आम मिलीबग या गुजिया आम के पौधों में मिलीबग या गुजिया प्रमुख कीट है। इसकी मादा कीट मार्च-अप्रैल में पौधों से नीचे उतरकर मृदा की दरारों में अंडे देती हैं। मादा कीट हजारों की संख्या में कोमल अंग जैसे-बौर, पत्तियां इत्यादि को चूसकर सुखा देती हैं। इनकी रोकथाम के लिए दिसंबर में आम के मुख्य तने के चारों तरफ ग्रीस (मृदा की सतह से 12 इंच ऊपर) लगाकर उस पर पॉलीथीन की पट्टी(50 सें.मी. चौड़ी) लगा देनी चाहिए। तने के आसपास क्लोरोपायरीफॉस 250 ग्राम प्रतिवृक्ष की दर से मृदा में मिला देनी चाहिए। इस समय मृदा में मौजूद नमी को बनाए रखने के लिए पौधे के तने के चारों तरफ सूखे खरपतवार या काली पॉलीथीन की मल्चिंग बिछाना लाभदायक पाया गया है। भुनगा कीट आम में भनुगा कीट से बचाव के लिए मोनोक्रोटोफॉस एक मि.ली. अथवा डाईमेथोएड 1.6 मि.ली. प्रति लीटर पानी में तथा आम में चूर्णिल आसिता रोग (पाउड्री मिल्ड्यू) सामान्यतः नई मंजरियों, पत्तियों एवं नये फलों पर आता है। इसकी राकेथाम के लिए 500 ग्राम/पौधा गंधकचूर्ण का प्रयोग करना चाहिए। दायानोकेप एक मि.ली./लीटर पानी का छिड़काव मार्च में 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए या कैराथेन एक मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। आम में सड़न/आंतरिक सड़न के नियंत्राण के लिए बोरैक्स 6 ग्राम एक लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। उपरोक्त रोगों एवं कीट के विरुद्ध उपयुक्त रासायनों को एक साथ मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं। केला केला में 25 ग्राम नाइट्रोजन की मात्रा को पौधे से 40-50 सें.मी. दूर गोलाई में डालकर चारों तरफ निराई-गुड़ाई करके मृदा में मिला दें तथा सिंचाई करें। आंवला आंवले के लिए कंचन, कृष्णा, नरेन्द्र आंवला-6, नरेन्द्र आंवला-7, नरेन्द्र आंवला-10 किस्में अनुशंसित की जाती हैं। बीज को बोने से 12 घंटे पहले पानी में भिगो देना चाहिए, जो बीज पानी में तैरने लगें उन बीजों को फेंक देना चाहिए। अंगूर अंगूर की मुख्य शाखा से अनावश्यक पत्तियों को तोड़ दें तथा लता को जाल पर व्यवस्थित कर दें। अंगूर के फलों का आकार व वजन बढ़ाने के लिए 50-60 प्रतिशत फूल खिलने की अवस्था पर 30-40 मि.ग्रा. जिब्रैलिक एसिड/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। अगर अंगूर की फसल में रोगों व कीटों का प्रकोप नजर आए तो कृषि वैज्ञानिक की सलाह से जरूरी उपचार करें। बेर बेर में फल मक्खी की रोकथाम के लिए मैलाथियान (50 ई.सी.) 200 मि.ली. को 200 लीटर पानी मे घोलकर तथा उसमें 2 कि.ग्रा. गुड़ मिलाकर एक सप्ताह के अंतराल पर छिड़काव करें। फलों के पौधे बरसात के मौसम में नवरोपित फलों के पौधों की निराई-गुड़ाई व सिंचाई करें। पपीते गर्मियों में पपीते की नर्सरी के लिए रोग तथा कीटमुक्त स्वस्थ मृदा का चुनाव करें। क्यारी की अच्छी तरह से जुताई करके मृदा को भुरभुरा करें। 5 कि.ग्राबालू, 20 कि.ग्रा. गोबर की खाद एवं एक कि.ग्रा. नीम की खली को मृदा में अच्छी तरह से मिलाकर क्यारियां बनायें तथा क्यारी को समतल कर लें। नर्सरी के लिये केवल स्वस्थ व परिपक्व बीज ही उपयोग करें। बीजों को आधा सें.मी गहरा, एक इंच बीज से बीज की दूरी पर तथा तीन इंच पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर बोयें। क्यारी के चारों ओर मेंड़ बनायें तथा फव्वारे से क्यारी की सिंचाई करें। पौधों को तेज धूप से बचाने के लिए क्यारी के ऊपर एक 3-4 फीट ऊंचा छप्पर बनायें। प्रत्येक 2-3 दिनों के अन्तराल पर फव्वारे द्वारा क्यारी की सिंचाई करते रहें। इस प्रकार बोये गये बीज 15-20 दिनों में उग आते हैं। बागों में अधिकतर पेड़ लगाने, काट-छांट व खाद-पानी देने का कार्य शीघ्र कर लीजिए। मार्च में बागों में पानी जरूर दें। पपीता, आम, और अमरूद इत्यादि के बगीचों की ठीक से सफाई करें। उनमें जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें व खाद डालें। अमरूद अमरूद में उकठा रोग नियंत्रण के लिए 30 ग्राम बाविस्टीन को 15 लीटर पानी में मिलाकर प्रति पेड़ की जड़ों में प्रयोग करें। लीची फल लगने के एक सप्ताह बाद प्लैनोफिक्स (2 मि.ली./4.8 लीटर) या एन.ए.ए. (20 मि.ग्रा./लीटर) का एक छिड़काव करके फलों को झड़ने से बचाएं। फल लगने के 15 दिनों बाद बोरिक अम्ल(2 ग्राम/लीटर) या बोरेक्स (5 ग्राम/लीटर) के घोल का 15 दिनों के अंतराल पर तीन छिड़काव करने से फलों का झड़ना कम हो जाता है। इससे मिठास में वृद्धि होती है तथा फल के आकार एवं रंग में सुधार होने के साथ-साथ फल फटने की समस्या भी कम हो जाती है। स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषिअनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012