सब्जी मटर की फसल बुआई का समय सब्जी मटर की बुआई के लिए अक्टूबर के प्रथम पखवाड़ा उपयुक्त है। प्रजातियां, उर्वरक एवं खाद मटर की उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा श्री, अर्केल, पंजाब अगेती-6, पन्त मटर-3, पन्त मटर-5, आजाद पी-3,आजाद पी-5, काशी नन्दिनी, काशी उदय, काशी सब्जी मटर लिये 20-25 टन अच्छी सड़ी गोबर खाद प्रति हैक्टर की दर से खेत की अंतिम तैयारी के समय मिला दें। इसके अलावा 100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस व 50 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से डालें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फॉस्फोरस व पोटाश की संपूर्ण मात्रा रोपाई के पहले खेत में मिला दें। नाइट्रोजन की शेष मात्रा को 2 बराबर भागों में बांटकर रोपाई के 30 तथा 45 दिनों बाद छिड़क कर दें। इसके अतिरिक्त 50 कि.ग्रा. सल्फर व 5 कि.ग्रा. जिंक प्रति हैक्टर की दर से रोपाई के पूर्व डालना भी उपयुक्त रहेगा। अगेती, मध्यम व पछेती किस्में मटर की अगेती किस्माें के लिए प्रति हैक्टर में बुआई करने के लिए 120-150 कि.ग्रा. तथा मध्यम व पछेती किस्मों के लिए 80-100 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है। बुआई से पूर्व बीज शोधन एवं बीजोपचार अवश्य करें। एक हैक्टर खेत में मटर की बुआई के लिए 200 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद, 50 कि.ग्रा. यूरिया, 3 क्विंटल सुपर फाॅस्फेट, 65 कि.ग्रा. पोटाश बुआई से पूर्व खेत में मिला दें। खेत की तैयारी के समय 20-25 टन गोबर की खाद, नाइट्रोजन 40 कि.ग्रा., फास्फोरस 60 कि.ग्रा. व पोटाश 50 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से प्रयोग करें। मटर के तनाछेदक (स्टेम वीविल) की रोकथाम हेतु बुआई के समय फोरेट 10 जीका 10 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय मृदा में मिला दें। जलवायु यह नर्म आर्द्र जलवायु की फसल है। इसकी अच्छी वृद्धि एवं विकास के लिये 21 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है। पाला इसके लिये हानिकारक होता है। ठंडे मौसम में इसके फूल कम लगते हैं। फल छोटे, कड़े एवं टेढ़े-मेढ़े आकार के हो जाते हैं। अधिक तापमान (33 डिग्री सेल्सियस से अधिक) होने से भी इसके फूल एवं फल झड़ने लगते हैं। मिट्टी इसकी खेती के लिये अच्छे जल निकास वाली चिकनी दोमट मृदा, जिसका पी-एच मान 6 से 6.5 हो, सर्वोत्तम मानी जाती है। बलुई दोमट मृदा में भी अधिक खाद डालकर और सही समय व उचित सिंचाई प्रबंधन द्वारा सब्जी मटर की खेती की जा सकती है। बीज एवं बीजाेपचार सामान्य प्रजातियों के लिए 750-900 ग्राम एवं संकर प्रजातियों के लिए 200-300 ग्राम बीज प्रति हैक्टर क्षेत्रफल में लगाने के लिये पर्याप्त रहता है। बीज को बोने के पूर्व बाविस्टिन के 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुआई करना चाहिये। जाड़े की सब्जियां जाड़े की अन्य सब्जियों, गाजर, पालक, मेथी, धनिया, मूली की बुआई पंक्तियों में करें। पालक एवं उर्वरक पालक की प्रजातियों जैस-ऑलग्रीन, पूसा ज्योति, पूसा हरित, पूसा भारती व जोबनेर ग्रीन की बुआई करें। 25-30 टन गोबर की खाद तथा 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 50 कि.ग्रा. पोटाश/हैक्टर का प्रयोग करें। गाजर गाजर की प्रजातियों जैसे-पूसा वृष्टि, पूसा रुधिरा, पूसा आसिता, पूसा मेघाली पूसा यमदग्नि एवं संकर प्रजाति पूसा वसुधा, पूसा नयनज्योति की बुआई करें। प्रति हैक्टर 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फेट एवं 40 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग करें। मूली प्रजाति मूली की प्रजाति पूसा मृदुला, पूसा देशी, जैपनीज व्हाइट, की बुआई करें। मिट्टी मूली के उत्तम उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली रेतीली दोमट और दोमट मृदा अधिक उपयुक्त रहती है। मटियार मृदा, मूली की फसल उगाने के लिए अनुपयुक्त रहती है। प्रजातियाँ हमारे देश के विभिन्न क्षेत्राों में मूली की दो प्रकार की प्रजातियां उगाई जाती हैं। एशियन प्रजातियां जैसे-पूसा चेतकी, जापानी सपेफद, पूसा हिमानी, पूसा रेशमी, जौनपुरी मूली, हिसार मूली न-1, कल्याणपुर-1, पूसा देसी, पंजाब पसंद, चाइनीज रोज, सकुरा जमा, व्हाइट लौंग, के एन-1, पंजाब अगेती और पंजाब सफेद आदि प्रमुख हैं। यूरोपियन प्रजातियां यूरोपियन प्रजातियां जैसे-व्हाइट आइसीकिल, रैपिड रेड व्हाइट टिपड, स्कारलेटग्लोब और फ्रेंच ब्रेकफास्ट आदि प्रमुख हैं। बीज मूली के बीज की मात्रा उसकी प्रजाति, बोने की विधि और बीज के आकार पर निर्भर करती है। सामान्यतः 5-10 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर आवश्यक होता है। उर्वरक मूली वर्ष उगाई सकती है फिर भी व्यावसायिक स्तर पर यह सितंबर से जनवरी तक बोई जाती है। 200 से 250 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा 100 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर आवश्यक है। गोबर की खाद, फॉस्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा खेत की तैयारी के समय तथा नाइट्रोजन की शेष मात्रा दो भागों में बोने के 15 और 30 दिनों बाद देना चाहिए। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और बिपिन कुमार ’सस्य विज्ञान संभाग एवं जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001