<h3 style="text-align: justify;">फूल आने के समय</h3> <p style="text-align: justify;">कपास में फूल आने के समय नाइट्रोजन की बाकी आधी मात्रा दें, जो कि संकर कपास में 1/2 बैग और अमेरिकन कपास में 2/3 बैग होती है। नाइट्रोजन देने से पहले खेत में काफी नमी होनी चाहिए, परंतु पानी खड़ा नहीं होना चाहिए। वर्षा के बाद अतिरिक्त जल का निकास तुरंत होना चाहिए। यदि फूल आने पर खेत में नमी नहीं होगी, तो फूल और फल झड़ जाएंगे तथा पैदावार कम हो जाएगी। एक तिहाई टिंडे खुलने पर आखिरी सिंचाई कर दें। इसके बाद सिंचाई न करें तथा खेत में वर्षा का पानी खड़ा न होने दें।</p> <p style="text-align: justify;">फूल आने पर नेफ्थलीन एसीटिक एसिड 70 सी.सी. का छिड़काव अगस्त के अंत या सितंबर के शुरू में करें। इस छिड़काव से फूल व टिंडे सड़ते नहीं व पैदावार ज्यादा मिलती है। अत्यधिक व असामयिक वर्षा के कारण सामान्यतः पौधों की ऊंचाई 1.5 मीटर से अधिक हो जाती है, जिससे उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतएव 1.5 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली मुख्य तने की ऊपर वाली सभी शाखाओं की छंटाई सिकेटियर (कैंची) से कर देनी चाहिए। इस छंटाई से कीटनाशक रसायनों के छिड़काव में आसानी होती है तथा छिड़काव पूरी तरह संभव होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूल-विगलन रोग</h3> <p style="text-align: justify;">मूल-विगलन रोग में पौधों की जड़ सड़ जाती है और छाल के नीचे पीला सा पदार्थ जमा हो जाता है। इस रोग से बचने के लिए अगेती बुआई करनी चाहिए। वीटावैक्स 0.1 प्रतिशत और ब्लाइटाॅक्स 0.3 प्रतिशत प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीज को उपचारित करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="171" height="136" /></p> <h3 style="text-align: justify;">कपास का पत्ती लपेटक कीट</h3> <p style="text-align: justify;">इसकी इल्लियां पत्तियों को लपेटकर एक खोल सा बना लेती हैं और अंदर पत्तियों को खाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए</p> <ol> <li style="text-align: justify;">गर्मियों में गहरी जुताई करें ताकि प्यूपा धूप से नष्ट हो जाएं,</li> <li style="text-align: justify;">इसके लार्वा को एकत्रित करके नष्ट कर देना चाहिए,</li> <li style="text-align: justify;">फसल पर पत्ती लपेटक कीट दिखाई देने पर अंडा पैरासिटोइड-ट्राइकोग्रामा 1.5 लाख प्रति हैक्टर की दर से खेत में प्रयोग करना चाहिए। रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कीटों के आर्थिक कगार पर पहुंचने के बाद ही करें। </li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">हरा तेला,सूंडी, कुबड़ा कीट तथा अन्य पत्ती खाने वाले कीट</h3> <p style="text-align: justify;">अगस्त कपास की फसल पर हरा तेला, रोेयेंदार सूंडी, चित्तीदार सूंडी, कुबड़ा कीट तथा अन्य पत्ती खाने वाले कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है। हरा तेला कीट के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही कपास को नुकसान पहुंचाते हैं। ये हरे रंग के होते हैं, जो कि पत्तियों की निचली सतह पर रहते हैं और टेढ़े चलते दिखाई देते हैं। इनके आक्रमण से पत्ते किनारों से पीले पड़ जाते हैं तथा नीचे की ओर मुड़ने लगते हैं, बाद में कपनुमा हो जाते हैं। पत्तियां पीली व लाल होकर सूख जाती हैं और जमीन पर गिर जाती हैं। पौधों की बढ़वार रुक जाती है व कलियां तथा फूल गिरने लगते हैं, जिससे पैदावार कम हो जाती है। हरा तेला जुलाई-अगस्त में सर्वाधिक हानि पहुंचाता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सफेद मक्खी कीट</h3> <p style="text-align: justify;">सफेद मक्खी कीट का पिछले कुछ वर्षों से कपास में प्रकोप काफी बढ़ रहा है। यह एक बहुभक्षी कीट है, जो कपास की प्रारंभिक अवस्था से लेकर चुनाई व कटाई तक फसल में रहता है। इस कीट के शिशु और प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों की निचली सतह पर रहकर रस चूसते हैं। प्रौढ़ 1-1.5 मि.मी. लंबे, सफेद पंखों व पीले शरीर वाले होते हैं, जबकि शिशु हल्के पीले एवं चपटे होते हैं। ये फसल को दो तरह से नुकसान पहुंचाते हैं। एक तो रस चूसने की वजह से, जिससे पौधा कमजोर हो जाता है। दूसरा पत्तियों पर चिपचिपा पदार्थ छोड़ने की वजह से, जिस पर काली फफूंद उग जाती है और यह पौधे के भोजन बनाने की प्रक्रिया में बाधा डालती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">राेकथाम</h4> <p style="text-align: justify;">यदि अगस्त-सितंबर में सफेद मक्खी कीट का आक्रमण हो जाए तो, सफेद मक्खी के आर्थिक कगार पर पहुंचने पर मैटासिस्टाॅक्स 25 ई.सी. व एक लीटर नीम आधारित कीटनाशक या 300 मि.ली. डाइमेथोएट 30 ई.सी. का बारी-बारी से 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और ऋषि राज सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली।</p> <p style="text-align: justify;"> </p>