<h3 style="text-align: justify;">जैट्रोफा</h3> <p style="text-align: justify;">रोग नियंत्रण: कोमल पौधों में जड़-सड़न तथा तना बिगलन रोग मुख्य है | नर्सरी तथा पौधों में रोग के लक्षण होने पर 2 ग्राम बीजोपचार मिश्रण प्रति लीटर पानी में घोल को सप्ताह में दो बार छिड़काव करें |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">संकर धान</h3> <p style="text-align: justify;">पौधशाला से बिचड़े को उखाड़ने के बाद जड़ों को धोकर रोपाई से पूर्व बिचड़ों की जड़ों को क्लोरपायरीफ़ॉस 2 कीटनाशी के घोल (1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) में पूरी रात (12 घंटे) डुबो कर उपचारित करें | रोपाई के लिए 15-20 दिनों की उम्र के बिचड़ों का प्रयोग करें |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">अरहर</h3> <p style="text-align: justify;">अरहर की खेती में चूने की अनुशंषा की गयी है जिससे मिट्टी की अम्लीयता को ध्यान में रखकर 300 से 400 किलोग्राम प्रति हेक्टर कतारों में डालना चाहिए | उपयुक्त उर्वरक को बुआई के समय कूड़ में गहराई (10-15 से.मी.) में देने से पौधा द्वारा इसका उपयोग अच्छी तरह से होता है |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">सरगुजा</h3> <p style="text-align: justify;">अच्छी उपज के लिए 20:20:20 किलो एन.पी.के प्रति हेक्टर (45 किलो ग्राम यूरिया, 130 किलो ग्राम सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट, एवं 32 किलो ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश) प्रति हेक्टर की दर से डालना चाहिए | नेत्रजन की आधी तथा सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय दें |</p> <h3 style="text-align: justify;">हल्दी</h3> <p style="text-align: justify;">प्रकंद एवं तना बेधक कीट के नियंत्रण हेतु आक्रमण प्रारम्भ होने पर क्लोरपायरीफ़ॉस 20 ई.सी. का घोल (2.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी) से तना के आधार के पास छिड़काव करें |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">धान</h3> <p style="text-align: justify;">मध्य जुलाई में बोने के लिए कुफरी चन्द्रमुखी, तथा अगस्त माह के मध्य तक कुफरी कुबेर (ओ.एन. 2236) तथा कुफरी अशोका लगावें | अगस्त अंत से सितम्बर मध्य तक कुफरी अशोका, कुफरी लालिमा तथा अल्टीमस लगावें |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">आम</h3> <p style="text-align: justify;">पूरी-खाद एवं आधी उर्वरक की मात्रा का प्रयोग करें एवं शेष आधे उर्वरक को सितम्बर माह में वृक्ष के क्षत्रक के नीचे गोलाई में देकर अच्छी तरह से मिला दें |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">लीची</h3> <p style="text-align: justify;">अधिक औजपूर्ण एवं स्वस्थ क्ल्लों के विकास के लिये खाद, फ़ॉस्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण एवं नत्रजन की दो तिहाई मात्रा फल की तोड़ाई एवं वृक्ष के काट-छांट के साथ-साथ देना चाहिये|</p> <h3 style="text-align: justify;">पपीता</h3> <p style="text-align: justify;">रिंग स्पाट वायरस तथा मोजैक के नियंत्रण के लिए पौधों के छोटी अवस्था में ही वायरस फैलाने वाले कीटों (एफिड) के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास 1.25 मि.ली./ली. का 2-3 छिड़काव करें|</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">केला</h3> <p style="text-align: justify;">केले का धुन (बनाना विविल) अधिक प्रकोप होने पर एक मिली फास्फोमिडान प्रति 3 लीटर पानी अथवा डाईमिथोएट 1.0 मिली अथवा ऑक्सी डीमेटॉन मिथाइल 1.25 मिली का प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए | आवश्यकता पड़ने पर 15-20 दिन बाद यह छिड़काव दुबारा कर देना चाहिए |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">अमरुद</h3> <p style="text-align: justify;">उकठा रोग के रोकथाम के लिए कालीसेना (एस्पर्जिलस नाइजर के व्यावसायिक स्वरूप) नामक जैव कीटनाशी का पौधरोपण के समय प्रयोग करने से आंशिक सफलता मिली है| इस जैव कीटनाशी की 50 ग्रा. मात्रा व 5 कि.ग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ गड्ढे में मिलाकर पौध रोपाई करें | पौधों में पोटेशियम एवं करंज की खली के प्रयोग से उकठा रोग की उग्रता में कमी पायी गयी है |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">आँवला</h3> <p style="text-align: justify;">काली फफूंद के प्रकोप को 2% स्टार्च के छिड़काव के द्वारा रोका जा सकता है | यदि प्रकोप अधिक हो तो स्टार्च में 0.05% मोनोक्रोटोफ़ॉस तथा 0.2% घुलनशील गंधक मिला कर छिड़काव करना चाहिए |</p> <h3 style="text-align: justify;">नींबू वर्गीय फल</h3> <p style="text-align: justify;">संतरा और मौसमी के प्रत्येक पौधे को 20-30 किग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद, 1-1.5 किग्रा. यूरिया, 1-1.5 किग्रा. सि.सु.फा. तथा 0.5-0.6 किग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वर्ष देने चाहिए | इसके साथ ही साथ फल देने वाले पौधों को जिंक सल्फेट (200 ग्रा./पौधा) तथा बोरान (100 ग्रा./पौधा) भी दिया जाना चाहिए |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">काजू</h3> <p style="text-align: justify;">प्रथम वर्ष में 300 ग्राम यूरिया, 200 ग्रा. रॉक फ़ॉस्फेट, 70 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति पौधा की दर से दें | दूसरे वर्ष इसकी मात्रा दुगुनी कर दें और तीन वर्ष के बाद पौधों को 1 किग्रा यूरिया, 600 ग्रा. रॉक फ़ॉस्फेट एवं 200 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वर्ष मई-जून और सितम्बर-अक्टूबर के महीनों में आधा-आधा बांटकर देते रहें |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">पशुपालन</h3> <p style="text-align: justify;">कंधा पकना बैलों के कंधे पर जुआर रखने से कंधों में सूजन आ जाती है | इस सूजन में दर्द भी रहता है धीरे-धीरे यह घाव मवाद से भर जाता है | सबसे पहले बैल को आराम देना चाहिए | सूजन को मैग्नेशियम सल्फेट की गुनगुने पानी में मिला कर कपड़े की पट्टी से सिंकाई की जाती है |</p> <p style="text-align: justify;"> </p> <p style="text-align: justify;"><strong><em>स्त्रोत: राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)</em></strong><strong><em> </em></strong><strong><em> </em></strong></p>