<h3>लहसुन की फसल </h3> <h4>किस्म</h4> <p style="text-align: justify;">लहसुन की उन्नत प्रजातियों जैसे-एग्री फाउण्ड व्हाइट, जी-1, एग्रीफाउंड व्हाइट, एग्रीफाउंड पार्वती, जी-50 (बैंगनी धब्बा एवं झुलसा रोग के प्रति सहनशील), जी-282, जी-262, सलेक्शन-1, सलेक्शन-2, नासिक लहसुन, एच.जी.-1, एच.जी. 6, एल.सी.जी.-1, गोदावरी व श्वेता तथा पूना लहसुन आदि की बुआई करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC3.jpg" width="180" height="230" /></p> <h4 style="text-align: justify;">उर्वरक</h4> <p style="text-align: justify;">लहसुन की अच्छी पैदावार लेने के लिए एक हैक्टर में 300 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद रोपाई से एक सप्ताह पहले मृदा में मिला दें तथा बुआई के समय अन्तिम जुताई पर 100 कि.ग्रा. यूरिया, 300 कि.ग्रा. सुपर फॉस्फेट एवं 100 कि.ग्रा. पोटाश अच्छी तरह खेत में मिला दें।</p> <h4 style="text-align: justify;">कलियां(बीज)</h4> <p style="text-align: justify;">एक हैक्टर क्षेत्र में लहसुन का 5-6 क्विंटल बीज (कलियां) पर्याप्त होता है। खोत में बुआई पंक्तियों में 15×10 सें.मी. की दूरी पर करने के बाद 2 सें.मी. गहरी मृदा की तह से ढक दें।</p> <h4 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">लहसुन में खरपतवार नियंत्रण के लिए पेण्डीमेथिलीन 1.25 कि.ग्रा. अथवा फ्लूक्लोरोलीन 1.25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से 650 लीटर पानी में घोलकर बुआई के 8-10 दिनों बाद छिड़काव करें।</p> <h3>धनिया</h3> <h4>जलवायु</h4> <p style="text-align: justify;">धनिया की अधिक उपज एवं गुणवत्ता फसल के लिए शुष्क एवं ठंडी जलवायु उपयुक्त रहती है। इसे खुली धूप की आवश्यकता होती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">मिट्टी</h4> <p style="text-align: justify;">धनिया लगभग सभी प्रकार की मृदाओं में उगायी जा सकती है बशर्ते उनमें जैविक खाद का उपयोग किया गया हो। उचित जल निकास वाली रेतीली दोमट मृदा इसके उत्पादन के लिए सर्वोत्तम मानी गई है।</p> <h4 style="text-align: justify;">उन्नत प्रजातियां</h4> <p style="text-align: justify;">धनिया की उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा चयन 360, आर.सी.आर. 41 ,आर.सी.आर. 20, गुजरात धनिया-2, स्वाति लाम चयन सी.एस.2, साधना, राजेन्द्र स्वाति, सी.एस. 276, को. 1, को. 2, को. 3, आर.सी.आर. 674, आर.सी.आर. 436 आदि प्रमुख हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC3.jpg" width="250" height="190" /></p> <h4 style="text-align: justify;">उपयुक्त समय</h4> <p style="text-align: justify;">धनिया मुख्यतः रबी की फसल है और इसकी खेती का सर्वोत्तम समय अक्टूबर-नवंबर का द्वितीय सप्ताह है। इस समय ठण्ड अधिक नहीं पड़ती किन्तु धनिया की बुआई का उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक है।</p> <h4 style="text-align: justify;">बीज एवं बीजाेपचार</h4> <p style="text-align: justify;">धनिया के बीज को छिटकवां विधि से बोया जा रहा है तो 20-22 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर की आवश्यकता होती है, जबकि पंक्तियों में बोने के लिए 12-15 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है। धनिया की खेती के लिए सर्वप्रथम इसके दानों को दो भागों में विभाजित कर देना चाहिए। इसके बाद बीज को नीम का तेल, गौमूत्र यदि खेत में दीमक की समस्या है तो कैरोसिन से उपचारित कर बोना चाहिए।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>मेथी</h3> <p style="text-align: justify;">मेथी की प्रजाति जैसे पूसा अर्ली बंचिंग व पूसा कसूरी की बुआई करें। प्रति हैक्टर बुआई के लिए पालक व मेथी 25-30 कि.ग्रा., गाजर 6-8 कि.ग्रा. तथा मूली 8-10 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और बिपिन कुमार ’सस्य विज्ञान संभाग एवं जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001<br /> </p>