<h3 style="text-align: justify;">सिंचाई </h3> <p style="text-align: justify;">फसल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए समुचित मात्रा में सही समय पर सुनिश्चित जल उपलब्धता बहुत महत्वपूर्ण है। धान में फूल आते समय तथा दाने की दुग्धावस्था पर खेत में नमी बनाये रखने के लिए एक सप्ताह के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। परन्तु कटाई से 15 दिनों पूर्व सिंचाई बन्द कर दें। अतः अधिक उपज और गुणवत्ता के लिए फसल को सही समय पर काटना आवश्यक है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कटाई का समय</h3> <p style="text-align: justify;">कटाई का उचित समय, वातावरण, उन्नत प्रजातियों, सस्य क्रियाओं एवं वृद्धि पर निर्भर करता है। बालियां निकलने के लगभग एक माह बाद सभी प्रजातियां पक जाती हैं। धान की कटाई के लिए दानों में जब 20 प्रतिशत नमी हो, वह समय कटाई के लिए उपयुक्त होता है। धान का रंग पीला होना भी परिपक्वता परिलक्षित करता है। कटाई 80-85 प्रतिशत बालियों में 80 प्रतिशत दाने पक जाने पर ही करना लाभकारी होता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">धान में झुलसा रोग या जीवाणु पर्ण अंगमारी रोग</h3> <p style="text-align: justify;">यह रोग जीवाणु द्वारा होता है। पौधों की छोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक यह रोग कभी भी हो सकता है। सबसे पहले लक्षण पत्तियों के अंतरशिरा भाग में सूक्ष्म जलासिक्त पारभासक स्थान पर स्पष्ट दिखते हैं। ये धारियां शिराओं से घिरी रहती हैं और पौली या नारंगी कत्थई रंग की हो जाती हैं। मोती की तरह छोटे छोटे पीले से कहरूवा रंग के जीवाणु पदार्थ धारियों पर पाए जाते हैं, जो पत्तियों की दोनों सतह पर होते हैं। इससे पत्तियां समय से पहले सूख जाती हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">रोग का नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग के नियंत्रण के लिए</p> <ol style="text-align: justify;"> <li style="text-align: justify;">शोधित बीज का प्रयोग करें। इसके लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लिन (2.5 ग्राम) + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (25 ग्राम) प्रति 10 लीटर पानी के घोल में बीज को 12 घंटे तक डुबोएं।</li> <li style="text-align: justify;">इस रोग के लगने की अवस्था में नाइट्रोजन का प्रयोग कम कर दें।</li> <li style="text-align: justify;">जिस खेत में रोग लगा हो, उसका पानी दूसरे खेत में न जाने दें। इससे रोग के फैलने की आशंका होती है।</li> <li style="text-align: justify;">खेत में रोग को फैलने से रोकने के लिए खेत से समुचित जल निकास की व्यवस्था की जाए, तो रोग को काफी हद तक नियत्रित किया जा सकता है।</li> <li style="text-align: justify;">रोग के नियंत्रण के लिए 74 ग्राम एग्रीमाइसीन-100 और 500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (ब्लाइटॉक्स/फाइटोलान-50/क्यूप्राविट) का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टर की दर से तीन-चार बार छिड़काव करें। पहला छिड़काव रोग प्रकट होने पर तथा शेष आवश्यकतानुसार 10 दिनों के अंतराल पर करें।</li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">धान में तनाछेदक कीट</h3> <p style="text-align: justify;">प्रकाश प्रपंच के उपयोग से तनाछेदक कीट की संख्या पर निगरानी रखें। निगरानी के लिए फेरोमोन प्रपंच 5 प्रति हैक्टर पीला तनाछेदक कीट के लिए लगाएं। तनाछेदक की सुंडियां ही फसल को नुकसान पहुंचाती हैं। वयस्क पतंगे फूलों के शहद आदि पर निर्वाह करते हैं। रोपाई के 30 दिनों बाद ट्राइकोकार्ड (ट्राइकोग्रामा जैपोनिकम) 1 से 1.5 लाख प्रति हैक्टर प्रति सप्ताह की दर से 2 से 6 सप्ताह तक छोड़ें।</p> <h4 style="text-align: justify;">कीट की रोकथाम </h4> <p style="text-align: justify;">तनाछेदक कीट की रोकथाम के लिए दानेदार कीटनाशी जैसे-कारटैप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी या कार्बोफ्यूरॉन 3 जी या फिप्रोनिल 0.3 जी का 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। अन्यथा क्विनालफॉस 25 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति लीटर या कारटैप हाइड्रोक्लोराइड 50 एसपी । मि.ली. प्रति लीटर या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. का 2 मि.ली. प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">धान में हरे फुदके कीट</h3> <p style="text-align: justify;">फसल पर इस कीट की निगरानी बहुत जरूरी है। फुदके तने पर होते हैं तथा पत्तों पर नहीं दिखते। इनकी निगरानी के लिए प्रकाश-प्रपंच का प्रयोग भी किया जा सकता है। धान में पौध फुदके काले, भरे एवं सफेद रंग के छोटे-छोटे कीट होते हैं। इनके शिशु व वयस्क दोनों ही पौधों के पर्णच्छद व तने से रस चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="154" height="135" /></p> <h4 style="text-align: justify;"> कीट का नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">फुदके कीट के नियंत्रण के लिए कार्बोरिल 50 डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति लीटर या बुप्रोफेजिन 25 एस.सी. 1 मि.ली. प्रति लीटर या इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.ली. प्रति 3 लीटर पानी या थायोमेथोक्जम 25 डब्ल्यूपी 1 ग्राम प्रति 5 लीटर या बीपीएमसी 50 ई.सी. का 1 मि.ली. प्रति लीटर की दर से पानी में मिलाकर छिड़काव करें। दानेदार कीटनाशी जैसे-फिप्रोनिल 0.3 जी 25 कि.ग्रा. या कार्बोफ्यूरॉन 3 जी 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग कर सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत: खेती पत्रिका, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीन कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग और अमन सिंह शोध छात्र, आचार्य नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या-224229 (उत्तर प्रदेश)</p>