<h3 style="text-align: justify;">अरहर </h3> <h4 style="text-align: justify;">उकठा फाइटोफ्थोरा, अंगमारी व पादप बांझा रोग </h4> <p style="text-align: justify;">इस समय अरहर की फसल में उकठा फाइटोफ्थोरा, अंगमारी व पादप बांझा रोग की रोकथाम के लिए 2.5 मि.ली. डाइकोफॉल दवा 1.0 लीटर पानी में घोलकर एवं 1.7 मि.ली. डाइमेथोएट दवा को 1 लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करें। जिस खेत में उकठा रोग का प्रकोप अधिक हो, उस खेत में 3 से 4 साल तक अरहर की फसल नहीं लेनी चाहिए। अरहर के साथ ज्वार की सहफसल लेने से किसी हद तक उकठा रोग का प्रकोप कम हो जाता है। ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। दलहनी फसलों में फलीछेदक कीट का प्रकोप भी इसी माह होता है। इसके लिए जब 70 प्रतिशत फलियां आ जाएं तो मोनोक्रोटोफॉस 36 एसएल को 300 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर 15 दिनों बाद फिर छिड़काव कर सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूंग की खेती</h3> <p style="text-align: justify;">मूंग की खेती के लिए दोमट तथा हल्की दोमट मृदा, जिसमें पानी का समुचित निकास हो, इस फसल के लिए उत्तम होती है। मूंग एवं उड़द की कम समय में पकने वाली प्रजातियों की बुआई जुलाई के अन्तिम सप्ताह से अगस्त के तीसरे सप्ताह तक करनी चाहिए। बुआई कूंड़ में हल के पीछे करें। कूंड़ से कूंड़ की दूरी 30-35 सें.मी. एवं उड़द के लिए कूंड़ से कूंड़ की दूरी 30-45 सें.मी. रखनी चाहिए। बुआई के बाद तीसरे सप्ताह में घने पौधों को निकाल कर पौधे की दूरी 10 सें.मी. कर देनी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">मोजेक रोग</h4> <p style="text-align: justify;">मूंग में खरीफ के मौसम में पीले मोजेक रोग का अधिक प्रकोप होने के कारण इसकी औसत उपज बहुत कम प्राप्त होती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">उन्नत प्रजातियां</h4> <p style="text-align: justify;">मूंग एवं उड़द की शीघ्र पकने वाली उन्नत प्रजातियों की बुआई करें। इसके लिए मूंग की प्रजातियों जैसे-सम्राट, पी.डी.एम.-54, पीडीएम-11, नरेन्द्र मूंग-1, पंत मूंग-1, पंत मूंग-2, पंत मूंग-3, पंत मूंग-4, पंत मूंग-5 मालवीय ज्योति, मालवीय जनचेतना, मालवीय जनप्रिया, मालवीय जागृति, आशा, मालवीय जन कल्याणी, एमएच 215, आईपीएम-23, श्वेता एवं उड़द की प्रजातियों जैसे-पंत उड़द-35, पंत उड़द 31, पंत उड़द-19, पंत उड़द-40, नरेन्द्र उड़द-1, शेखर 1, शेखर 2, शेखर 3, उत्तरा (आईपीयू-94-1) आदि की बुआई कर सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="195" height="170" /></p> <h4 style="text-align: justify;">मृदा की जांच एवं पाेषक तत्व</h4> <p style="text-align: justify;">यदि मृदा की जांच नहीं करवाई गई है, तो 10-15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन तथा 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय कूंड़ों में डालना चाहिए। मूंग, उड़द, लोबिया व अरहर जैसी दलहनी फसलों में फूल आने पर मृदा में हल्की नमी बनाये रखें। इससे फूल झड़ेंगे नहीं, अधिक फलियां लगेंगी व दाने भी मोटे तथा स्वस्थ होंगे। खेतों में वर्षा का पानी खड़ा नहीं होना चाहिए तथा जल निकास अच्छा होना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">खरपतवार की समस्या एवं समाधान</h4> <p style="text-align: justify;">बुआई के प्रारंभिक 4-5 सप्ताह तक खरपतवार की समस्या अधिक रहती है। पहली सिंचाई के बाद निराई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मृदा में वायु का संचार भी होता है, जो मूल ग्रन्थियों में क्रियाशील जीवाणुओं द्वारा वायुमण्डलीय नाइट्रोजन एकत्रित करने में सहायक होता है। खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए 2.5-3.0 मि.ली. रसायन प्रति लीटर पानी में घोलकर बुआई के 2 से 3 दिनों के अंदर अंकुरण के पूर्व छिड़काव करने से 4-6 सप्ताह तक खरपतवार नहीं निकलते हैं। चौड़ी पत्ती तथा घास वाले खरपतवार को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिए पेन्डीमेथिलीन (30 ई.सी.) 3.30 लीटर या एलाक्लोर 4.0 लीटर या फ्लूक्लोरोलिन (45 ई.सी.) नामक रसायन की 2.20 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के तुरन्त बाद या अंकुरण से पहले छिड़काव कर देना चाहिए। बुआई के 15-20 दिनों के अंदर कसोले से निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">उर्वरक</h4> <p style="text-align: justify;">मूंग, उड़द एवं अरहर की फसल में पीले मोजेक रोग की रोकथाम के लिए डाइमेथोएट (30 ई.सी.) 1.0 लीटर या मिथाइल-ओंडिमिटान (25 ई.सी.) 1.0 लीटर मात्रा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 10-15 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें या इमिडाक्लोरोप्रिड 0.5 मि.ली./लीटर पानी 500 लीटर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और ऋषि राज सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली।</p>