बेहतर आय रोशा घास की खेती सीमांत और कम उपयोगी भूमि पर आसानी से की जा सकती है। अन्य फसलों की अपेक्षा यह फसल अच्छा लाभ प्रदान करती है। वर्तमान समय में भारत में रोशा घास की उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात और मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती की जा रही है। इसके माध्यम से किसानों को परंपरागत फसलों की तुलना में कहीं बेहतर आय की प्राप्ति हो रही है। सुगंधित घास और तेल का आर्थिक महत्व रोशा घास या पामारोजा एक बहुवर्षीय सुगंधित घास है। इसका वानस्पतिक नाम सिम्बोपोगान माटिनाई एवं प्रजाति मोतिया है। यह पोएसी कुल के अंतर्गत आती है। इसकी कटाई एक वर्ष में कई बार की जा सकती है। भारत में सुगंधित तेल के उत्पादन में रोशा घास तेल का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह इससे प्राप्त तेल के आर्थिक महत्व के लिए उगाई जाती है। पारंपरिक फसलों की तुलना में रोशा घास की खेती आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी है। इसकी खेती में लागत कम और शुद्ध लाभ अधिक प्राप्त होता है। भारत के शुष्क क्षेत्रों वाले भागों में भी इसकी खेती करके पर्याप्त लाभ कमाया जा सकता है। इसके पौधे की रोपाई एक बार कर देने के उपरांत 3 से 6 वर्षों तक उपज प्राप्त की जा सकती है। रोशा घास से चार वर्षों तक अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। इसके पश्चात तेल का उत्पादन कम होने लगता है। अनुकूल वातावरण इसका पौधा 100 से 450 सेल्सियस तक तापमान सहन करने की क्षमता रखता है। पौधे की बढ़वार के लिए गर्म एवं आर्द्र जलवायु आदर्श मानी जाती है। तेल क अच्छी मात्रा एवं उच्च गुणवत्ता के लिए गर्म एवं शुष्क जलवायु बेहतर कही जा सकती है। इसकी खेती खराब भूमि से लेकर अच्छी उपजाऊ भूमि तक में की जा सकती है। उचित जल निकास वाली मृदाएं जिनका पी-एच मान 7.5 से 9 तक हो, में भी अच्छी पैदावार की जा सकती है। ऐसी मृदाओं का चुनाव नहीं करना चाहिए, जहां जल भराव की अधिक समस्या हो। इसकी खेती के लिए ऐसे क्षेत्रा उत्तम रहते हैं, जहां पर वार्षिक वर्षा 100 से 150 सें.मी. होती है। इस घास की बढ़वार 150 से 250 सें.मी. तक होती है, लेकिन इसकी लंबाई विभिन्न जलवायु के कारण बदलती रहती है। सूखे की निश्चित अवधि का सामना और अर्द्ध क्षेत्रों में एक वर्षा आधारित फसल के रूप में इसकी खेती की जा सकती है। फसल प्रौद्योगिकी रोशा घास की खेती के लिए भूमि को अच्छी तरह तैयार कर लेना चाहिए। यह तैयारी बीज द्वारा खेती करने या पौध रोपण द्वारा खेती करने पर निर्भर करती है। साधारणतः खेत की मिट्टी को भुरभुरी बनाने के लिए हल से कम से कम दो बार हैरो या कल्टीवेटर से जुताई करनी चाहिए। आखिरी जुताई के समय सड़ी हुई गोबर की खाद 10-15 टन/हैक्टर की दर से भलीभांति खेत में मिला देनी चाहिए। सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय तथा सुगंध पौधा संस्थान (सीमैप), लखनऊ एवं संबंधित अनुसंधान केंद्र, रोशा घास की खेती करने के लिए किसानों की मदद करवाता है एवं उन्हें बीज भी उपलब्ध कराता है। इस घास की कुछ उन्नत इस घास की कुछ उन्नत किस्मों को सीएसआईआर-सीमैप, लखनऊ द्वारा विकसित किया गया है, जिनमें मुख्य प्रजातियां पीआरसी-1, तृष्णा, तृप्ता, वैष्णवी और हर्ष हैं। इसमें पीआरसी-1 किस्म किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो गयी है। रोशा घास का प्रसारण जड़दार पौधों, सीधे बीज की बुआई एवं पहले नर्सरी में पौध तैयार कर रोपण से संभव है। नर्सरी से उनका रोपण करने की विधि वाला तरीका व्यावसायिक खेती के लिए सबसे उपयुक्त होता है। रोशा घास की खेती के लिए नर्सरी में अंकुर पौधा तैयार कर रोपण विधि के माध्यम से लगाना उपयुक्त रहता है। रोपण विधि में सर्वप्रथम उपयुक्त स्थान का चुनाव एवं क्यारियों की तैयारी कर लेनी चाहिए। नर्सरी के लिए उठी हुई क्यारियां बनाने के बाद उनमें सड़ी हुई गोबर की खाद या केंचुआ खाद उचित मात्रा में मिलाने के पश्चात, अच्छी तरह से सिंचाई कर देनी चाहिए। एक हैक्टर खेत में रोपाई के लिए नर्सरी 400-500 वर्गमीटर क्षेत्रफल में बनानी चाहिए। बीज की मात्रा 2.5 कि.ग्रा./हैक्टर पर्याप्त होती है। बीज को रेत के साथ मिलाकर 15-20 सें.मी. की दूरी एवं 1-2 सें.मी. की गहराई पर पंक्ति में या नर्सरी की क्यारी के ऊपर छिड़ककर बोना चाहिए। नर्सरी को लगातार जल छिड़काव के द्वारा नम रखा जाता है। नर्सरी तैयार करने का सर्वोत्तम समय अप्रैल से मई माह में होता है। पौध 4 सप्ताह के बाद मुख्य खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। मुख्य खेत में रोपण से पहले सिंचाई अवश्य कर देना चाहिए एवं नर्सरी की क्यारियों को भी जल से नम कर देना चाहिए। क्यारियों से अच्छे पौधों की उखाड़कर, जिनकी लंबाई 20-25 सें.मी. हो, अच्छी तरह से तैयार खेत में सामान्यतः 60 ×30 सें.मी. की दूरी पर रोपाई कर देनी चाहिए। अगर नर्सरी में पौधे की लंबाई अधिक हो गई है तो उसको ऊपर से काट देना चाहिए। पौध रोपण के तुरंत बाद यदि वर्षा नहीं हो, तो सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। उत्पादन और उपयोग रोशा घास का उत्पत्ति स्थान भारत माना जाता है। इसको प्राकृतिक/ खेती के रूप में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, असोम, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, ओडिशा, तमिलनाडु, नागालैंड, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल में उगाया जा रहा है। भारत का रोशा घास के क्षेत्र एवं उत्पादन में दुनिया में प्रथम स्थान है। इसकी व्यावसायिक खेती भारत के अलावा इंडोनेशिया, पूर्वी अप्रफीका के देशों, ब्राजील, क्यूबा, ग्वाटेमाला और होंडुरास में की जा रही है। इसका तेल बड़े पैमाने पर इत्र, सौंदर्य प्रसाधन और खाद्य मसालों में प्रयोग किया जाता है। एंटीसेप्टिक, मच्छर से बचाने वाली क्रीम और दर्द राहत जैसे गुण इसमें होते हैं। लूम्बेगो, सखत जोड़ और त्वचा रोगों के लिए एक औषधि के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। फसल प्रबंधन सिंचाई की आवश्यकता मौसम पर निर्भर करती है। पहली सिंचाई रोपण के तुरंत बाद करनी चाहिए। वर्षा ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। गर्मी के मौसम में 3-4 सिंचाइयां तथा शरद ऋतु में दो सिंचाई पर्याप्त रहती हैं। कटाई से पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए। प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। रोशा घास में 100:50:50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश की आवश्यकता प्रति हैक्टर प्रति वर्ष पड़ती है। लगभग 40 कि.ग्रा./हैक्टर नाइट्रोजन की मात्रा प्रत्येक फसल काटने के बाद तीन भाग में देनी चाहिए। जिंक सल्फेट 25 कि.ग्रा./ हैक्टर डालने पर उपज में वृद्धि होती है। रोशा घास फसल में ज्यादा नाइट्रोजन का उपयोग हानिकारक होता है, अतः नाइट्रोजन आवश्यकतानुसार ही देना चाहिए। प्रमुख रासायनिक घटक और उनका प्रतिशत सारणी 1. रोशा घास सगंध तेल के प्रमुख रासायनिक घटक और उनका प्रतिशत सक्रिय तत्व बेंगलुरु (कर्नाटक) हैदराबाद (तेलंगाना) तिरुवन्नमलई (तमिलनाडु) (ई)-बीटा-ओसिमीन 1.3 0.7 0.8 लीनालूल 2.32 2.3 3.25 जिरेनियाल 75.81 84.0 84.0 79.75 जिरेनाइल एसीटेट 18.37 5.3 7.46 जिरेनाइल ब्यूटिरेट 0.2 0.2 0.2 फसल सुरक्षा रोशा घास एक सहिष्णु फसल है। इस पर विशेष कीट एवं रोग का प्रकोप नहीं पड़ता है। कभी-कभी एफिड, थ्रिप्स, व्हाइट ग्रब का प्रकोप हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए रोगर (0.1 प्रतिशत) या मोनोक्रोटोफॉस (0.1 प्रतिशत) कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए एवं पत्ता तुषार नामक रोग का प्रकोप होने पर बेलेंट (0.1 प्रतिशत) फफूंदनाशी रसायन का छिड़काव करना चाहिए। कटाई का समय तेल, रोशा घास के सभी भागों में पाया जाता है, जैसे-फूल, पत्ती, तना आदि। इनमें से फूल वाला सिरा मुख्य भाग होता है। कटाई का समय तेल, रोशा घास के सभी भागों में पाया जाता है, जैसे-फूल, पत्ती, तना आदि। इनमें से फूल वाला सिरा मुख्य भाग होता है। इसमें आवश्यक तेल की मात्रा ज्यादा पायी जाती है। फसल की कटाई जमीन से 15-20 सें.मी. का पौधे का भाग छोड़कर 50 प्रतिशत पुष्प आने पर दरांती द्वारा की जाती है। वर्षा ऋतु में फूल आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। इस घास की खेती उपजाऊ मृदा अथवा कम उपजाऊ ऊसर मृदा, जिनका पी-एच मान 9.0 के आसपास हो, कम जल की उपलब्धता वाले क्षेत्र एवं कम जल की उपलब्धता वाले क्षेत्र एवं सीधे बढ़ने वाले वृक्षों के मध्य जैसे यूकेलिप्टस एवं पॉपुलर के बीच में भी सपफलतापूर्वक की जा सकती है। इसके तेल की गुणवत्ता पर विपरीत परिस्थितियों का कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है। तेल का प्रतिशत रोशा घास के पौधों के विभिन्न भागों में औसतन अलग-अलग पाया जाता है। सम्पूर्ण पौधे में 0.1-0.4 प्रतिशत, पुष्पक्रम में 0.45-0.52 प्रतिशत, पत्तियों में 0.16-0.25 प्रतिशत और डंठल में 0.01-0.03 प्रतिशत आवश्यक तेल की मात्रा पायी जाती है। फसल को काटने के पश्चात एक दिन धूप में सुखाकर या दो दिनों तक छाया में सुखाने के पश्चात आसवन करने से कम खर्च में अधिक तेल की प्राप्ति होती है। फसल को काटकर ढेर लगाकर नहीं रखना चाहिए। आसवन इकाई स्वच्छ, जंग मुक्त और किसी अन्य गंध से मुक्त होनी चाहिए। रासायनिक संरचना एवं तेल गुणवत्ता का मूल्यांकन तेल की रासायनिक संरचना सबसे विशिष्ट है। इसमें 150 से अधिक यौगिक शामिल हैं, उनमें से मुख्य को सारणी-1 में प्रदर्शित किया गया है। रोशा घास के तेल की गुणवत्ता का निर्धारण भौतिक-रासायनिक गुणों तथा रासायनिक रूपरेखा के माध्यम से किया जाता है। भारतीय मानक के अनुसार इस घास के तेल की गुणवत्ता का विशेष उल्लेख अग्रलिखित सारणी-2 में दिया गया है। सुगंध तेल के भौतिक-रासायनिक लक्षण सारणी 2. रोशा घास सुगंध तेल के भौतिक-रासायनिक लक्षण भौतिक-रासायनिक पैरामीटर सगंध तेल रंग एवं रूप पीला या पीला हल्का खुशबू गुलाब से मिलती हुई,ग्रासी आपेक्षिक घनत्व (270 में) 0.876 से 0.888 ऑप्टिकल रोटेशन -20 से 20 अपवर्तनांक (270 में) 1.470 से 1.474 अधिकतम अम्लीय मान 3 कुल अल्कोहल, द्रव्यमान द्वारा जिरेनियल प्रतिशत के रूप में गणना की गई (न्यूनतम) 99.0 ईस्टरमान 9 से 36 एसिटिलेशन के बाद ईस्टरमान 266 से 280 उपज एवं कमाई फसल में तेल का प्रतिशत, शाक एवं तेल की उपज जलवायु एवं कृषि कार्य पर निर्भर करता है। तेल की पैदावार पहले साल में कम होती है। रोपण की उम्र के साथ-साथ इसमें वृद्धि होती है। औसतन रोशा घास के शाक में 0.5-0.7 प्रतिशत तेल पाया जाता है। उत्तम कृषि प्रबंध की स्थिति में तेल की औसतन उपज 200-250 कि.ग्रा./हैक्टर/वर्ष प्राप्त की जा सकती है। इस फसल से प्रथम वर्ष में लगभग 120,000 से 140,000 रुपये प्रति हैक्टर तक शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है, जबकि आगामी वर्षों में लाभ की मात्रा प्रथम वर्ष की अपेक्षा अधिक हो जाती है। रोशा घास तेल का शुद्धिकरण एवं भंडारण ते ल की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए आसवन प्रक्रिया के उपरांत तेल से अवांछनीय पदार्थों को निकालना एवं तेल को साफ करना बहुत ही जरुरी होता है। आसवित तेल को पात्र में एकत्र करके रुई द्वारा अतिरिक्त अशुद्धियोंं को छान लेना चाहिए। रोशा घास में से कुल जल की मात्रा को अलग करने के लिए उसमें 2-3 ग्राम/कि.ग्रा. तेल की दर से एनाहाइड्रस सोडियम सल्फेट डालकर लगभग 8 से 10 घंटे के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद तेल को छान लिया जाता है। नमी, हवा और सूर्य के प्रकाश का तेल की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसीलिए तेल को स्टील या एल्युमिनियम के हवाबंद पात्र में एकत्र करके किसी छायादार स्थान पर सामान्य तापमान पर रखना चाहिए। कंटेनर स्वच्छ और जंग से मुक्त होना चाहिए। स्त्रोत: खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर),लेखक आशीष कुमार, ज्ञानेश ए.सी. और दीपक कुमार वर्मा सीएसआईआर-केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप अनुसंधान केंद्र), बोदुप्पल, हैदराबाद (तेलंगाना)