<h3>गन्ने की बुआई </h3> <p style="text-align: justify;">बसंतकालीन गन्ने की बुआई के लिए सबसे सही समय फरवरी का महीना होता है। देश के कई किसान इस समय गन्ने की बुआई करते हैं। यह एक मुख्य नकदी फसल है। इसकी खेती से किसानों की अच्छी आमदनी होती है, इसलिए आज का किसान गन्ना पफसल की तरफ बढ़ रहा है। इसकी विशेषता है कि यह प्राकृतिक आपदाओं, ओलावृष्टि, पाला, अतिवृष्टि और सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता रखता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">जलवायु एवं मिट्टी</h3> <p style="text-align: justify;">गन्ना फसल के लिए उष्ण कटिबन्धीय जलवायु की जरूरत पड़ती है। इसकी बढ़वार के समय गर्म, नम और अधिक वर्षा का होना बहुत अच्छा माना जाता है। इसकी खेती बलुई दोमट, दोमट और भारी मृदा में की जा सकती है। इसके अलावा उचित जल निकास वाले जैव पदार्थ और पोषक तत्वों से भरी मृदा में भी गन्ने की खेती कर सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">बीज </h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने के स्वस्थ बीज का ही चुनाव करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">संस्तुत किस्म</h3> <p style="text-align: justify;">बसन्तकालीन गन्ने की बुआई देर से काटे गये धान वाले खेत में और तोरिया, मटर व आलू की फसल से खाली हुए खेत में की जा सकती हैं। बुआई के लिए संस्तुत किस्मों का चुनाव करें। गन्ने की बुआई शुगर केन प्लान्टर मशीन से 75 सेंमी. की दूरी पर कूंड़ों में करना ज्यादा लाभदायक रहता है। फरवरी के दूसरे पखवाड़े में गन्ने की बुआई कर सकते हैं। शरदकालीन गन्ने में बुआई के 110-120 दिनों बाद नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा (60-75 कि.ग्रा./हैक्टर) की टॉप ड्रेसिंग कर दें। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%; height: 178px;" border="1"> <tbody> <tr style="height: 178px;"> <td style="width: 100%; height: 178px;"> <h4>गन्ने की उन्नत किस्में</h4> <p style="text-align: justify;">गन्ने की जल्दी तैयार होने वाली उन्नत किस्में जैसे-सीओ 0239, सीओ 0238, सीओ 0118, सीओ 98014, सीओ 89003, सीओ 0237, को. पन्त 211, को. पन्त 3220, को. 0238, को.0239,<br />काे. 0118, काे. 98014, काे.शा. 687, यूपी 05125, कोसे 98231, कोशा 08272, कोशा 96268, कोशा 88230, कोशा 8436, कोशा 98247, काेशा 95436, काेजे 64, काेजे 8 5 आदि में से<br />उपलब्धतानुसार किस्माें का प्रयोग करें। गन्ने की मध्य या देर से पकने वाली प्रमुख किस्में कोशा 7918, कोशा 802, कोशा 8118, कोशा 767, कोशा 8432, कोशा 94257, कोशा 96275, कोशापन्त 84212, कोशा 90223, कोशा पन्त 96219, को. पन्त 97277, को. पन्त 99214, यूपी 0097, सीओ 0124 आदि में से उपयुक्त प्रजाति का चुनाव करें। जलमग्न क्षेत्रा के लिए कोशा. 96436, यूपी 9529, यूपी 9530, बीओ 54 व बीओ 91 आदि किस्मों का चुनाव करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccdownlod2.jpg" width="175" height="153" /></p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">बीज उपचारण</h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने का बीज जिस खेत से लेना हो, बुआई से दो सप्ताह पूर्व उसकी सिंचाई कर दें। एक हैक्टर बुआई के लिए 60-70 क्विंटल गन्ना पर्याप्त होता है। गन्ने के बीज को उपचारित करने के लिए 250 ग्राम एरीटॉन या 500 ग्राम एग्लाल का प्रयोग करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग</h3> <p style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करें। अच्छी उपज के लिए गन्ना की बसंतकालीन पफसल में 120-150 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50-60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा 30-40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की आवश्यकता होती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">पेड़ी से अच्छी उपज</h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने की पेड़ी से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि फसल की कटाई जमीन से सटाकर करें, खेत से खरपतवार निकाल दें, सिंचाई करें, मृदा में ओट आने पर 90 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की पहली टॉप ड्रेसिंग करें और कल्टीवेटर से गुड़ाई करके उर्वरक को मृदा में मिला दें। गन्ने की दो पंक्तियों के बीच मूंग या उड़द अथवा लोबिया या भिण्डी की एक पंक्ति की बुआई की जा सकती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">दीमक व अकुंरबेधक कीट</h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने की फसल को दीमक व अकुंरबेधक कीट से बचाने के लिए बुआई के बाद कूंड़ को ढकने से पूर्व 5 लीटर/हैक्टर की दर से क्लोरोपायरीफॉस को 2000 लीटर पानी में घोलकर कूंड़ों में इसका छिड़काव करें अथवा 25 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से फोरेट 10 जी का कूंड़ों में छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अवनि कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग एवं संरक्षित खेती और प्रौद्योगिकी, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>