जैट्रोफा खाद एवं उर्वरक: रोपन से पूर्व गड्ढे में मिट्टी (4 किलो), कम्पोस्ट की खाद (3 किलो) तथा रेत (3 किलो) के अनुपात का मिश्रण भरकर 20 ग्राम यूरिया, 120 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 15 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश डालकर मिला दें | दीमक नियंत्रण के लिए क्लोरोपायरिफास पाउडर (50 ग्राम) प्रति गड्ढा में डालें, तत्पश्चात पौधा रोपन करें | संकर धान खेत में दानेदार कीटनाशी कार्बोफ्युरॉन फ्युराडॉन जी 30 किलोग्राम प्रति हेक्टर या फोरेट 10 जी (10 किलोग्राम प्रति हेक्टर) बिचडों की रोपाई के 3 सप्ताह बाद डाले | इसके पश्चात मोनिक्रोटोफ़ॉस 36 ई.सी. (1.5 लीटर प्रति हेक्टर) या क्लोरपायरीफ़ॉस 20 ई.सी. (2.5 लीटर प्रति हेक्टर) का 15 दिनों के अंतराल पर दो छिड़काव करें ताकि फसल कीटों के आक्रमण से मुक्त रहें | सरगुजा बुआई के 20-25 दिनों के बाद खेत से खरपतवार खुरपी द्वारा निकाल देनी चाहिए | साथ ही अनावश्यक पौधों की छटनी कर देनी चाहिए | दो बार गुड़ाई कर खरपतवार पर नियंत्रण पाया जा सकता है | हल्दी स्केल कीट के नियंत्रण हेतु नीम के बीज का घोल (5%) या नीम निर्मित कीटनाशी (निम्बेसिडीन, अचूक, निमेरिन) का छिड़काव (2.0 मि.ली./लीटर पानी) करने से पत्र लपेटक, भृंग तथा स्केल कीट को नियंत्रित किया जा सकता है | धान रोपे गये धान में फास्फोरस (सिंगल सुपर फास्फेट) व पोटाश (म्यूरेट ऑफ़ पोटाश) तथा एक चौथाई नेत्रजन का प्रयोग करें | नेत्रजन की शेष मात्रा दो या तीन बार किस्म की अवधि के अनुसार 3 तथा 6, या 3, 6 तथा 9 सप्ताह बाद यूरिया द्वारा ट्रॉपड्रेसिंग करें | आम सिल्ली कीट की रोकथाम के लिए 5-10 अगस्त के बीच क्किनॉलफ़ॉस (0.04 प्रतिशत) का 10-15 दिनों के अंतराल पर 3 छिड़काव करें | कीट प्रभावित टहनियों के नुकीली गाँठो की छंटाई करें | लीची छिलका खाने वाले पिल्लू (बार्क इटिंग कैटरपिलर) के रोकथाम के लिए जीवित छिद्रों में पेट्रोल या नुवान या फार्मलीन से भीगी रुई ठूंसकर चिकनी मिट्टी से बंद कीजिए | इन कीड़ो से बचाव के लिए बगीचे को साफ़ रखना श्रेयस्कर पाया गया है | पपीता कॉलर रॉट के प्रकोप से पौधे जमीन के सतह से ठीक ऊपर गल कर गिर जाते है | इसके नियंत्रण के लिए पौधशाला से पौधों को रिडोमिल (2 ग्रा.ली.) दवा का छिड़काव करें, खेत में जलभराव न होने दें और जरूरत पड़ने पर खड़ी फल में भी रिडोमिल (2 ग्रा.ली.) के घोल से जल सिंचन करें | केला पनामा विल्ट के रोकथाम के लिए बैविस्टीन के 1.5 मि. ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल से पौधों के चारों तरफ की मिट्टी को 20 दिन के अंतराल से दो बार छिड़काव कर देना चाहिए | अमरुद जस्ता तत्व की कमी होने से पत्तियों का पिला पड़ना, छोटा होना तथा पौधों की बढ़वार कम हो जाने के लक्षण मिलते है | इसके नियंत्रण के लिए 2 प्रतिशत जिंक सल्फेट का छिड़काव अथवा 300 ग्रा. जिंक सल्फेट (कृषि ग्रेड) का पौधों की जड़ों में देना लाभप्रद पाया गया है | आँवला नीली फफूंद रोग को प्रतिबंधित करने के लिए फलों को बोरेक्स या नमक से उपचारित करने से रोग को रोका जा सकता है | फलों को कार्बेन्डाजिम या थायोफनेट मिथाइल 0.1% से उपचारित करके भी रोग नियंत्रित किया जा सकता है | कटहल तना बेधक कीट के नियंत्रण हेतु छिद्र को किसी पतले तार से साफ़ करके नुवाक्रान का घोल (10 मिली./ली.) अथवा पेट्रोल या केरोसिन तेल के चार-पाँच बूंद रुई में डालकर गीली चिकनी मिट्टी से बंद कर दें | इस प्रकार वाष्पीकृत गंध के प्रभाव से पिल्ल मर जाते हैं एवं तने में बने छिद्र धीरे-धीरे भर जाते हैं | पशुपालन एथ्रेक्स (विष ज्वर) एथ्रेक्स एंटी सीरम – गाय – भैंस में 100-150 मि.ली. चमड़े में तथा भेड़ बकरी में 50-100 मि.ली. चमड़े में | पनीसिलीन – बड़े पशुओं में 20-30 लाख यूनिट मांस में | एम्पीसिलीन- 2 ग्राम मांस अथवा शिरा में प्रति 12 से 14 घंटे में | टेट्रासाइक्लीन (टेरामाइसिन) अथवा नियोमाइसिन 20-30 मि.ली. तथा अगले दिन से आधी मात्रा पाँच दिन तक दें | सल्फामेजाथीन सोडियम (33.3:) 50-100 मि.ली. चमड़े में अथवा शिरा में दें | स्त्रोत: राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)