मूंग की फसल की देखभाल वर्षा ऋतु में मूंग की फसल की कटाई जब पौधों की अधिकतर फलियां पककर काली हो जाती हैं तब, की जा सकती है। फलियों को खेत में सूखी अवस्था में अधिक समय तक छोड़ने से वे चटक जाती हैं और दाने बिखर जाते हैं। इससे उपज की हानि होती है। फलियों से बीज को समय पर निकाल दें। फसल की कटाई, बुआई मूंग की फसल की कटाई, बुआई के समय और उन्नत प्रजाति पर निर्भर करती है। जैसे-जैसे फलियां पकती जाएं उनकी तुड़ाई करते रहें और यदि ऐसी किस्म है कि फलियां एक साथ पक रही हैं तो ऐसी स्थिति में हंसिया से कटाई करें। जब फसल पूर्ण रूप से सूख जाए तब थ्रेशर से गहाई कर सकते हैं। ध्यान रहे कि दाने में 10-12 प्रतिशत तक नमी होनी चाहिए। उड़द की फसल की देखभाल प्रबंधन उड़द फसल की कटाई बुआई के समय और उन्नत प्रजाति पर निर्भर करती है। जैसे-जैसे फलियां पकती जाएं उनकी तुड़ाई करते रहें और यदि ऐसी किस्म है कि फलियां एक साथ पक रही हैं तो ऐसी स्थिति में हंसिया से कटाई करें। जब फसल पूर्ण रूप से सूख जाए तब थ्रेशर से गहाई कर सकते हैं। ध्यान रहे कि दाने में 10-12 प्रतिशत तक नमी होनी चाहिए। अच्छी प्रकार से प्रबंधन की गई फसल से 10-15 क्विंटल/ हैक्टर तक दाने की उपज आसानी से मिल जाती है। अरहर की फसल की देखभाल किस्में अरहर की कुछ किस्में 5-6 महीने में तथा कुछ किस्में 10 महीनों में पककर तैयार होती हैं। अगेती किस्में नवंबर-दिसंबर में और पछेती किस्में मार्च-अप्रैल में काटी जाती हैं। फसल की कटाई परम्परागत कृषि यंत्रों/ गंडासे आदि से की जाती है। फसल सूख जाने पर फलियों को काटकर या पीटकर दाने निकाले जाते हैं। यांत्रिक विधि में पूलमेन थ्रेशर का उपयोग किया जाता है। अरहर के हानिकारक कीट चित्तीदार फलीछदेक (मारूका विटराटा) कीट अरहर की फसल में चित्तीदार फलीछदेक (मारूका विटराटा) कीट अगेती अरहर का प्रमुख हानिकारक कीट है। फसल में पुष्पीकरण के दौरान अधिक आर्द्रता वाले क्षेत्रों में इस कीट का प्रकोप अधिक होता है। चित्तीदार फलीभेदक की सूंडियां अरहर की कलियों, फूलों व फलियों एवं पत्तियों को मिलाकर गुच्छा सा बना लेती हैं और अंदर ही अंदर पौधे के भागों को खाती रहती हैं। ये कीट अरहर की जल्दी पकने वाली प्रजातियों, चौड़ी पत्तियां और पुष्पक्रम किस्मों के लिये अतिसंवेदनशील होते हैं। इस कीट का प्रकोप देश के विभिन्न कृषि प्रथाओं वाले सभी अरहर उत्पादक क्षेत्रों में देखा गया है। इससे संक्रमित क्षेत्र लगातार बढ़ता जा रहा है। इस कीट के नियंत्रण के लिए अरहर की बुआई 15 मई से 15 जून तक करने से इसका प्रकोप कम किया जा सकता है। मिथोमाइल 40 एस.पी. (0.6 मि.ली./लीटर) या प्रॉफीनोफॉस 50 ई.सी. (2.0 मि.ली./ लीटर) या डी.डी.वी.पी. 76 ई.सी. (0.5 मि.ली./लीटर) पानी के साथ सूंडियों को मारने में उपयोग होता है। इसके अलावा आवश्यकतानुसार इंडोक्साकार्ब 14.5 एस.सी. (0.4 मि.ली./लीटर) या स्पाइनोसाड 45 एस.सी. (0.2 मि.ली./लीटर) में घोलकर प्रभावित फसल पर छिड़काव करने की संस्तुति की जाती है। कली बनते समय कोराजेन 18.5 एस.सी. (1 मि.ली./लीटर) की दर से छिड़काव कर दें तो इस कीट का नियंत्रण किया जा सकता है। चना फलीभेदक (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा) अरहर की फसल में चना फलीभेदक (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा) प्रमुख हानिकारक कीट है। यह कीट प्रतिवर्ष लगभग 20-30 प्रतिशत तक फसल को हानि पहुंचाता है। अत्यधिक प्रजनन व पलायन क्षमता के साथ ही साथ बहुभक्षी होना इसका प्रमुख हानिकारक कीट होने का मूल कारण है। अनुकूल वातावरण मिलने पर इसका प्रकोप बढ़ जाता है और पूरी फसल तक नष्ट हो जाती है। वयस्क सूंडी अरहर की फलियों में छेद करके दानों को नुकसान पहुंचाती है। इस कीट का जीवनचक्र 30-37 दिनों का होता है और इसमें चार अवस्थायें होती हैं-अंडा, सूंडी, कोषक एवं पतंगा। चना फलीभेदक की सूंडी 12-14 दिनों में 5-6 बार अपना केंचुल बदलते हुए बड़ी होती है। इसकी सूंडी ही फसल को नुकसान पहुंचाती है और धीरे-धीरे कोषक में परिवर्तित हो जाती है। यह कोषक सुप्तावस्था में जमीन के अंदर पड़ा रहता है और 8-10 दिनों बाद अनुकूल वातावरण मिलने पर कोषक से पतंगा निकलता है। इसके नियंत्राण के लिए गर्मियों में खेतों की गहरी जुताई करें। अरहर की अगेती बुआई 15-20 जून एवं अरहर की पछेती बुआई 15-20 जुलाई तक कर देनी चाहिए। अरहर के साथ ज्वार की अंतः फसल लेने से चना फलीभेदक का प्रकोप कम हो जाता है। बेसिलस थूरिंजिएंसिस कुर्सटा 1.0 से 1.5 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें या स्पाइनोसाड 45 प्रतिशत एस.जी. (0.2 मि.ली./लीटर) या इंडेक्सोकार्ब 15.8 ई.सी. (0.5 मि.ली./लीटर) या इमामेक्टीन बेन्जोएट 5 एस.जी. (0.3 ग्राम या/ लीटर) की दर से छिड़काव करें या नीम का तेल (0.03 प्रतिशत) 5 मि.ली./लीटर या एच.ए. (2.0 प्रितशत एएस) एन.पी.वी. मि.ली./लीटर या नीम का तेल (0.03 प्रतिशत) 5 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। ग्वार की फसल की देखभाल ग्वार की फसल 120 से 160 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी कटाई उस समय करनी चाहिए, जब उसकी पत्तियां पीली पड़कर झड़ जायें तथा फलियों का रंग भूसे जैसा दिखने लगे। अन्यथा कटाई में देरी करने पर फलियों के छिटकने से बीज जमीन पर गिर जाएंगे। ग्वार फसल से हरे चारे की औसत उपज 150-225 क्विंटल प्रति हैक्टर एवं हरी फलियों की उपज 40-60 क्विंटल प्रति हैक्टर और दाने की उपज 17-19 क्विंटल प्रति हैक्टर प्राप्त होती है। लाेबिया लाेबिया के दाने की फसल, उस समय काटी जाती है जब ९० प्रतिशत फलियां पक गई हों। कटाई में देरी करने से उपज में हानि होती है। यदि वर्षा होने की आशंका हो तो पहले ही फलियांतोड़ लेनी चाहिए। हरी फलियों के उपयोग के लिए इनको 45 से 90 दिनों तक तोड़ सकते हैं। इसके बाद ये फलियां सब्जी के लिए उपयुक्त नहीं रहतीं, क्योंकि इनमें दाना पक जाता है तथा ये रेशायुक्त हो जाती हैं। लाेबिया की गहाई टैक्टर या बैलों से भी की जा सकती है, लेकिन गहाई सामान्यतः हाथ से की जाती है। गहाई -मड़ाई करते समय ध्यान रखना चाहिए कि दाना टूटने न पाए। इसके लिए गहाई से पूर्व फसल को अच्छी तरह धूप में सुखा लेना चाहिए। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और बिपिन कुमार ’सस्य विज्ञान संभाग एवं जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001