गेहूँ (1) सिंचित अवस्था वाली किस्मों के लिए 120 किलो नेत्रजन, 60 किलो स्फुरद तथा 40 किलो पोटाश प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें | नेत्रजन की आधी तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय प्रयोग करें | नेत्रजन की शेष आधी मात्रा, दो बार में, पहली एवं दूसरी सिंचाई के बाद डालें | (2) असिंचित अवस्था में गेहूँ की खेती के लिए 80 किलो नेत्रजन, 40 किलो स्फुरद तथा 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें | बुआई के समय, 40 किलो नेत्रजन तथा स्फुरद एवं पोटाश की पूरी मात्रा डालें नेत्रजन की शेष मात्रा प्रथम एवं द्वितीय सिंचाई पर दें| चना (1) यदि चने की बुवाई धान की फसल कटने के बाद करनी हो तो ऐसी स्थिति में बुवाई दिसम्बर के मध्य तक अवश्य कर देनी चाहिए अन्यथा अधिक विलम्ब होने पर पैदावार कम हो जाती है | (2) खरपतवारो द्वारा फसल में होने वाले नुकसान से बचने के लिए बुवाई से 25-30 दिनों बाद पहली निकाई-गुड़ाई तथा 60-70 दिन बाद दूसरी निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए | तीसी तीसी की तीन कतारों के बाद एक कतार चना या सरसों बोना चाहिए | इससे कीटों का प्रकोप कम होता है तथा अच्छी उपज मिलती है | चना की पंत जी – 114 तथा सरसों की शिवानी किस्म अच्छी पायी गयी है | राई-सरसों (1) अच्छी पैदावार हेतु बोआई के 25 दिनों के बाद निकौनी कर लेनी चाहिए | (2) जल-प्रबंधन: दो से तीन सिंचाई इस फसल के लिए काफी है | पहली सिंचाई पौधे की बढ़ोत्तरी के लिए 25-30 दिनों के अंदर कर देना चाहिए | दूसरी सिंचाई फूल आने पर तथा अंतिम या तीसरी सिंचाई फली बनने के समय करनी चाहिए | आलू (1) अगात तथा पिछात झुलसा रोग से बचाव के लिए इंडोफिल एम 45 या रिडोमिल एम झेड दवा के 0.2% घोल का छिड़काव 2-3 बार करें | (2) बीज के लिए लगाये गये आलू के खेत में दोबारा मिट्टी ण चढायें तथा लगायी गयी फसल में बार-बार न जायें अन्यथा सम्पर्क से विषाणु रोग फैलने का डर रहता है| आम (1) आम में परागण मधुमक्खियों द्वारा होता है | अत: फल आने के समय कीटनाशक दवाओं का प्रयोग न करें अन्यथा फलन प्रभावित होती है | (2) यदि पत्ती खाने वाले कीड़े का प्रकोप दिखाई दे तो उसके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफ़ॉस या क्कीनालफास दवा का 1.5 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर 2 छिड़काव करें | लीची लीची के पूर्ण विकसित पौधे जिनमें फल लगना प्रारम्भ हो गया हो उसमें फूल आने के 3-4 माह पूर्व पानी नहीं देना चाहिए | पपीता नमी की कमी अथवा अधिकता के कारण फल उत्पादन कम हो जाता है | इसलिए जाड़े के दिनों में 15 दिन के अंतराल पर तथा गर्मी के दिन में 7-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए| जब पेड़ फल से लदा हो तो उस समय सिंचाई करना अति आवश्यक है | आँवला फल सड़न: (अल्टरनेरिया अल्टरनेटा) को प्रतिबंधित करने के लिए फल तोड़ने के 15 दिनों पूर्व 0.1 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करना चाहिए | पशुपालन दुग्ध ज्वर/मिल्क फीवर/कैल्शियम की कमी: प्रभावित पशु – गाय, भैंस तथा बकरी | यह रोग अधिक दूध देने वाले पशुओं में बहुधा प्रसव के बाद होता है | लक्षण यह रोग बछड़ा देने के 12-72 घंटे के अंदर दिखाई देता है | शरीर का तापक्रम 100% फारेनहाइट या इससे कम हो जाता है | पशु कांपता है और सिर हिलाता है | पुंछ ऐंठन, जीभ बाहर निकलना और दांत किटकिटाना इत्यादि प्रमुख लक्षण है | पशु खड़ा होता है और पुन: बैठ जाता | अंत में सारा शरीर ठंडा पड़ जाता है | पशु खाना-पानी बंद कर देता है तथा अपने सिर को मोड़कर छाती पर रख लेता है या आगे की ओर खींच कर भूमि पर रख लेता है | आखों की झिल्ली लाल हो जाती है तथा एक करवट लेकर पड़ा रहता है | उपचार इसमें कैल्शियम बोरोगलूकोनेट या थायोसोल 200-450 मि.ली. शिरा में दें | बड़े पशु को 900 मि.ली. दवा धीरे-धीरे शिरा में दें | इसके साथ ऐभील 10 मि.ली. मांस में दें | टोनोफास्फेन 10-20 मि.ली. मांस में सप्ताह में दो दिन दें | स्त्रोत: राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)