<table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 98.6043%;"> <h3 style="text-align: justify;">चना</h3> <h4>फलीछेदक का नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">चना फलीछेदक कीट एक बहुभक्षी और चने की फसल में लगने वाला प्रमुख कीट है। चना पफलीछेदक की प्रथम अवस्था की सूंडियां कोमल पत्तियों को खुरच-खुरच कर खाती हैं। यह सूंडी 5-6 बार केंचुल उतारती है और धीरे-धीरे बड़ी होती जाती है। तीसरी अवस्था की सूंडियां चने की फलियों में मुंह घुसाकर दाना खाती हैं। दाना खाने के बाद सूंडी मुंह निकाल लेती हैं और फिर दूसरी फली में छेदकर दाना खाती है। इसके चलते फलियों में गोल-गोल छेद बन जाते हैं। एक सूंडी अपने जीवनकाल में 30-३५ दाने खाती है। इस प्रकार यह कीट चना की फसल को बहुत हानि पहुंचाता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="275" height="144" /></p> <p style="text-align: justify;">चने में फलीछेदक के नियंत्रण के लिए इंडोक्साकार्ब 0.02 प्रतिशत घोल (1 मि.ली. प्रति लीटर पानी) या साइपरमैथ्रिन (25 ई.सी.) 125 मि.ली. या कार्बोरिल (50 डब्ल्यू.पी.) १००० मि.ली. या मोनोक्रोटोफाॅस (36 ई.सी.) 750 मि.ली. या क्यूनालफाॅस (25 ई.सी.) 1.५ लीटर या डाइमिथ्रोएट (30 ई.सी.) 400 मि.ली., 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से पहला छिड़काव अवश्य करें या चने की फसल में फलीछेदक कीट के नियंत्रण के लिए एनपीवी (न्यूक्लियर पालीहेड्रोसिस वायरस) 250-350 शिशु समतुल्य 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। चने में 5 प्रतिशत एनएसकेई या 3 प्रतिशत नीम ऑयल तथा आवश्यकतानुसार कीटनाशी का प्रयोग करें। </p> </td> </tr> </tbody> </table> <h4>फसल की कटाई </h4> <p style="text-align: justify;">दलहनी फसलें इस माह में परिपक्वता की स्थति में आ जाती हैं। चने की फसल की कटाई विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु, तापमान, आर्द्रता एवं दानों में नमी के अनुसार विभिन्न समय पर होती है। सामान्य रूप से जब चने की फसल से पत्तियां झड़ने या गिरने लगती हैं और तने के साथ-साथ फलियां भी भूरे से हल्के पीले रंग में बदलने लगती हैं। दाने सख्त व अन्दर से खड़खड़ की आवाज आने लगती है। इसके साथ ही दानों में नमी 15 प्रतिशत के लगभग होती है। उस समय फसल की कटाई हंसिया या शक्तिचालित यंत्रों से करते हैं। किसान भाइयों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि फसल के अधिक पकने से फलियां टूटकर गिर जाती हैं, जिससे उत्पादन पर असर पड़ता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">मड़ाई (थ्रेसिंग)</h4> <p style="text-align: justify;">काटी गई फसल को एक स्थान पर इकट्ठा करके खलिहान में लगभग 4-5 दिनों तक इसको धूप में सुखाकर मड़ाई की जाती है। मड़ाई (थ्रेसिंग) हाथ से पीटकर, बैलों द्वारा या थ्रेसर से कर सकते हैं अथवा कम्बाइन के द्वारा कटाई एवं मड़ाई का कार्य पूर्ण करें। दानों को तब तक सुखाया जाता है, जब तक कि उसमें 10-12 प्रतिशत नमी रहे।</p> <h4 style="text-align: justify;">दूसरी सिंचाई</h4> <p style="text-align: justify;">देर से बोई गई सिंचित चने की फसल में यदि आवश्यकता हो तो दूसरी सिंचाई बुआई के 100 दिनों बाद की जा सकती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">काबुली चना </h4> <p style="text-align: justify;">काबुली चने के लिए यह समय बहुत संवेदनशील माना जाता है। फसल की परिपक्वता का अनमुान पत्तियों एवं दानों की स्थिति पर निर्भर करता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">हरी मटर</h3> <h4>कटाई </h4> <p style="text-align: justify;">मार्च में हरी मटर कम होने के साथ-साथ दाने वाली मटर की फसल तैयार हो जाती है। अगर मटर की फलियां सूख कर पीली पड़ जाएं, तो उन की कटाई कर लेनी चाहिए। गहाई करने के बाद मटर के दानों को इतना सुखाएं कि सिर्फ 8 प्रतिशत नमी ही बचे। मटर की फसल से प्रायः 100-120 क्विंटल प्रति हैक्टर (हरी फलियां) एवं 15-20 क्विंटल प्रति हैक्टर दानों की पैदावार प्राप्त हो जाती है। समय से कटाई भी बीजों को बिखराव से बचाती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">मड़ाई</h4> <p style="text-align: justify;">मटर की फसल पूरी तरह से पक जाए और धूप में पर्याप्त सुखाने के बाद ही मड़ाई करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">मसूर</h3> <h4>हल्की सिंचाई </h4> <p style="text-align: justify;">मसूर में फली बनने की अवस्था में हल्की सिंचाई करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">कटाई</h4> <p style="text-align: justify;">जब फलियां पक जायें (70-80 प्रतिशत फलियां सूखने जैसी अवस्था में आ जायें) तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। फसल को खेत में सुखाकर दाने अलग कर लेने चाहिए। पकने के बाद फसल को अधिक समय तक खेत में खड़ी न रहने दें। देर से कटाई करने पर फलियों से दाने छिटकने के कारण उपज की हानि होती है। खेसारी (लेथाइरस सैटाइवस) की फसल हल्की पीली पड़ने पर कटाई करें। हंसिए से फसल की कटाई की जाती है। अधिक पक जाने पर फलियां चटकने लगती हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="169" height="130" /></p> <h4 style="text-align: justify;">घुन का उपचार</h4> <p style="text-align: justify;">फसल की गहाई कर दानों को अच्छी तरह सुखाकर (8-10 प्रतिशत नमी) भण्डारण करने पर घुन नहीं लगता है। इसके साथ ही भण्डार गृह में घुन का उपचार अवश्य करें। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>