<h3>ग्रीनहाउस</h3> <p style="text-align: justify;">खीरे के पौधों को एक प्लास्टिक की रस्सी के सहारे लपेटकर ऊपर की ओर चढ़ाया जाता है। इस प्रक्रिया से प्लास्टिक की रस्सियों के एक सिरे को पौधों के आधार से तथा दूसरे सिरे के ग्रीनहाउस उसमें क्यारियों के ऊपर 9-10 फीट ऊंचाई पर बंधे लोहे के तारों पर बांध देते हैं। अन्त में जब पौधा उस तार के बराबर पहुंचता है, जिस तार पर रस्सी का दूसरा सिरा बंधा होता है, तो पौधों को नीचे की ओर चलने दिया जाता है। इसके साथ-साथ विभिन्न दिशाओं से निकली शाखाओं की निरन्तर काट-छांट करनी चाहिये। मोनोशियस किस्मों में मादा फूल मुख्य शाखा से निकली द्वितीय शाखाओं पर ही आते हैं। अतः उनकी कटाई नहीं की जाती है अन्यथा उपज में भारी कमी होती है। कटाई -छंटाई करते समय इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि हमने किस किस्म को उगाया है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="164" height="143" /></p> <h3 style="text-align: justify;">नियंत्रित स्थिति में ग्रीनहाउस</h3> <p style="text-align: justify;">नियंत्रित स्थिति में ग्रीनहाउस में खीरे की वर्षभर पौध तैयार की जा सकती है। गर्मी के मौसम में इस विधि से पौध 15-18 दिनों में रोपाई योग्य हो जाती है। अंकुरण के तुरन्त बाद उनको पॉलीहाउस में फैला दिया जाना चाहिये। इस प्रकार पौध में जड़ों का विकास बहुत अच्छा होता है तथा जड़ें माध्यम के चारों ओर लिपट जाती हैं। इससे उन्हें ट्रे से निकालने पर जड़ों को कोई नुकसान भी नही होता है। बेल वाली सब्जियां, जड़ों में कोई नुकसान सहन नहीं कर सकती हैं। अतः उनकी पौध तैयार करने का यह एकमात्र उपयुक्त उपाय व साधन है। </p> <p style="text-align: justify;">पौधों की उर्वरक व जल की मात्रा मौसम एवं जलवायु पर निर्भर करती है। आमतौर पर पानी 2.0 से 2.5 घन मीटर प्रति 1000 वर्ग मीटर की दर से गर्मी में 2 से 3 दिनों के अन्तराल पर दिया जाता है। गर्मी में फसल में जल की मात्रा फल आने की अवस्था में 3.0 से 4.0 घन मीटर तक बढ़ा दी जाती है। उर्वरक पानी के साथ मिलाकर ड्रिप सिंचाई प्रणाली द्वारा दिया जाता है। नाइट्रोजन 80-100 पी.पीएम., फास्फोरस 60-70 पी.पी.एम तथा पोटाश 100-120 पी.पी.एम. तक दिये जाते हैं। इनकी मात्रा को फसल की अवस्था, मृदा के प्रकार व मौसम के अनुसार घटाया व बढ़ाया जा सकता। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भाकृअनुप) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, विनोद कुमार सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोष नगर, हैदराबाद।</p> <p style="text-align: justify;"> </p>