-ताड़ में प्रमुख वसा अम्ल हैं: मेरीस्टिक, पॉमीटिक, स्टीयरिक, ऑलिक तथा लिनोलिक। इसमें अनूठा वसा अम्ल तथा ट्राइग्लाइसिरॉल प्रोफाइल है। यह कई खाद्य अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त बनाता है। यह एक अकेला ऐसा वनस्पति तेल है, जिसमें संतृप्त एवं असंतृप्त वसा अम्लों का 50:50 प्रतिशत संयोजन होता है। कच्चे तेल-ताड़ का इस्तेमाल खाना पकाने, तलने तथा विटामिन स्रोत के रूप में किया जाता है। मिसोकॉर्प से कच्चे तेल-ताड़ का विखंडीकरण करने से मुख्यतः ताड़ ऑलिन (तरल भाग) तथा ताड़ स्टीयरिन (ठोस भाग) उत्पन्न होता है। तेल-ताड़ में संतृप्त पशु वसा और अत्यधिक असंतृप्त वनस्पति तेलों के बीच वाली एक अंतर-मध्यस्थ स्थिति होती है। इसमें पॉली असंतृप्त वसा अम्ल (पीयूएफए), लिनोलिक (10 प्रतिशत) का संतुलित स्तर और पॉमीटिक अम्ल (48 प्रतिशत) तथा ऑलिक अम्ल (38 प्रतिशत) का उच्च स्तर पाया जाता है। उच्च संतृप्त वसा अम्ल मौजूद होने के कारण इसमें खाना तलने के लिए उच्च ऑक्सीकारक स्थिरता और उपयुक्तता पाई जाती है। तेल-ताड़ की बीटा कैराटिन मात्र विटामिन-ए की कमी को पूरा करने में महत्वपूर्ण होती है। इसमें पेट का कैंसर, मुख का कैंसर, पफैरिनगील तथा फेफड़ों के कैंसर जैसे रोगों के विरू) सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता होती है। तेल की व्यावसायिक, कार्यपरक, पोषणिक तथा तकनीकी विशेषताओं में सुधार लाने और उनमें संवृद्धि करने के लिए कहीं अधिक असंतृप्त अथवा एकल-असंतृप्त तेलों के साथ तेल-ताड़ को मिलाना एक बेहतर विकल्प है। उत्पादन और मांग का अंतर वर्तमान में भारत में तेल-ताड़ की खेती 0.331 मिलियन हैक्टर कृषि क्षेत्र में की जाती है। यह देश में कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रलय द्वारा चिन्हित कुल क्षमताशील कृषि क्षेत्र का केवल 16.3 प्रतिशत ही है। भारत की कुल खाद्य तेल मांग लगभग 25 मिलियन मीट्रिक टन है। इसमें घरेलू उत्पादन का योगदान मात्र 9 मिलियन मीट्रिक टन है। शेष 15-16 मिलियन मीट्रिक टन की पूर्ति आयात के माध्यम से की जाती है। इसका मूल्य लगभग 70-75 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष है। यह भारत के कुल आयात का लगभग 2.5 प्रतिशत है। तेल-ताड़ पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमओओपी) इस अंतर को कम करने के लिए 'तिलहन एवं तेल-ताड़ पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमओओपी)' के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा देश के सभी राज्यों में वर्ष 2017 के 34 मिलियन मीट्रिक टन के मौजूदा स्तर को वित्त वर्ष 2022 तक 42 मिलियन मीट्रिक टन तक उत्पादन के लिए तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने में नीतिगत सहयोग और लक्ष्य की दिशा में तेल-ताड़ की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे देश में कुल खाद्य तेल खपत में आयात को वित्त वर्ष 2017 में लगभग 60 प्रतिशत से वित्त वर्ष 2022 तक लगभग 55 प्रतिशत तक कम करने में मदद मिल सकती है। बढ़ रही जनसंख्या और उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति में बढ़ोतरी के साथ यह अपेक्षा की जाती है कि भविष्य में भारत में खाद्य तेल की मांग बढ़ने की संभावना है। वर्तमान में भारत में प्रति व्यक्ति खपत वर्ष 2017-18 के लिए 18 कि.ग्रा. है, जो कि विश्व में प्रति व्यक्ति खपत (25 कि.ग्रा.) (यूएसडीए 2018) की तुलना में कम है। इसलिए वर्ष 2030 में मांग व आपूर्ति के बीच अंतर के बढ़ने की अधिक आशंका है, जिसे पाटने के लिए और सकेन्द्रित प्रयास करने की जरुरत है। तेल-ताड़ विकास परियोजना (ओपीडीपी) वर्ष 1970 के दशक में भारत में व्यावसायिक खेती के रूप में तेल-ताड़ की खेती प्रारंभ की गई थी। वर्ष 1972 से 1984 के दौरान प्रारंभ में दो स्थानों केरल और अंडमान में संगठित तरीके से तेल-ताड़ की खेती को प्रारंभ किया गया। इस फसल के लिए क्षमताशील 11 राज्यों में लगभग 0.79 मिलियन हैक्टर की पहचान करने के बाद सिंचित तेल-ताड़ की संकल्पना विकसित की गई। वर्ष 1990 के दौरान 1000 हैक्टर 'प्रत्येक' की तीन प्रदर्शन इकाइयां स्थापित की गईं। इसके बाद तिलहन और दलहन पर प्रौद्योगिकी मिशन द्वारा तेल-ताड़ विकास परियोजना (ओपीडीपी) को कृषि मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा लागू किया गया। वर्ष 2011 में कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्राालय, भारत सरकार द्वारा डा. रथिनम की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा 18 राज्यों में 1.93 मिलियन हैक्टर क्षमताशील कृषि क्षेत्रों की पहचान की गई थी। पहचाने गए कुल क्षमताशील क्षेत्र में से मार्च, 2018 तक केवल 16.37 प्रतिशत (0.331 मिलियन हैक्टर) को ही शामिल किया जा सका है (कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग) और राज्यों के बीच केवल गोवा और मिजोरम में संभावित क्षमता का क्रमशः 89, 48 एवं 45 प्रतिशत ही शामिल किया जा सका। उत्पादकता का वर्तमान स्तर एवं सुधार की रणनीतियां पिछले सात वर्षों के दौरान, राष्ट्रीय स्तर पर ताजा फल गुच्छा (एफएफबी) की उपज प्रति हैक्टर 4.31 से 6.12 टन थी (आर्थिकी एवं सांख्यिकी निदेशालय, भारत सरकार), जो कि अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है। इस दौरान देश की औसत उपज में लगातार सुधार देखने को मिला है। जब हम विभिन्न राज्यों में औसत उपज पर एक नजर डालते हैं तब हमें पता चलता है कि आंध्रप्रदेश, केरल, तेलगांना व गोवा न ने जहां लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है, वहीं अन्य प्रदेश ऐसा नहीं कर सके हैं। उच्च उत्पादन हासिल करने की रणनीतियां तेल-ताड़ की खेती में गर्मियों में प्रतिदिन प्रति ताड़ 215-265 लीटर जल और वर्षाकाल में 160-170 लीटर जल की जरुरत होती है। कुछ उत्पादक इसलिए अधिक मात्र में सिंचाई करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि सिंचाई के उच्चतर स्तर को अपनाकर उच्च उत्पादन हासिल किया जा सकता है। वास्तव में अत्यधिक सिंचाई करना हानिकारक होता है। इससे जड़ों के सक्रिय क्षेत्र से पोषक तत्वों का रिसाव हो जाता है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली तथा ऑटोमेशन के माध्यम से जल का न्यायोचित प्रबंधन करने पर जल की सटीक मात्राा का उपयोग करने में मदद मिलती है, जिससे काफी मात्र में जल की बचत की जा सकती है। इस जल मात्र का उपयोग अन्य फसलों में किया जा सकता है। जैविक अपशिष्ट के साथ ताड़ बेसिन में पलवार बिछाने और ढलान के बीच खाई बनाने जैसी जल संरक्षण तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। पुनः संस्तुत मात्र से अधिक मात्र में उर्वरकों का प्रयोग करने से खेती की लागत बढ़ती है। इससे मृदा में असंतुलन भी पैदा होता है और निश्चित पोषक तत्वों का अंतर्ग्रहण प्रभावित होता है। मृदा एवं पत्ती पोषक तत्व विश्लेषण पर आधारित पोषक तत्व प्रबंधन करने से उर्वरकों की सटीक अथवा परिशु) मात्र का उपयोग करने में मदद मिलती है। गोवा, आंध्रप्रदेश, मिजोरम, कर्नाटक, गुजरात एवं तमिलनाडु राज्यों के लिए नैदानिकी एवं संस्तुत एकीकृत प्रणाली (डीआरआईएस) मानक उपलब्ध हैं। वहां सर्वाधिक कमी वाले पोषक तत्वों की भी पहचान की गई। उर्वरीकरण का पुनः प्रयोग करने से उच्च पोषक तत्व उपयोग प्रभावशीलता के साथ उर्वरकों की लगभग 50 प्रतिशत बचत की जा सकी। तेल-ताड़ की कम उत्पादकता के कारण संसाधन प्रबंधन जल एवं पोषक तत्व दो ऐसे महत्वपूर्ण संसाधन हैं, जिन पर तेल-ताड़ जैसी बारहमासी फसल में विशेष ध्यान देने की जरुरत है। पुष्पीय प्राइमोरडियल प्रारंभ होने पर जल दबाव के कारण लिंगानुपात का निर्धारण होता है और इसके कारण ताजा फल गुच्छा उपज प्रभावित होती है। भारत में तेल-ताड़ की खेती अधिकांश सिंचित फसल के रूप में की जाती है। इसकी उच्च वाष्पोत्सर्जन मांग के कारण वर्षभर लगातार सिंचाई करने की जरुरत होती है। महाराष्ट्र में पश्चिमी तटीय क्षेत्र लगभग 5 महीनों के लिए सूखा बना रहता है। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में गर्मी के महीनों में शुष्क हवायें चलती हैं। मिजोरम में शुष्क अवधि नवंबर से मार्च के दौरान बनी रहती है। देश के अनेक भागों में कम भूजल क्षमता के कारण लगातार सिंचाई करना संभव नहीं है। तेल-ताड़ में उपयुक्त तरीके से पोषक तत्व प्रबंधन करने की जरुरत होती है। अनुचित रूप से प्रयोग करने से इन पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और इससे उपज में कमी आती है। विभिन्न राज्यों में प्रचलित सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से भी उपज कम होती है। नाइट्रोजन की अधिक मात्राा के साथ उर्वरकों का असंतुलित उपयोग करने से अनेक फलोद्यानों में नाइट्रोजनः पोटेशियम असंतुलन देखने को मिलता है। मृदा लवणता के अलावा, बोरॉन, मैग्नीशियम और पोटेशियम की कमी तेल-ताड़ की खेती करने वाले अनेक क्षेत्रों में अत्यधिक प्रचलित है। जलवायु भिन्नता तेल-ताड़ फसल का प्रदर्शन उच्चतर आपेक्षिक आर्द्रता के साथ उच्च तापमान (400-450 सेल्सियस तक) के अंतर्गत बेहतर होता है। न्यूनतम तापमान वाले क्षेत्रों में थोड़ी कम उपज होने की आशंका होती है। अभी भी अधिकाशं राज्यों में स्थल की क्षमता वास्तविक उपज से बहुत दूर है। इससे इस दिशा में और सुधार करने की व्यापक संभावनाओं का पता चलता है। पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में 3-4 माह तक उच्च तापमान बना रहता है, जबकि भारत के पूर्वी व उत्तर-पूर्वी हिस्सों में कम तापमान बना रहता है। इसके कारण तेल-ताड़ की वृद्धि व विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कम तापमान बने रहने से फूल निकलने पर प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहती है, जिससे कि उपज प्रभावित होती है। आंध्र प्रदेश में विभिन्न जिलों में तेल-ताड़ की औसत उपज में व्यापक भिन्नता देखने को मिलती है। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में बहुत कम उपज दर्ज की गई। इसका कारण गर्मी के महीनों में अपर्याप्त सिंचाई और शुष्क पश्चिमी हवाओं का बने रहना था। कुछ गांवों में फार्म के बीच भी औसत उपज में व्यापक भिन्नता पाई गई। इसका कारण प्रबंधन रीतियों का अलग होना है। अनुसंधान जरुरतें विभिन्न राज्यों में उत्पादन विवरण से पता चलता है कि कुछ क्षेत्रों के किसान प्रति हैक्टर 30-35 टन ताजा फल गुच्छा तक की उपज हासिल कर सके। संस्तुत प्रौद्योगिकी के साथ कर्नाटक का एक किसान प्रतिवर्ष प्रति हैक्टर 53.2 टन ताजा फल गुच्छे की उपज हासिल करने में सफल रहा। इससे संस्तुत एवं वास्तविक अनुकूलन के बीच व्याप्त व्यापक अंतराल का पता चला। यह एक प्रणालीब) फसल सुधार कार्यक्रम है जिसका स्पष्ट उद्देश्य है : (क) उच्चतर ताजा फल गुच्छा उपज( (ख) बौने एवं गठीले पौधे( (ग) सूखा सहिष्णुता( (घ) स्व पात्रो पुनर्जनन। अभी भी संस्तुत प्रबंधन रीतियों को सही तरीके से अपनाकर मौजूदा बगीचों की उपज को बढ़ाने की व्यापक संभावनाएं हैं। योजनाबद्ध दृष्टिकोण एकल फसल के रूप में तेल-ताड़ फसल को उगाना लाभप्रद होता है। हालांकि अंतःस्थल की उपलब्धता तथा साथ ही तेल-ताड़ रोपण में उत्पन्न होने वाले जैविक अपशिष्ट को ध्यान में रखकर तेल-ताड़ के साथ अंतर फसलचक्र को अपनाने पर जोर दिया जाता है। इससे न केवल अधिक लाभ मिलता है वरन् तेल-ताड़ की टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा मिलता है। यह अनुमान है कि तेल-ताड़ में अंतर-फसलचक्र को अपनाने से अकेली फसल की तुलना में 191 से 293 प्रतिशत तक लाभ मिलता है। बेहतर लाभ अर्जित करने के लिए डेयरी, पोल्ट्री, भेड़पालन, बकरीपालन जैसे अन्य उद्यमों को तेल-ताड़ के साथ एकीकृत किया जा सकता है, जिससे तेल-ताड़ की खेती के क्षेत्रफल का विस्तार करने में बढ़ावा मिलता है। आंध्रप्रदेश और मैदानी क्षेत्रों के लिए संस्तुत कुछ अंतर-फसलचक्र मॉडल इस प्रकार हैं: तेल-ताड़ + केला तेल-ताड़+लंबी काली मिर्च+झाड़ीनुमा काली मिर्च तेल-ताड़+लाल अदरक+हेलिकोनियो तेल-ताड़+लंबी काली मिर्च + कर्तित पत्तियां इसी प्रकार, केरल और पर्वतीय इलाकों के लिए भी अंतर-फसलचक्र मॉडल विकसित किए गए। तेल-ताड़ + कोको/दालचीनी + ग्लाइरीसिडिया पर काली मिर्च तेल-ताड़ + एंथुरियम/कचोलम तेल-ताड़ + कीम्फेरिया गैलान्गल लवणता, सूखा, उच्च तापमान एवं कम तापमान के बुरे प्रभावों का मुकाबला करने में जलवायु अनुकूल किस्में एवं प्रौद्योगिकियां एक सिंचित फसल होने के नाते, जलवायु परिवर्तन का तेल-ताड़ फसल पर कहीं अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका होती है। इसके अलावा, पूर्वी तटवर्ती क्षेत्रों में 3-4 माह तक अधिक तापमान बने रहने, पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में 2-3 माह तक कम तापमान बने रहने, एक अल्प अवधि के भीतर भारी वर्षा के कारण कुछ निश्चित क्षेत्रों में बाढ़ आने, कुछ क्षेत्रों में कम वर्षा होने तथा देश के पूर्वी भागों में पाला पड़ने की घटना आम बात है। उपरोक्त परिस्थितियों के अनुकूल रोपण सामग्री और प्रौद्योगिकियां विकसित करने की जरुरत है। प्रभावी संसाधन प्रबंधन तकनीकें सामान्यतौर पर कृषि उत्पादन में और विशेषकर तेल-ताड़ में जल एक महत्वपूर्ण कारक है, इसलिए जल उपयोग प्रभावशीलता बढ़ाने पर अनुसंधान को उच्चतर प्राथमिकता देने की जरुरत है। प्रति टन ताजा फल गुच्छे की जल आवश्यकता को और कम करने की आवश्यकता है, जिसे वाष्पन, रिसाव और अन्य नुकसान में कमी लाकर पूरा किया जाता है। तेल-ताड़ फलोद्यानों से निकलने वाले अपशिष्ट का यदि पलवार और पुनर्चक्रण के लिए सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तब इससे वाष्पन में कमी लाकर तथा मृदा में पोषक तत्वों को मिलाकर जल उपयोग प्रभावशीलता को बढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार सटीक कृषि प्रणाली के माध्यम से प्रभावी पोषक तत्व प्रबंधन तकनीकों को तेल-ताड़ बगीचों में उत्पादकता को बढ़ाने के लिए स्थानिक आयाम के साथ स्वाभाविक विविधता पर बल देने की जरुरत है। देश, राज्य, मंडल, गांव और यहां तक कि एक एकल खेत में भी मृदाओं में व्यापक भिन्नता देखने को मिलती है। उर्वरकों और जल की प्रचलित संस्तुति पोषक तत्व को बेहतर रूप से धारण नहीं करती। इससे कुछ निश्चित पोषक तत्वों की कमी को बल मिलता है, जबकि अन्य में विषाक्तता होती है। जल तथा पोषक तत्वों जैसे महत्वपूर्ण आदानों की परिवर्तनीय दर अनुप्रयोग की तकनीकों को विकसित करने की जरुरत है। कृषि प्रणाली अनुसंधान तेल-ताड़ की खेती से अधिक लाभ हासिल करने के लिए कुछ निश्चित मॉडल विकसित किए गए हैं। अभी भी अन्य संयोजनों के साथ मिलकर कार्य करने की व्यापक संभावनाएं हैं। कृषि प्रणाली युक्ति में पोल्ट्री, भेड़पालन, बकरीपालन, पशुपालन और सूअरपालन आदि जैसे संघटकों को विकसित करने की जरुरत है, जिससे तेल-ताड़ की खेती में टिकाऊपन सुनिश्चित होता है। फार्म यांत्रिकीकरण तेल-ताड़ में ऊंचे ताड़ वृक्ष से तुड़ाई करना एक बड़ी चुनौती माना जाता है। अंतर फसल के साथ और उसके बिना ऊंचे ताड़ वृक्ष में हार्वेस्टर के विकास कार्य को मजबूती प्रदान करने के लिए अनुसंधान की जरुरत है। वर्तमान में ताजा बायोमास की कटाई करने के लिए मशीनें उपलब्ध हैं। उपलब्ध अपशिष्ट बायोमास के पुनर्चक्रण के लिए उपलब्ध मशीनरी में सुधार करने की जरुरत है। मूल्यवर्धन तेल-ताड़ फलोद्यान में ताड़पत्र और नर पुष्पक्रमों के रूप में शुष्क भार आधार पर बायोमास की अधिक मात्र (प्रतिवर्ष प्रति हैक्टर 15-17 टन) उत्पन्न होती है। तेल-ताड़ की खेती में कुल खेती लागत का लगभग 40 प्रतिशत उर्वरकों पर व्यय होता है। इस अपशिष्ट बायोमास के सही तरीके से पुनर्चक्रण करने पर अधिकांश पोषक तत्वों की जरुरत को पूरा किया जा सकता है। इससे आर्थिक और पारिस्थितिकीय लाभ मिलता है। फलोद्यान अपशिष्ट में उपलब्ध सेलुलोज और हेमीसेलुलोज को यदि अलग किया जाए तो यह किसानों के लिए आमदनी का स्रोत बन सकता है। संस्थागत सहयोग खाद्य तेल की लगातार बढ़ रही मांग को पूरा करने के लिए तेल-ताड़ की खेती के अंतर्गत क्षेत्र फसल विस्तार को प्राथमिकता देने की जरुरत है। इसे उत्पाद यथा ताजा फल गुच्छे के लिए एक स्थिर मूल्य क्रियाविधि प्रदान करके हासिल किया जा सकता है। तेल-ताड़ जैसी बारहमासी फसल के लिए, जिसे 25-30 साल तक आर्थिक लाभ के लिए बोया जाता है, मूल्य स्थिरीकरण अत्यधिक अनिवार्य है। ताजा फल गुच्छे की उत्पादन लागत के आधार पर एक स्थिर मूल्य प्रणाली से किसानों अथवा उत्पादकों के बीच विश्वास उत्पन्न होता है। इससे वे तेल-ताड़ फसल के तहत कहीं अधिक क्षेत्रफल में इसका विस्तार करने के प्रति प्रोत्साहित होंगे। स्थिर मूल्य क्रियाविधि के अलावा फसल बीमा योजना का दायरा तेल-ताड़ तक बढ़ाने की जरुरत है। इससे यदि फसल, मौसम प्रतिकूलता अथवा अन्य प्राकृतिक आपदा के कारण प्रभावित होती है, तब किसानों को कुछ राशि मिलने में मदद मिल सकती है। साथ ही तेल-ताड़ फलोद्यानों में कुछ प्रगतिशील किसानों का दौरा कराने की जरुरत है, जो कि संस्तुत रीति पैकेज को अपनाकर अत्यधिक उच्च उपज हासिल कर सकते हैं। ये अन्य किसानों को भी इसी प्रकार की विधियां अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। वर्ष 2030 में भारत में खाद्य तेल की अनुमानित मांग लगभग 34 मिलियन टन होने की संभावना है। देश में खाद्य तेल की मांग और घरेलू उत्पादन के बीच व्याप्त अंतर को कम करने में तेल-ताड़ सर्वाधिक व्यावहारिक विकल्प है। तेल-ताड़ के प्रमुख लाभों में इसकी उच्च उपजशील क्षमता( लंबा आर्थिक जीवन( नाशीजीवों व रोगों का अपेक्षाकृत कम प्रकोप( किसानों को लगातार आय( तथा खेती के अंतर्गत अधिक क्षेत्रफल लाने की अच्छी संभावना शामिल है। तेल-ताड़ में लगभग 50 प्रतिशत वसा संतृप्त होती है, अन्य तेलों के साथ मिलने की इसकी योग्यता इसे खाद्य तेल स्रोत का एक अच्छा विकल्प बनाती है। इसकी उच्च संतृप्त वसा अम्ल मात्र इसे डीप फ्राई के लिए उच्चतर तापमान पर स्थिर (ऑक्सीकारक) बनाती है। वर्तमान में, विभिन्न राज्यों में ताजा फल गुच्छा उपज के स्तर में व्यापक भिन्नता देखने को मिलती है। सस्ंततु प्रबंधन रीतियों को अपनाकर उत्पादकता को बढ़ाने के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। अभी तक ताजा फल गुच्छा उत्पादन के मामले में तले-ताड़ फसल की क्षमता का दोहन पूरी तरह से नहीं किया जा सका है। अधिकांश किसानों के लिए यह अभी भी एक नई फसल है और इसमें जल तथा पोषक तत्वों जैसे संसाधनों का न्यायोचित प्रबंधन करने की जरुरत है। फसल के लंबे जीवनचक्र के कारण, उच्च उपजशील किस्मों और उन्नत प्रौद्योगिकियों का विकास करने के लिए अधिक समय की भी जरुरत है। निःसंदेह बेहतर अनुसंधान एवं विकास सहयोग, किसानों को सहयोग देने के लिए फसल बीमा योजना का बेहतर क्रार्यान्वयन किया जाना जरूरी है। इसके साथ-साथ ताजा फल गुच्छा के लिए स्थिर मूल्य प्रदान करने में भारत सरकार के उचित नीतिगत समर्थन के साथ वर्ष 2030 में खाद्य तेल की मांग में व्यापक रूप से योगदान करते हुए देश में तेल-ताड़ फसल के दिन-दूनी रात चौगुनी विकास होने की संभावना है। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक: आर. के. माथुर, के. मनोरमा, के. सुरेश और जी. रविचन्द्रन भाकृअनपु-भारतीय तले-ताड़ अनसुधांन सस्ंथान, पेदवेगी-534 450 (आंध्रप्रदेश)