<h3 style="text-align: justify;">मूंगफली</h3> <h4 style="text-align: justify;">मृदा</h4> <p style="text-align: justify;">मूंगफली की खेती के लिए दोमट बलुअर, बलुअर दोमट या हल्की दोमट मृदा अच्छी रहती है। ग्रीष्मकालीन मूंगफली, आलू, मटर, सब्जी मटर तथा राई की कटाई के बाद खाली खेतों में सफलतापूर्वक की जा सकती है।</p> <h4 style="text-align: justify;"> उन्नत प्रजातियां </h4> <p style="text-align: justify;"><a href="../../../../../../../agriculture/crop-production/91593f93893e92894b902-915947-93293f90f-92e94c93892e-90692793e93093f924-91594393793f-93893293e939/महीने-अनुसार-कृषि-कार्य/मार्च-माह-के-कृषि-कार्य/ग्रीष्मकालीन-मूंगफली">ग्रीष्मकालीन मूंगफली </a>की उन्नत प्रजातियां जैसे-टीजी-26, टीजी-37ए, डीएच-86, टीपीजी-1, एसजी-99, टा-64, टा-28, चन्द्रा, उत्कर्ष, एम-13,अम्बर, चित्रा, कौशल व प्रकाश उगाई जा सकती हैं। ग्रीष्मकालीन मूंगफली की एसजी 84 व एम 522 किस्में सिंचित हालत में अप्रैल के अंतिम सप्ताह में गेहूं की कटाई के तुरंत बाद बोयी जा सकती हैं, जोकि अगस्त अन्त तक या सितम्बर अन्त तक तैयार हो जाती हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">उर्वरक</h4> <p style="text-align: justify;">ग्रीष्मकालीन मूंगफली में नाइट्रोजन की अधिक मात्रा न डालें अन्यथा यह मूंगफली की पकने की अवधि बढ़ा देगा। नाइट्रोजन, फॉस्फेट व पोटाश की पूरी मात्रा कुंड़ों में चोंगे द्वारा बुआई के समय बीज से लगभग 2-3 सें.मी. गहराई पर डालना चाहिए। </p> <p style="text-align: justify;">जिप्सम की शेष आधी मात्रा मूंगफली में फूल निकलते तथा खूटी बनते समय टॉपड्रेसिंग करके प्रयोग करनी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">बीज उपचार</h4> <p style="text-align: justify;">बोने से पूर्व बीज को थीरम 2 ग्राम और 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत धूल के मिश्रण को 2 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज अथवा थायोफिनेट मिथाइल 1.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज अथवा ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम 1 ग्राम कार्बाक्सिन प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित करना चाहिये। इस शोधन के 5-6 घन्टे बाद बोने से पहले बीज को मूंगफली के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें। एक पैकेट, 10 कि.ग्रा. बीज के लिए पर्याप्त होता है। कल्चर को बीज में मिलाने के लिए आधा लीटर पानी में 50 ग्राम गुड़ घोल लें। फिर इस घोल में 250 ग्राम राइजोबियम कल्चर का प्रयोग करें, ताकि बीज के ऊपर एक हल्की परत बन जाये। इस बीज को छाया में 2-3 घन्टे सुखाकर बुआई सुबह के समय या शाम को 4 बजे के बाद करें। </p> <p style="text-align: justify;">राई तथा मटर की खेती के बाद उगाई जा रही मूंगफली में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस और 40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">सूरजमुखी</h3> <p style="text-align: justify;">सूरजमुखी सूरजमुखी की फसल में उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="187" height="158" /></p> <h4 style="text-align: justify;">बुआई</h4> <p style="text-align: justify;">अप्रैल में सूरजमुखी की बुआई भी कर सकते हैं, वैसे तो मार्च के प्रथम पखवाड़े तक इसकी बुआई हो जाती है किन्तु गेहूं के बाद सूरजमुखी लेने पर अप्रैल में ही बुआई कर सकते हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">बीज की मात्रा एवं उपचार</h4> <p style="text-align: justify;">सूरजमुखी के लिए 8-10 कि.ग्रा. बीज को पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45-60 सें.मी. और पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सें.मी. एवं बीज की गहराई 4-5 सें.मी. पर बुआई करें। </p> <p style="text-align: justify;">बीज को 12 घंटे पानी में भिगोकर छाया में 3-4 घंटे सुखाकर बोने से जमाव शीघ्र होता है। बोने से पहले बीज को एप्रोन 35 एसडी की 6.0 ग्राम या कार्बेन्डाजिम की 2 ग्राम मात्रा/कि.ग्रा. बीज से उपचारित अवश्य करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">प्रजाति </h4> <p style="text-align: justify;">ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक सूरजमुखी की ई.सी. 68415 प्रजाति की बुआई कर सकते हैं, जो अच्छे जल निकास वाली गहरी दोमट मृदा तथा क्षारीय व अम्लीय स्तर को सहन कर सकती है। </p> <h4 style="text-align: justify;">विरलीकरण</h4> <p style="text-align: justify;">सूरजमुखी की बुआई के 15-20 दिनों बाद सिंचाई से पूर्व विरलीकरण अवश्य कर देना चाहिए और उसके पश्चात सिंचाई करें।</p> <h4 style="text-align: justify;"><a href="../../../../../../../agriculture/91594393793f-906917924/90591c94893593f915-90692693e928/91693092a92493593e930-92893f92f90292494d930923">खरपतवार नियंत्रण</a></h4> <p style="text-align: justify;">रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए पेंडिमैथेलिन 30 प्रतिशत का 3.3 लीटर/हैक्टर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के बाद एवं अंकुरण से पूर्व अर्थात बुआई के 3-4 दिनों के अन्दर छिड़काव करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भाकृअनुप) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, विनोद कुमार सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोष नगर, हैदराबाद।</p> <p style="text-align: justify;"> </p>