मिट्टी मूंग व उड़द की खेती उत्तर भारत की बलुई-दोमट मृदा से लेकर मध्य भारत की लाल एवं काली मृदा में भलीभांति की जा सकती है। इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई-दोमट मृदा उपयुक्त मानी जाती है। बुआई से पहले खेत में उचित नमी का होना अतिआवश्यक है। बारीक, भुरभुरे व चूर्णित खेत मूंग व उड़द की खेती के लिये अच्छे माने जाते हैं। खेत की 2-3 बार जुताई/हैरोइंग पर्याप्त होती है। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगायें, जिससे मृदा की नमी संरक्षित रहे। बुआई का उपयुक्त समय बुआई का उपयुक्त समय वायुमण्डलीय तापमान, मृदा की नमी व फसल प्रणाली पर निर्भर करता है। ग्रीष्मकालीन/बसन्त मूंग की बुआई का उपयुक्त समय 10 मार्च से 10 अप्रैल तक है। उड़द की बुआई का उपयुक्त समय 15 फरवरी से 15 मार्च तक है। सरसों, गेहूं, आलू की कटाई के उपरान्त 70 से 80 दिनों में पकने वाली प्रजातियों की बुआई की जा सकती है। किसी कारणवश खेत समय पर तैयार न हो तो वहां पर मूंग एवं उड़द की 60-65 दिनों में पकने वाली प्रजातियों की बुआई, 15 अप्रैल के बाद कर सकते हैं। यदि किसान मूंग एवं उड़द की बुआई देर से करते हैं तो नमी की कमी फसल की धीमी वृद्धि, अगली फसल की बुआई में देरी एवं रोगों व कीटों के अधिक प्रकोप की समस्याएं आ सकती हैं। उन्नत प्रजातियां मूंग की उन्नत प्रजातियां मूंग व उड़द की अच्छी पैदावार तथा उत्तम गुणवत्तायुक्त उत्पादन लेने के लिए अच्छी प्रजाति का चयन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसीलिए सिंचाई के साधन, फसलचक्र व बाजार की मांग की स्थिति को ध्यान में रखकर उपयुक्त प्रजातियों का चनुाव करें। मूंग की उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा 9531, पूसा रत्ना, पूसा 672, पूसा विशाल, समा्रट, मेहा, आर.एम.जी. 268, आर.एम.जी., 492 पंत मूंग 4, पंत मूंग 5, पंत मूंग 6, एस.एम.एल. 668, एस.एम.एल. 832, एच.यू.एम. 1, एच.यू.एम. 2, एच.यूएम. 6, एच.यू.एम. 12, एच.यू.एम. 16, गंगा 8, एम.एल. 818, टी.एम.बी. 37, बसंती, आई.पी.एम. 02-14, आईपी.एम. 02-14 उड़द की उन्नत प्रजातियां उड़द की उन्नत प्रजातियां जैसे-शेखर 1, उत्तरा, आजाद उड़द 1, शेखर 2, शेखर 3, पंत उड़द 31, पंत उड़द 40र्, आइ.पी.यू. 02-43, डब्ल्यू.बी.यू. 108, माश 1008, माश 479, माश 391 व सुजाता प्रमुख हैं। बीज दर का निर्धारण मुख्यतः बीज के आकार, नमी की स्थिति, बुआई का समय, पौधों की पैदावार तथा उत्पादन तकनीक पर निभर्र करता है। ग्रीष्मकालीन मूंग एवं उड़द की बुआई के लिये 20-25 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर पर्याप्त होता है। ग्रीष्मकालीन मूंग एवं उड़द की फसल में पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 30 सें.मी. होनी चाहिए। बीज की र्बुआइ कूंड़ों में या सीडड्रिल से पंक्तियों में की जानी चाहिए तथा बीजों को 4-5 सें.मी. गहर्राइ में बोना चाहिए। कवक एवं जीवाणुजनित रोग मृदा एवं बीजजनित कई कवक एवं जीवाणुजनित रोग होते हैं। ये मृदा अंकुरण होते समय तथा अंकुरण होने के बाद बीजों को कापफी क्षति पहुंचाते हैं। बीजों के अच्छे अंकुरण तथा स्वस्थ पौधों की पर्याप्त संख्या के लिए बीजों को कवकनाशी से बीज उपचार के लिये प्रति कि.ग्रा. बीज को 2-2.5 ग्राम थीरम तथा 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम से उपचार करने के बाद राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार करना चाहिए। बुआई के समय बीज डालने से पहले सल्फर धूल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। इसी प्रकार फॉस्फेट घुलनशील बैक्टीरिया (पीएसबी) से बीज का शोधन करना भी लाभदायक होता है। उर्वरकों का प्रयोग उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाना चाहिए। मूंग की फसल के लिये 10-15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 45-50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 50 कि.ग्रा. पोटाश एवं 20-25 कि.ग्रा. सल्फर/हैक्टर के दर से बुआई के समय कूंड़ों में देना चाहिए। कुछ क्षेत्रों में जस्ता या जिंक की कमी की अवस्था में 20 कि.ग्रा./ हैक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए। उड़द की फसल के लिये नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं गंधक (सल्फर) क्रमशः 15, 45 एवं 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय कूंड़ों में देना चाहिए। नवीनतम प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का पर्णीय छिड़काव यदि फली बनने की अवस्था में किया जाये तो उपज में निश्चित रूप से वृद्धि होती है। खरपतवार की समस्या बुआई के प्रारंभिक 4-5 सप्ताह तक खरपतवार की समस्या अधिक रहती है। पहली सिंचाई के बाद निराई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मृदा में वायु का संचार भी होता है, जो मूल ग्रन्थियों में क्रियाशील जीवाणुओं द्वारा वायुमंडलीय नाइट्रोजन एकत्रित करने में सहायक हाेता है। खरपतवाराें के रासायनिक नियंत्रण के लिए 2.5-3.0 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर बुआई के 2 से 3 दिनों के अन्दर अंकुरण के पूर्व छिड़काव करने से 4 से 6 सप्ताह तक खरपतवार नहीं निकलते हैं। चाैड़ी पत्ती तथा घास वाले खरपतवार को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिये एलाक्लोर की 4 लीटर या फ्लूक्लाेरिन (45 ई.सी.) नामक रसायन की 2.22 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के तुरन्त बाद या अंकुरण से पहले छिड़काव कर देना चाहिए। अतः बुआई के 15-20 दिनों के अन्दर कसोले से निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए। स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012