मूंग सामान्यतः उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाना चाहिए। मूंग की फसल के लिये 15-20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40-50 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश एवं 20 कि.ग्रा. सल्फर/हैक्टर की दर से बुआई के समय कुंड़ों में देना चाहिए। कुछ क्षेत्रों में जिंक की कमी की अवस्था में 15-20 कि.ग्रा./हैक्टर के दर से जिंक सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए। इस समय की मूंग की फसल लगभग दो से ढाई महीने में तैयार हो जाती है। इस कारण से सिंचाई की भी बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती है। सही मायने में ग्रीष्मकालीन मूंग एक बोनस फसल की तरह काम करती है। मूंग एवं उड़द की पिछले माह बोयी गयी फसल में 25-30 दिनों बाद पहली सिंचाई करें। ग्रीष्मकालीन मूंग की बुआई ग्रीष्मकालीन मूंग की बुआई 15 अप्रैल तक अवश्य कर दें। इस माह उड़द की बुआई न करें। बीज की बुआई कुंड़ों में या सीडड्रिल से पंक्तियों में की जानी चाहिए तथा बीजों को 4-5 सें.मी. गहराई में बोना चाहिए। उन्नत किस्में सारणी 1. मूंग की उन्नत किस्में क्र.सं प्रजातियां पकने की अवधि (दिन) औसत उपज (क्विंटल/हैक्टर) विशिष्ट औसत गुण 1. पूसा विशाल 60-62 10-12 पीत चितेरी रोगरोधी तथा एक साथ पकने वाली प्रजाति 2. पूसा 9531 65-70 12-0 पीत चितेरी रोगरोधी, चमकीला हरा दाना 3. पूसा रतना 65-70 10-12 पीत चितेरी रोगरोधी प्रजाति 4. पूसा 0672 70-72 9-10 पीत चितेरी रोगरोधी, चमकीला तथा मध्यम आकार का हरा दाना 5. सम्राट 58-62 10-12 पीत चितेरी राेगराेधी, चमकीला हरा दाना तथा एक साथ पकने वाली प्रजाति 6. मेहा 65-70 12-14 पीत चितेरी रोगरोधी, चमकीला हरा दाना 7. आर.एम.जी.-268 66-73 8-10 पीत चितेरी रोगरोधी, चमकीला हरा दाना 8. पंत मूंग-4 65-70 12-14 पीत चितेरी राेगराेधी हल्का हरा दाना 9. पंत मूंग-5 60-65 12-14 पीत चितेरी रोगरोधी, सभी ऋतुओं के लिए उपयुक्त 10. पंत मूंग-6 60-65 12-14 पीत चितेरी रोगरोधी 11. एस.एम.एल.-668 60-62 10-12 पीत चितेरी रोगरोधी, बड़ा हरा दाना 12. एस.एम.एल.-832 60-62 11-60 पीत चितेरी व थ्रिप्स रोगरोधी, मध्यम आकार व चमकीला दाना 13. एच.यू.एम.-2 60-65 11-12 पीत चितेरी रोगरोधी, सभी ऋतुओं के लिए उपयुक्त 14. एच.यू.एम.-1 60-65 9-11 पीत चितेरी रोगरोधी 15. एच.यू.एम.-6 68-70 10-11 पीत चितेरी रोगरोधी 16 एच.यू.एम.-12 60-65 8-10 पीत चितेरी रोगरोधी 17. आर.एम.जी.-492 65-70 9-11 पीत चितेरी रोगरोधी 18. एम.एल.-818 75-80 10-12 पीत चितेरी रोगरोधी 19. टी.एम.बी.-37 65-70 12-14 पीत चितेरी रोगरोधी, चमकीला तथा बड़ा हरा दाना 20. एच.यू.एम.-16 60-65 10-12 पीत चितेरी रोगरोधी, चमकीला तथा बड़ा हरा दाना कवक एवं जीवाणुजनित रोग मृदा एवं बीजजनित कई कवक एवं जीवाणुजनित रोग होते हैं, जो मृदा अंकुरण होते समय तथा अंकुरण होने के बाद बीजों को काफी क्षति पहुंचाते हैं। बीजों के अच्छे अंकुरण तथा स्वस्थ पौधों की पर्याप्त संख्या के लिए बीजों का कवकनाशी से उपचार करने की सलाह दी जाती है। इसके लिये प्रति कि.ग्रा. बीज का 2-2.5 ग्राम थीरम तथा 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम से उपचार करने के बाद राइजोबियम कल्चर/टीके से भी बीजोपचार करना चाहिए। उपचार के लिए 500 मि.ली. स्वच्छ जल में 100 ग्राम गुड़ एवं 2 ग्राम गोंद को पानी में मिलाकर गर्म कर लेना चाहिए। इसके बाद इसे ठंडा करके एक पैकेट राइजोबियम कल्चर/ टीका (10 कि.ग्रा. बीज) मिलाकर अच्छी तरह बीजों को उपचारित कर लेना चाहिए। उपचारित बीजों को छायामें ही सुखाना चाहिए। बुआई के समय बीज डालने से पहले सल्फर धूल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। इसी प्रकार फॉस्फेट घुलनशील बैक्टीरिया (पीएसबी) से बीज का शोधन करना भी लाभदायक होता है। मूंग की उन्नत प्रजातियां मूंग की अच्छी पैदावार तथा उत्तम गुणवत्तायुक्त उत्पादन लेने के लिए अच्छी प्रजाति का चयन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसीलिए पानी के साधन, फसल चक्र व बाजार की मांग की स्थिति को ध्यान में रखकर उपयुक्त प्रजातियों का चुनाव करें। दलहनों की शीघ्र पकने वाली प्रजातियां विकसित की गयी हैं, जो मुख्य फसल प्रणालियों के लिये सर्वथा उपयुक्त हैं। सिंचित क्षेत्रों के अन्तर्गत मूंग व उड़द की विभिन्न परिपक्वता अवधि वाली, तापमान एवं प्रकाश के प्रति अतिसंवेदनशील, अधिक उपज वाली प्रजातियों के विकास से इनको कई फसल प्रणालियों में स्थान मिला है। उत्तर भारत में मूंग व उड़द की कम अवधि वाली पीली चितेरी विषाणु रोग अवरोधी प्रजातियों के विकास से मध्य मार्च से जून के बीच उगाने से फसल प्रणाली को अधिक लाभ कमाने तथा टिकाऊ बनाने में सहायता मिलती है। मूंग व उड़द को शामिल करके निम्नलिखित फसल प्रणालियां उपयुक्त पायी गयी हैं। अरहर-मूंग मक्का-तोरिया गेहूं-मूंग मूंग/उड़द मक्का-गेहूं-मूंग/उड़द धान-गेहूं-मूंग/उड़द अरहर-गेहूं-मूंग आलू-गेहूं-उड़द उड़द-सरसों-मूंग/उड़द उड़द-गेहूं-मूंग ग्रीष्मकालीन मूंग व उड़द की फसल की अच्छी वृद्धि व विकास के लिये 3 से 4 सिंचाइयां आवश्यक हैं। अनावश्यक रूप से सिंचाई करने पर पौधों की वानस्पतिक वृद्धि ज्यादा हो जाती है जिसका उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः सिंचाई आवश्यकतानुसार व हल्की करें। बुआई के प्रारंभिक 4-5 सप्ताह तकखरपतवार की समस्या अधिक रहती है। पहली सिंचाई के बाद निकाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मृदा में वायु का संचार भी होता है, जो मूल ग्रन्थियों में क्रियाशील जीवाणुओं द्वारा वायुमण्डलीय नाइट्रोजन एकत्रित करने में सहायक होता है। चैड़ी पत्ती तथा घास वाले खरपतवार को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिये एलाक्लोर की 4 लीटर या फ्रलूक्लोरालिन (45 ई.सी.) नामक रसायन की 2.22 लीटर मात्रा का 800 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के तुरन्त बाद या अंकुरण से पहले छिड़काव कर देना चाहिए। अतः बुआई के 15-20 दिनों के अन्दर कसोले से निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए। स्त्रोत : खेती पत्रिका(भाकृअनुप) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, विनोद कुमार सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोष नगर, हैदराबाद।