<h3 style="text-align: justify;">प्रमुख नकदी फसल </h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने की पहचान एक प्रमुख नकदी फसल के रूप में की गई है। भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में इसका विशेष योगदान है। उत्तर भारत के लगभग 60-65 प्रतिशत भू-भाग पर गन्ने की बुआई बंसतकाल में आर्द्रता जमाव और बढ़वार के अनुकूल की जाती है। इस बुआई के लिए मध्यवर्ती और पश्चिमी क्षेत्र जैसे-उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब आदि राज्यों में 15 फरवरी से 15 मार्च तक बुआई का समय उपयुक्त होता है। इसके बाद बुआई करने से गन्ने की फसल को समय कम मिलने के कारण उपज में भारी कमी आ जाती है। क्षेत्रफल अधिक होने के कारण इसकी कम औसत उपज का राष्ट्रीय उत्पादकता पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। फसल से संतोषप्रद उपज प्राप्त करने में क्षेत्र की जलवायु, मृदा और सिंचाई सुविधाओं के आधार पर चयनित उन्नत प्रजातियों का विशेष महत्व है। किसी भी क्षेत्र में शीघ्र पकने वाली, मध्य और देरी से पकने वाली प्रजातियों को क्रमशः एक निश्चित अनुपात 30:40:30 में ही बोना चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">गन्ने की बुआई </h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने की बुआई 15-20 मार्च तक पूरी कर लें। तीन आंख वाले गन्ने के टुकड़ों को 5 मिनट तक 250 ग्राम एरिटान के 100 लीटर पानी के घोल में उपचारित करें। गन्ने की बुआई 75-90 सें.मी. दूरी पर बनी कूंड़ों में 10 सें.मी. की गहराई पर करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">उन्नत प्रजातियां</h3> <h4 style="text-align: justify;">पश्चिमी तथा मध्य क्षेत्रों के लिए</h4> <p style="text-align: justify;">पश्चिमी तथा मध्य क्षेत्रों के लिए गन्ने की शीघ्र पकने वाली उन्नत प्रजातियां जैसे-सी.ओ.एच-92, सी.ओ.एच.-56, सी.ओ.जे.-64, को. पन्त-84211, को.शा.-92254, को.शा.-8436, को.शा.-६८४।</p> <h4 style="text-align: justify;">पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए</h4> <p style="text-align: justify;">पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए को.शा.-8436 व को.शा.-687 प्रमुख हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">मध्य एवं देर से पकने वाली गन्ने की उन्नत प्रजातियां</h3> <h4 style="text-align: justify;">पश्चिमी एवं मध्य उत्तर प्रदेश के लिए</h4> <p style="text-align: justify;">पश्चिमी एवं मध्य उत्तर प्रदेश के लिए मध्य एवं देर से पकने वाली गन्ने की उन्नत प्रजातियां जैसे-सी.ओ.एच.-110, सीओ.एस.-767, सी.ओ.एच.-1148, सी.ओ.एच.-199, सी.ओ.एच.-99, सी.ओ.एस.-8436, सी.ओ.-7717, को.शा.-269, को.शा.-8118, कोशा.-7918, को.शा.-802 व को.शा-767 </p> <h4 style="text-align: justify;">पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए</h4> <p style="text-align: justify;">पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए यू.पी.-12, यू.पी.-15, को.शा.-8407, को.शा.-767 एवं को.शा.-7198 प्रमुख हैं। गन्ने की बुआई के लिये एक आंख वाले टुकड़े 1,33,750, दो आंख वाले टुकड़े 60,000-65,000 एवं तीन आंख वाले टुकड़े 40,000-45,000 या 60-70 क्विंटल/हैक्टर बीज के लिए पर्याप्त होते हैं। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="240" height="133" /></p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग</h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने की फसल में मृदा परीक्षण क आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। यदि मृदा परीक्षण न हुआ हो तो बुआई के समय प्रति हैक्टर 60-75 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 80 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 60 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग करें। गन्ने की पेड़ी फसल में प्रति हैक्टर 90 कि.ग्रा. नाइट्रोजन गन्ना काटने के बाद तथा इतनी ही मात्र तीसरी सिंचाई के समय प्रयोग करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण</h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने की पेड़ी से अच्छी फसल लेने के लिए खरपतवार नियंत्रण के लिए उगने से पहले एट्राजिन 2 कि.ग्रा. का सक्रिय तत्व के रूप में प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। पेड़ी की फसल में 12-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई अवश्य करते रहें। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>