बरसीम की फसल की देखभाल बुआई का समय बरसीम की भरपूर उपज लेने के लिए इसकी बुआई अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में कर देनी चाहिए। समय से पहले बुआई करने पर अधिक तापमान के कारण अंकुरण एवं जमाव कम होता है तथा खेत में खरपतवार भी अधिक उगते हैं। देर से बुआई करने पर कम तापमान रहने के कारण पौधों के विकास एवं बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उन्नत प्रजातियां बरसीम की उन्नत प्रजातियां जैसे बरसीम लुधियाना, मिस्कावी, पूसा जायन्ट, बीएल.-180, टाईप-526, टाईप-678, टाईप-780, जे.बी.-1, जे.बी.-2, बुन्देल-2, वरदान, टी-5 एवं टी-26, जे.एच.पी.-146, वी.एल.-10, वीएल.-2, वी.एल.-1, वी.एल.-22,यू.पी.वी.-110 तथा यू.पी.वी.-103 आदि हैं। अच्छी उपज के लिए बरसीम से ज्यादा हरा चारा उत्पादन के लिए 25-30 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर पर्याप्त होता है। देर से बुआई के लिए 5 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर बढ़ाकर बोना चाहिए। प्रथम कटाई से अच्छी उपज लेने के लिए जौ, जई अथवा सरसों के बीज को मिलाकर बोना चाहिए। इसके लिए 30-40 कि.ग्रा. जौ या जई अथवा 2 कि.ग्रा. सरसों को बरसीम की बुआई से पूर्व खेत में छिड़ककर देसी हल या ट्रैक्टर से मृदा में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। इसके बाद बरसीम की बुआई करें। बुआई से पूर्व राइजोबियम कल्चर को 250 ग्राम गुड़़ का घोल बनाकर मिला लें। यह 10 कि.ग्रा. बीज के लिए पर्याप्त है। इस घोल को बीज पर डालकर अच्छी तरह से मिला लें और बीज को छाया में सुखाकर बुआई करें। उर्वरकाें का उपयाेग दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में गाठें बनती हैं। इसमें राइजोबियम जीवाणु के वायुमंडलीय नाइट्रोजन का उपयोग करके पौधे को नाइट्रेट के रूप में नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। बरसीम बोने वाले खेत में 10-15 टन गोबर की खाद को प्रति हैक्टर की दर से अगस्त में बुआई से एक महीना पूर्व डालकर मृदा में मिला दें। बुआई के समय 20-30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 50-60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस को अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला दें इसके बाद बरसीम की बुआई करें। जई की फसल की देखभाल मृदा जई की खेती हल्की दोमट से लेकर भारी मटियार दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जा सकती है। मृदा का फसल पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इससे चारे की कटाइयों की संख्या प्रभावित होती है। आमतौर पर हल्की मृदा में 2 कटाइयां आरै दोमट मृदा में 3 कटाइयां की जाती हैं। मृदा में जल निकास का उचित प्रबंध हो और अधिक समय तक नमी एकत्र करने की क्षमता हो। अम्लीय एवं क्षारीय मृदाएं इसकी खेती के लिए हानिकारक नहीं होती हैं। अतः इन भूमि में नमी की कमी की दशा में इसकी खेती संभव है। प्रजातियां जई की उन्नत प्रजातियां जैसे-एन.पी-1, एन.पी.-2, एन.पी.-1 हाइबिड्र, एन.पी-3 हायबिड्र , एन.पी.-27 हाइबिड्र, बी.एस-1, बी.-2 एस, अल्जीरियन, बिस्टान-2 बिस्टान-11, बक्रेल-11 , ब्रकेल-10 आदि प्रमुख हैं। लेकिन आजकल कैंट, एफ.ओ एस.-1 , यू.पी.ओ-13, यू.पी.ओ -50 , यू.पी.ओ.-94, यू.पी.ओ.-92, यू.पी.ओ-123, यू.पी.ओ -160, ओएस.-6, एस-8, ओ.एस. 7, ओ.एस.-9, ओ.एल. 88, ओ.एल.-99, जे.एच. ओ -817, जे.एच.ओ. -822, के.-10, चौड़ी पत्ती पालमपुर-1, हरियाणा जई-114, एच. एफ.ओ.-114, कैंट, अल्जीरियन आदि का भी प्रयोग किया जा रहा है। बीज की मात्रा एवं बुआई का समय बीज दर बुआई की विधि पर निर्भर करती है। इसके अलावा मृदा की किस्म, मृदा की उर्वरता एवं बुआई का समय इससे सीधा संबंध रखते हैं। आमतौक पर 80 से 100 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर पंक्तियों में डाला जाता है। देसी हल द्वारा 20 सें.मी. की दूरी पर इसकी बुआई कर देते हैं। जई की बुआई अक्टूबर से ही प्रारंभ कर दी जाती है, जो दिसंबर तक चलती है। अक्टूबर की बुआई अच्छी रहती है। शीघ्र बुआई में कटाइयों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। अखिल भारतीय समन्वित चारा अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत हुए बुआई के समय पर प्रयोगों से स्पष्ट है कि जई की अधिकतम उपज के लिए 15 नवंबर के लगभग बुआई अच्छी रहती है, जबकि देर से बुआई करने में उपज में कमी आ जाती है। ईसबगोल ईसबगोल एक औषिधीय फसल है, जिसे अच्छे जल निकाल वाली मदृा तथा कम पानी वाले क्षेत्रों में 17 अक्टूबर से 7 नवंबर के बीच लगा सकते हैं। इसके 3 कि.ग्रा. बीज को 9 ग्राम थीरम से उपचारित करें तथा 9 इंच दूर पंक्तियों में 1 इंच से कम गहरा बोयें। बुआई के पहले आधा बोरा यूरिया व आधा बोरा सिंगल सुपर फॉस्फेट दें। पहली सिंचाई एक माह बाद दें तथा बाद में आधा बोरा यूरिया दो पंक्तियों के बीच दें। दूसरी व तीसरी सिंचाई 1 माह के अंतर पर करें। निराई-गुड़़ाई से खरपतवार पर नियंत्रण भी रखें। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और बिपिन कुमार ’सस्य विज्ञान संभाग एवं जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001