<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify; ">भूमिका</h3> <p style="text-align: justify; ">फरवरी माह जिसे आप माघ-फाल्गुन भी कहते हैं , बसंत पंचमी का त्यौहार लेकर आता है ।<img class="image-right" title="फरवरी माह के कृषि कार्य" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91593f93893e92894b902-915947-93293f90f-92e94c93892e-90692793e93093f924-91594393793f-93893293e939/92e93e93993593e930-91594393793f-91593e93094d92f/feb.jpg/@@images/87198763-573f-4668-a03e-e2767b5974d5.jpeg" alt="फरवरी माह के कृषि कार्य" /></p> <p style="text-align: justify; ">चारों तरफ पीले फूल खिल उठतेहैं तथा मौसम में ठंड कम होने लगती है । लेख में नाप-तोल प्रति एकड़ के हिसाब से हैं । इस माह के प्रमुख कार्य इस प्रकार से हैं –</p> <ul style="text-align: justify; "> <li>जनवरी में उगाई गई सब्जियों के पौधों की रोपाई की जाती है। खेतों में भिण्डी, तोरई, कद्दु, लौकी, चौलाई और मूली के बीजों को बोते हैं और इन सबकी सिंचाई की जाती है।</li> <li>बौने गेहूँ में उर्वरक की आखरी मात्रा देकर सिंचाई करते हैं।</li> <li>सूर्यमुखी के खेत में निदाई करते हैं और मिट्टी चढ़ाई जाती है।</li> <li>गन्ने के स्वस्थ बीज का चुनाव कर बीजोपचार करते हैं।</li> <li>बरसीम की कटाई 20 से 25 दिनों के अन्तर में की जाती है।</li> <li>बरसीम, चटी के लिये मक्का, ज्वार, लोबिया और मक्का मिलाकर बोते हैं।</li> <li>सरसों, अलसी यदि पकने लगे हों तो उन्हें काट लिया जाता है। नहीं तो ज्यादा पक जायेगा और बीज छिटकने लगेगें।</li> <li>प्याज और लहसुन के खेतों में गुड़ाई करने के बाद मिट्टी चढ़ाते हैं।</li> <li>आलू की खुदाई करते हैं। जाड़े के फूलों के बीज एकत्र करते हैं। गर्मियों के फलों के बीजों की बुवाई करते हैं। </li> </ul> <h3 style="text-align: justify; ">कृषि कार्य में ध्यान देने योग्य आवश्यक बातें</h3> <p style="text-align: justify; ">पैदावार में कमी</p> <p style="text-align: justify; ">फरवरी माह में यह रोग बहुत सारी फसलों में हमला करता है तथा पत्तियों पर सफेद चूर्ण नजर आता है । इसकी तुरंत रोकथाम के लिए 1 कि.ग्रा. घुलशील गंधक का छिडकाव करें।</p> <p style="text-align: justify; ">दीमक प्रकोप ( बारानी क्षेत्रों में )</p> <p style="text-align: justify; ">इस माह बारानी व रेतीली क्षेत्रों में दीमक बहुत सी फसलों पर हमला करके नुकसान करती है । नियंत्रण के लिए २ लीटर क्लोरपाइरीफास को २ लीटर पानी तथा २० कि.ग्रा. रेत में मिलाकर खेत में बिखेर दें।</p> <p style="text-align: justify; ">चेपा व तेला कीट ( प्रमुख फसल नाशक)</p> <p style="text-align: justify; ">इस माह चेपा व तेला दोनों कीट बहुत सारी फसलों की पत्तियों, फूलों, फलों व बालियों से रस चूसकर पैदावार कम करता है । यदि १२ प्रतिशत से अधिक पत्तों पर ये कीट नजर आयें तो ४०० मि.ली. मैलाथियान ७० ईसी को २७० लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">गेहूं</h3> <p style="text-align: justify; ">गेहूं में सिंचाई २७-३० दिन के अन्तर पर करते रहें । इस माह तापमान बढने के दशा में गेहूं में बीमारिया नजर आने लगती है, जिनमें पीला रतुआ या धारीदार रतुआ, भूरा रतुआ या पत्तों का रतुआ तथा काला या तने का रतुआ रोग प्रमुख है । इन रोगों के रंगदार धब्बे पत्तों व तनों पर नजर आते हैं । बीमारी नजर आते ही ८०० ग्राम जिनेव (डाझ्थेन जेड ७८) या मैनकोजेव (डाईथेन एम-४५) को २५० लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें । उसके बाद १०-१७ दिन के अन्तर पर २ या 3 छिडकाव करें । चूर्णी या पाउडरी मिल्डयु बीमारी में पत्तों में सफेद चूर्ण बन जाता है । जिससे बाद में बालियां भी रोगग्रस्त हो जाती है । रोग नियंत्रण के लिए ८००-१००० ग्राम घुलनशील गंधक का छिडकाव करें । रोगरोधी किस्में लगाना ही सर्वोत्तम बचाव है । बाकी कीट व अन्य बीमारियों का नियंत्रण के लिए पिछेले माह के लेख देखें ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">जौ एवं शरदकालीन मक्का</h3> <p style="text-align: justify; ">जौ एवं शरदकालीन मक्का में आवश्यकतानुसार सिंचाई कर सकते है । जों में बीमारियों का नियंत्रण गेहूं की भाति ही करें । शरदकालीन मक्का में यदि रतुआ तथा चारकोल बंट का खतरा होने पर ४००-६०० ग्राम डाइथेन एम ४७ को २००-२५० लीटर पानी में घोलकर २-३ छिडकाव करें ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">चना</h3> <p style="text-align: justify; ">यदि भारी मिट्टी में उगाया है तो ज्यादा सिचाई न दें । चने में बीमारियों से बचाव के लिए सहनशील किस्में चुनें : बैविस्टीन से बीजोपरचार (२.७ ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज) करें तथा समय पर बोआई करें । रोगग्रस्त पौधों को जलाकर नष्ट कर दें।</p> <p style="text-align: justify; ">मसूर, दाना मटर व चने में फलीछेदक के नियंत्रण के लिए फूल आते ही ४०० मि.ली. एण्डोसल्फान ३७ ई सी १०० लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें तथा ५१० प्रतिशत फत्रियां बळनन्ने पर छिडकाव फिर दोहराएं ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">भूरी सरसों, तारामीरा व अगेती पीली सरसों</h3> <p style="text-align: justify; ">इस माह पकने वाली है तथा माह के शुरू में हल्की सिंचाई देने से पैदावार बढ़ेगी । कीट नियंत्रण के लिए पिछले माह बताये तरीकों पर ध्यान दें । फलियां पीली पडने पर फसल काट लें इससे दाने बिखरते नहीं । फसल काट कर एक स्थान पर ढेर लगाकर सुखाएं तथा अच्छी तरह सुखने पर गहाई करें ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">चारा</h3> <p style="text-align: justify; ">चारा जैसे बरसीम, रिजका व जई की हर कटाई के बाद सिंचाई करें इससे अगली कटाई जल्दी मिलेगी।</p> <h3 style="text-align: justify; ">सूरजमुखी</h3> <p style="text-align: justify; ">सूरजमुखी की फसल १७ फरवरी तक लगाई जा सकती है । पक्षी बीजों को निकाल कर ले जाते है इनसे बचाव के लिए ध्वनि करें । बाकी क्रियाएं पिछले माह बता चुके है । दिसम्बर व जनवरी में बोयी फसल में ३०-३७ दिन बाद पहली सिंचाई कर दें तथा नेत्रजन की दूसरी किस्त ( 1 बोरा यूरिया) भी डाल दें ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">बसंतकालीन गन्ना</h3> <p style="text-align: justify; ">बसंतकालीन गन्ना को १७ फरवरी से मार्च अनन्त तक बोया जा सकता है। ३५,००० दो आखों वाली या २३,००० तीन आखों वाली (३५ - ४० किंवटल) पोरियों को ०.२५ प्रतिशत डाझ्थेन एम ४५ के १०० लीटर घोल में ४-७ मिनट तक डुबोकर २ से २.७ फुट दूर लाईनों में बोएं । बीज के लिए गन्ने के ऊपरी दो तिहाई स्वस्थ्य, कीट व रोगरहित हिस्से को चुने । उपचार करते समय रबर के दस्ताने पहनें तथा काम करने वाले व्यक्ति के हाथ पर घाव या खरोंचें न हो । यदि क्षेत्र में स्केल कीड़े का डर है तो बीज को ०.१ प्रतिशत मैलाथियान के घोल में २० मिनट तक भिंगों लें तथा गन्ने की मोठी फसल न लें । अगेती पकने वाली किस्मों में सी ओ जो ६४, १८-२० प्रतिशत खांड तथा २०० क्विंटल पैदावार देती है तथा मोठी फसल भी अच्छी देती हैं । सी ओ एच ७६ तथा सी ओ एच ९२ भी १८ प्रतिशत खांड देती हैं । मध्यम पकने वाली किस्मों में सी ओ ७७१७ नवम्बर में पक जाती है तथा १७ प्रतिशत खांड तथा ३७० क्विंटल पैदावार देती हैं । सी ओ एच ९९ तथा सी ओ एच ८४३६ भी १७ प्रतिशत खांड तथा २८० क्विंटल पैदावार देते हैं । पिछेती पकने वाली किस्मों में सी ओ ११४८ जनवरी अंत में पकती हे तथा १७-१९ प्रतिशत खांड के साथ ३२० क्विंटल पैदावार देती है ।</p> <p style="text-align: justify; ">सी ओ एस ३५१, १८-२० प्रतिशत खांड तथा ३२० क्विंटल पैदावार देती है। सी ओ एस ७६७, दिसम्बर माह में पकती है तथा १६-१८ प्रतिशत खांड के साथ ३०० क्विंटल पैदावार देती हैं। बीजाई से पहले खाद, मिट्टी परीक्षण के आधार पर डालें । यदि मिट्टी जांच नहीं हुई है तो २.७ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट, 1 बोरा यूरिया ( १/३ नेत्र जन) डाल दें । गन्ने में १० कि.ग्रा. जिंक सल्फेट भी डालें, विशेषकर बलुई - दोमट भूमि में । बीजाई के बाद नमी बचाने के लिए भारी सुहागा लगाएं । दोपहर को बीजाई न करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए १.६ कि.ग्रा. सीमाजीन - ७० घुलनशील पाउडर २७० लीटर पानी में मिलाकर बीजाई के २-३ दिन बाद छिडकें । बीजाई के १०-१७ दिन बाद अंधी गुडाई करके सुहागा लगा दें इससे खरपतवार नियंत्रण में रहेगें । गळ्याने की शरदकालीन फसत्न में ३० दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहें तथा घास फूस निकालते रहें । यदि मोथा की समस्या ज्यादा हो तो २, ४-डी इस्टर का ४०० ग्राम, ३०० लीटर पानी में छिडकाव करें । इस फसल में फरवरी-मार्च माह में दीमक, कनसुआ व जडवेधक का आक्रमण से बचाव करने के लिए २.५ लीटर क्लोरपाइरीफास २० ई सी या १.५ लीटर एण्डोसल्फान ३५ ई सी का ६००१००० लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें।</p> <h3 style="text-align: justify; ">बानिकी</h3> <p style="text-align: justify; ">पोपलर का पेड गहरी उपजाऊ अच्छे जल निकाल वाली भूमि में अच्छा होता है । इसे फरवरी माह में कलमों दवारा २ x २ फुट दूरी पर नर्सरी में लगाया जा सकता है तथा अगले वर्ष पौधों को जनवरी फरवरी में खेत में लगा सकते हैं । नर्सरी में कलमें लगाने से पहले कैप्टान या डायथैन (०.३ प्रतिशत) घोल में डुबोए ताकि बीमारियों से बचाव रहे । पौधों को ३ फुट गहरे गढ़ढ़े खोदकर उपर की आधी मिट्टी में गोबर की सड़ी-गली खाद मिलाकर भरें तथा पूरा पानी लगाएँ । पोधों को मेढों पर कतारों में १० फुट दूरी पर तथा सिंचाई नाली के दोनों ओर कतारों में ७ फुट दूरी पर लगाएँ । यदि खेत में अकेले पापुलर लगाना हो तो १६ x १६ फुट दूरी रखें इससे २७० पौधों लग जाएगें । पौधे लगाने से पहले 1 एकड़ में 1 लीटर क्लोरपाइरीफास पानी के साथ दें । इससे टीमक पर नियंत्रण रहेगा । हर महिने सिंचाई करें ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">मुलेठी</h3> <p style="text-align: justify; ">एक बहुवर्षीय औषध फसल है । यह खांसी दूर करने की दवाई बनाने के काम आती है । इस फसल को फरवरी-मार्च या फिर जुलाई-अगस्त में लगाया जा सकता है । हरियाणा मुलेठी नं.१ पकने में २.७ से 3 वर्ष लेती है तथा ३० किंवटन सूखी जड़ों की पैदावार देती है । बीजाई / रोपाई के लिए १७० कि.ग्रा. ६ ईंच लम्बी ३-४ आखों वाली स्वस्थ्य जड़ों को 3 फुट दूरी पर ३/४ जड के हिस्से का जमीन में दबा दें । पोधों में आपसी दूरी १.७ फुट रखें । खेत तैयारी के समय १७-२० गाडी गोबर की सडी गली खाद के साथ 1 बोरा सिंगल सुपर फास्फेट, आधा बोरा यूरिया डालें बाकी आधा बोरा यूरिया फुटाव के 1 महिने बाद डालें । अच्छी फसल के लिए वर्ष में ७-६ सिंचाईया करें । प्रति वर्ष जनवरी माह में जमीन से ऊपरी भाग को काट दें ताकि फुटाव अच्छा हो तथा फसल को प्रतिवर्ष मार्च में ३/४ बोरा यूरिया सिंचाई के साथ दें । फसल लगने के २.७ - ३ वर्ष बाद १.७ - २ फुट गहरी खुदाई करके जडे निकाल दें ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">फल</h3> <p style="text-align: justify; ">जैसे कि अंगूर, आडू, आलुचा, अनार, नाशपाती आदि फरवरी में लगा सकते हैं । अंगूर की किस्में खाने के लिए बिना बीज की ब्यूटी सीडलैस, डिलाइट , परलेट व थोम्पसन सीडलैस तथा बीज वाली वैकुआ<strong>; </strong>आवाद, चैम्पियन अर्ली, मस्केट, गोल्ड व कार्डिनल हैं I किसमिस बनाने के लिए थोम्प्सन सीडलैस व गोल्ड; डिब्बाबंद के लिए थोम्पसन सीडलैस तथा शर्वत बनाने के लिए ब्यूटी सीडलैस, अलों मस्केट व चैम्पियन किस्में हैं । नीबू जाति के पौधे में सुण्डी छाल खाने तथा तनों में छेद करती हैं । इन छेदों में ३० मि.ली. इण्डोसल्फान ३५ ई सी को १० लीटर पानी में घोलकर डालें यदि तळेने या फत्न गाल रहे हीं तो जनवरी के उपचार बाद फरवरी में स्ट्रेप्टासाइक्लिन का स्प्रे करें । नीबू जाति के फलों तथा आम व लीची फरवरी में खाद व सिंचाई पोधों की आयु के हिसाब से दें । तरबूज की फसल में फरवरी में लग सकती है । जिसके लिए 3 कि.ग्रा. बीज को २.७ -3 फुट दूरी पर २ फुट दूरी बनी मेढों के सिरे पर लगाएं । बीजाई से पूर्व बीज को 1 ग्राम वाविस्टीन में 1 लीटर पानी में १०-१५ घंटे तक भिगोएं तथा गर्म जगह पर अंकुरित कर लें । खेत में १० टन गोबर की खाद, २ बोरे यूरिया, २ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट व 1 बोरा म्युरेट आफ पोटाश बीजाई पर डालें । असाई यामाटों व सुगर बेबी किस्में १००-१२० किंवटल पैदावार देती हैं ।</p> <p style="text-align: justify; ">खरबूज के लिए २.७ ग्राम बीज को २ -२.७ फुट दूरी पर मढो पर लगाएं । बाकी क्रियाएं तरबूज की तरह ही हैं । किस्मो में पूसा शरबती, पूसा मधुरस तथा पूसा रसराज ७७-१०० किंवटल पैदावार दे देती है ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">सब्जियां</h3> <p style="text-align: justify; ">फरवरी माह में बंसत ऋतु की निम्नलिखित सब्जियां लग सकती हैं ।</p> <p style="text-align: justify; ">घीया - की पूसा समर परोलीफिक लोग व राऊड, पूसा नवीन, पूसा मंजरी व पूसा मेघदूत किस्में लगाएं (बीज मात्रा २ कि.ग्रा. दूरी २ x १० फुट ) ।</p> <p style="text-align: justify; ">कछू - की पूसा विश्वास, पूसा विकास, पूसा हाइब्रिड किस्में हैं (बीज मात्रा २.७ कि.ग्रा.दूरी २ x १०फुट) ।</p> <p style="text-align: justify; ">करेला - की पूसा दो फसली तथा पूसा विशेष किस्में हैं( बीज मात्रा २.७ कि.ग्रा. दूरी 1 x ६ फुट) खीरा - जापानी लॉग ग्रीन, स्ट्रेटऐट, पूसा सनयोग किस्में हैं ( बीज मात्रा 1 कि.ग्रा. दूरी 3 x ७ फुट) ।</p> <p style="text-align: justify; ">तोरी - पूसा सुप्रिया व पूसा रसदार किस्में हैं ( बीज मात्रा २ कि.ग्रा., दूरी 3 x १० फुट) । यह सभी बेलदार फसलें हैं तथा नालिया बनाकर इन्हें नाली के ऊपर मेढ़ों के किनारों पर लगाएं । नालियां सिंचाई के काम आती हैं । बीजाई के समय १० टन गोबर की गली-सडी खाद, 1 बोरा यूरिया, १.७ बोरा सिंगल सुपर फास्फेट तथा आधा बोरा म्युरेट आफ पोटाश डालें । जब फसल पर ८-१० पत्ते निकल आएं तो आधा बोरा यूरिया डालें ।</p> <p style="text-align: justify; ">भिन्डी - को भी फरवरी के आखिरी सप्ताह से लेकर मार्च तक बो सकते हैं । ८ कि.ग्रा. बीज को बोने से पहले १२ घंटे ०.०७ प्रतिशत वाविस्टीन घोल में भिगोए फिर 1 फुट कतारों में ६ ईंच की दूरी पर बोयें । खेत की तैयारी के समय १० टन गोबर की सड़ी-गली खाद के साथ आधा बोरा यूरिया १.७ बोरा सिंगल सुपर फास्फेट तथा आधा बोरा म्युरेट आफ पोटाश डालें । उन्नत किस्में पूसा ए-४, पूसा मखमली, पूसा सावनी तथा परकिन लोंग ग्रीन हैं ।</p> <p style="text-align: justify; ">बैंगन व टमाटर - की रोपाई भी फरवरी शुरू में की जा सकती हैं । जिसके लिए नर्सरी नवम्बर में बोई गई थी ।</p> <h3 style="text-align: justify; ">फूल</h3> <p style="text-align: justify; ">सर्दियों के फूल पूरी बहार पर होंगें । फूलों में देशी खाद व पानी लगाएं । फरवरी अंत तक गर्मी के फूलों की नर्सरी की बीजाई कर लें । गुलाब के पोधों की रोपाई तथा ग्रापिटगं भी फरवरी में की जा सकती हैं । गुलदाउदी के पौधों को काट-छांट के बाद गमलों बदल दें । कुछ फूल वाले पेड भी जैसे अमलतास, जैकेरेडा, गुलमोहर इत्यादि भी फरवरी माह में लगाए जा सकते हैं ।</p> <p style="text-align: justify; ">स्रोत: जेवियर सेवा संस्थान, राँची</p> </div>