गेहूँ खरपतवार नियंत्रण हेतु: बोआई के 30-35 दिनों बाद आईसोप्रोटूरॉन 0.75 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व का 400 ग्राम, एवं 2, 4-डी 0.5 किलोग्राम सक्रिय तत्व का 400 ग्राम को 600 लीटर प्रति हेक्टर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये | चना जिन खेतों में बोरोन तथा मोलिब्डेनम की कमी हो वहाँ 10 किलोग्राम बोरेक्स पाउडर व 10 किलोग्राम अमोनियम मोलिब्डेट प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए | तीसी खड़ी फसल में लीफ ब्लाईट तथा रतुआ रोग के नियंत्रण के लिए 2 ग्राम इंडोफिल एम-45 या 3 ग्राम ब्लाईटाक्स 50 प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें | राई-सरसों कीट-नियंत्रण: लाही (अहिल्लवी) से इस फसल को काफी नुकसान होता है | रोकथाम हेतु मेटासिसटोक्स की 1 लीटर दवा 800 लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करनी चाहिए | आलू (1) आलू लाही रोग के नियंत्रण हेतु रोपाई के 45 दिन बाद फसल पर 0.1 टक्के रोगर या मेटासिस्टोक्स का घोल 2-3 बार 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिये | (2) पिछात आलू में दिसम्बर तथा जनवरी माह में अधिक ठंड की आशंका होने पर फसल की सिंचाई कर देनी चाहिये | जमीन भिगी रहने पर पाला का असर कम हो जाता है | आम (1) आवश्यकतानुसार पौधों में नियमित सिंचाई करें | (2) मधुआ कीट एवं पाउडरी मिल्ड्यू के नियंत्रण के लिए मंजर निकलने के समय बैविस्टिन या कैराथेन (0.2 प्रतिशत) तथा मोनोक्रोटोफ़ॉस या इमिडाक्लोप्रिड (0.05 प्रतिशत) का पहला एहतियाती छिड़काव करें | लीची मंजर आने के 30 दिन पहले पौधों पर जिंक सल्फेट (2 ग्रा./लीटर) के घोल का पहला एवं 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करने से मंजर एवं फूल अच्छे होते है | पपीता वृक्षारोपण के छ: महीने के बाद प्रति पौधा उर्वरक देना चाहिए | नाईट्रोजन – 150 -200 ग्राम, फ़ॉस्फोरस 200-250 ग्राम, पोटाशियम 100-150 ग्राम | तीनों उर्वरक 2-3 खुराक में वृक्ष लगाने से पहले फूल आने के समय तथा फल लगने के समय दे देना चाहिए | अमरुद फल-मक्खी के नियंत्रण के लिए साइपरमेथ्रिन 2.0 मि.ली./ली. या मोनोक्रोटोफ़ॉस 1.5 मिली./ली. की दर से पानी में घोल बनाकर फल परिपक्कता के पूर्व 10 दिनों के अंतर पर 2-3 छिड़काव करें | प्रभावित फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए तथा बगीचे में फल मक्खी के वयस्क नर को फंसाने के लिए फेरोमोन ट्रेप लगाने चाहिए | आँवला तुड़ाई उपरांत फलों को डाइफोलेटान (0.15 प्रतिशत), डाइथेन एम – 45 या बैवेस्टीन (0.1 प्रतिशत)से उपचारित करके भण्डारित करने से रोग की रोकथाम की जा सकती है | पशुपालन पशु को आहार देने के कुछ मूल नियम: पशु का आहार संतुलित एवं नियंत्रित हो | उसे दिन में दो बार 8-10 घंटे के अंतराल पर चारा पानी देना चाहिए | इससे पाचन क्रिया ठीक रहती है एवं बीच में जुगाली करने का समय भी मिल जाता है |पशु का आहार सस्ता, साफ़, स्वादिष्ट एवं पाचक हो | चारे में 1/3 भाग हरा चारा एवं 2/3 भाग सूखा चारा होना चाहिए | पशु को जो आहार दिया जाए उसमें विभिन्न प्रकार के चारे-दाने मिले हों | चारे में सूखा एवं सख्त डंठल नहीं हो बल्कि ये भली भांति काटा हुआ एवं मुलायम होना चाहिए | इसी प्रकार जौ,चना, मटर, मक्का इत्यादि दली हुई हो तथा इसे पक्का कर या भिंगो कर एवं फुला कर देना चाहिए | दाने को अचानक नहीं बदलना चाहिए बल्कि इसे धीरे-धीरे एवं थोड़ा-थोड़ा कर बदलना चाहिए | पशु को उसकी आवश्यकतानुसार ही आहार देना चाहिए | कम या ज्यादा नहीं | नांद एकदम साफ होनी चाहिए, नया चारा डालने से पूर्व पहले का जूठन साफ़ कर लेना चाहिए | गायों को 2-2.5 किलोग्राम शुष्क पदार्थ एवं भैंसों को 3.0 किलोग्राम प्रति 100 किलोग्राम वजन भार के हिसाब से देना चाहिए | स्त्रोत: राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)