भूमिका जनवरी माह जिसे आप पौष-माघ भी कहते हैं , सबसे ठंडा महीना होता हैं परंतु लोहडी व मकर संक्राति के त्यौहार व गणतंत्रदिवस को लेकर आता है और मौसम में परिवर्तन होता है जो जोश व गर्मी भर देता है । इस आलेख पर जिज्ञासा आधारित जनवरी माह के कृषि कार्य बताएगें । लेख में नाप-तोल प्रति एकड़ के हिसाब से हैं । जनवरी महीने के प्रमुख कृषि कार्य इस प्रकार से हैं - इस महीने में गन्ने की तैयार फसल की कटाई की जाती है एवं कटाई के बाद गुड़ बनाया जाता है। इसके उपरान्त गन्ने की नई फसल लगाने के लिए खेत को तैयार करते हैं छत्तीसगढ़ के किसान। जो गेहूँ देर से बोये जाते हैं, उस गेहूँ में प्रथम सिंचाई किरीट जड़ अवस्था में करते हैं। अर्थात बोने के 21-25 दिन बाद ये किया जाता है। रबी दलहनों में पहले सिंचाई के बाद निदाई गुड़ाई करते हैं। चना, मटर, मसूर में कटुआ इल्ली के कोप से फसलों की रक्षा की व्यवस्था करते हैं। मटर में 10-15 दिन के अंतर से ये फलियाँ तोड़ी जाती हैं। चना, बूट दाना भरने के बाद बेचने के लिये बाजार भेजा जाता है। सरसों, राई, अलसी, चना इत्यादि रबी फसलों में फूल आते समय सिंचाई करते हैं। इसी समय सुरजमुखी मक्का और चारे हेतु सुडान धास की बोनी आरम्भ करते हैं। इसी महीने में अमरुद, पपीते, आँवले और नींबू के पके फलों की तुड़ाई की जाती है। इसी महीने में टमाटर के पौधों को बांस की लकड़ी का सहारा दिया जाता है। आलू के पौधों पर मिट्टी चढ़ाई जाती है। वसंत-ग्रीष्म की फसल के लिये बैंगन और टमाटर की पौध लगा रखी है, वे जनवरी के अन्त तक इसकी रोपाई कर दें। रोपाई के तुरन्त बाद पहली सिंचाई करें, इसके बाद ८ से १० दिन बाद सिंचाई करें। जिन किसान भाइयों ने टमाटर और बैंगन की शरद मौसम की फसल लगा रखी है, वे अच्छी गुणवत्ता और कीमत के लिये समय पर फलों की तुडाई करें। बैंगन में फल तब तोड़े जाने चाहिये जब वे मुलायम हों और उनमें ज्यादा बीज न बने हों। फूल गोभी के फूल उस समय काटने चाहिये जब वे ठोस, सफेद व धब्बे रहित बिलकुल साफ हों । फूल तेज धार वाले चाकू से काटे जाएँ और फूल के साथ पत्तियों के कम से कम दो चक्र भी हों । पत्तियों के ऊपरी चक्र में काफी पोषक तत्व होते हैं। अतः उनको भी फूल के साथ उपयोग करना चाहिये । बंद गोभी को तब काटें जब वह बंधी और कोमल हो। यदि कटाई में देर हो गई तो गांठें फट सकती हैं। कटाई करते समय दो तीन बाहरी पत्तियाँ रखें जिससे बाजार ले जाते समय गांठे खराब न हों। प्याज की रोपाई का काम भी इस महिने समाप्त कर लें। रोपाई के समय खेत में नमी बनाये रखें एवं ३-४ बार हल्की सिंचाई करें। आलू में जनवरी के प्रथम सप्ताह तक हर हालत में पौधों के ऊपरी भाग ( डंठल) को काट दें, उसके बाद आलू को २०-२५ दिन तक जमीन के अन्दर ही पड़े रहने दें। ऐसा करने से आलू का छिलका कड़ा हो जायेगा और खराब नहीं होगा। २० से २५ दिन बाद खुदाई करके साफ-सुथरे कन्दों का चयन करें और नई बोरियों में भर कर भण्डारण के लिये शीतगृहों में भेज दें। कृषि से जुड़ी ध्यान योग्य बातें सिंचाई या धुंआ ( पाले से सुरक्षा) – जनवरी में तापमान बहुत अधिक गिर जाने से पाला पडता है जिससे फसलें नष्ट भी हो सकती हैं । पाले के नुकसान से बचने के लिए शाम के समय खेतों के आस-पास आग जलाकर धुआं करें इससे तापमान बढ़ जाता है तथा पाला नहीं पडता । शाम को सिंचाई करने से भी पाले से फसल सुरक्षित रहती है । बर्मी–कम्पोस्ट ( मिट्टी स्वास्थ्यवर्द्धक) बर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए उचित तापमान 2837 डिग्री से ग्रे. है परंतु इसे पूरे साल बनाया जा सकता है । सर्दियों में जब खेत पर काम कम होता है तथा पशुशाला का कूडा करकट व गोबर काफी मात्रा में उपलब्ध रहता है तो कैचुओं की मदद से उच्च गुणवत्ता की वर्मी-कम्पोस्ट बना सकते हैं । इससे मिट्टी की सेहत सुधरेगी व पैदावार में बढ़ोतरी होगी । चूहा नियंत्रण (अन्न सुरक्षा) जरूरी दवाईयों के अलावा, चूहों के जैविक नियंत्रण यानिकी उनके प्राकृतिक शत्रुओं को बढ़ावा देकर काबू पाया जा सकता है । जैसे की उल्लू बाज, बिल्ली, सांप, लेवला, चील, गरूड आदि को बढ़ावा देकर चूहों की संख्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है । घरों में बिल्ली जरूर पालें । माह में होने वाले फसलों से जुड़ी जानकारी गेहूं गेहूँ में प्रथम सिंचाई किरीट जड़ अवस्था में करते हैं, जो बोने के २१-२५ दिन बाद आती है।गेँहू के जिन खेतो में चौड़ी पत्ती वाले ही खरपतवार हो, वह १.२५ किग्रा. २,४-डी सोडियम साल्ट (८ 0 %) या फिर १.५ लिटर २,४-डी एस्टर (३४.६ %) प्रति हेक्टेयर की दर से ६०० लिटर पानी में घोलकर बोआई के ३० -३२ दिन बाद छिडकाव करें। यदि घांस कुल के खरपतवार जैसे गुली डंडा (गेंहू का मामा) का अधिक प्रकोप हो तो किसान भाई मैथावेज्थाजुरान ७०% घु. पा.(टिबुलिन) 2 किग्रा./हे. या फिर आइसोप्रोतुरोंन ७५ % घु. पा. १.२५ किग्रा./हे. की दर से ७०० लिटर पानी में मिलाकर बोवाई के लगभग ३० दिन बाद छिडकाव करें। गेहूं में सिंचाई २७ से ३० दिन के अन्तर पर करते रहे । इस समय सिंचाई अच्छी पैदावार के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि इस माह शिखर जडे तथा कल्ले फूटने की स्थिति रहती है । जनवरी अन्त तक हल्की मिट्टी वाली जमीन में एक बोरा यूरिया (१/३ नत्रजन की आखिरी किस्त) भी दे सकते है | दीमक का प्रकोप बारानी क्षेत्रों में होने की संभावना बनी रहती है । ऐसी स्थिति में २ लीटर लिण्डेन या क्लोरपाइरिफास को २ लीटर पानी में २० कि.ग्रा. रेत के साथ मिलाएं तथा गेहूं की खडी फसल में बुरकाव करके सिंचाई कर दें । सतही टिड्डा अंकुरित गेहूं के पोधों को जमीन के पास से काटता है । इसीलिए इसे टोका भी कहते हैं । रोकथाम के लिए १० कि.ग्रा. मिथाइल पैराथियान २ प्रतिशत का छिड़काव करें । मोल्या-रोगग्रस्त पौधे पीले व बौने रह जाते है । इसमें फूटाव कम होता है तथा जड़े छोटी व झाड़ीनुमा हो जाती है । जनवरी-फरवरी में छोटे-छोटे गोलाकार सफेद चमकते हुए मादा सुत्र-कृमि जडो पर साफ दिखाई देते है जो इस रोग की खास पहचान है। यह रोग समय पर बोये गेहूं पर नहीं आता है । संभावित रोगग्रस्त खेतों में 6 कि.ग्रा. एल्डीकार्व या 13 कि.ग्रा. कार्बोपयूरान बीजाई के समय खाद मे मिलाकर डालें । पाले से बचाव के लिए खेतों के आस-पास धुआ करें जिससे तापमान बढ़ जाता है तथा पाला पड़ने की संभावन कम हो जाती है । अधिक सर्दी वाले दिनों में शाम के समय सिंचाई करने से भी पाले से बचाव होता है । जौ जौ में भी दीमक तथा पाले से बचाव गेहूं की तरह ही करें तथा सिंचाई उपलब्ध होने पर अवश्य करें । जस्ते की कमी नजर आने पर गेहूं की तरह ही उपचार करें । सरसों सरसों में जनवरी में फलियां बननी शुरू हो जाती हैं इसलिए खेत में नमी जरूरी है । अत: एक सिंचाई जरूर करें । इसे दाने मोटे व अधिक लगेंगे । जब तापमान १० से २० डिग्री सेल्ससियस तथा नमी ७७ प्रतिशत हो जाती है तो चेपा का आक्रमण तेज हो जाता है । चेपा हल्के हरे-पीले रंग का होता है तथा समूह में रहकर कलियों, फूलों व फलियों का रस चूसता है । चेपा रोकथाम के लिए २७० मि.ली. मेटासिस्टास्क या ६० मि.ली. फासफिमिडान ८७ एस एल को २७० लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें । १७ दिन बाद छिड़काव फिर से दोहराएं । बीमारियों पर नियंत्रण के लिए ६०० ग्राम मैन्काजेव (डाइथेन एम-४७) २७० लीटर पानी में का १७ दिन के अन्तर पर ३-४ बार छिड़काव करें | चना सिंचाई की सुविधा होने पर रबी दलहनों में पुष्प आने के पहले सिंचाई करना लाभप्रद होता हैं। चने की फसल में फलीबेधक कीड़ा जिसकी गिडारें हल्के हरें रंग की होती हैं जो बाद में भूरे रंग की हो जाती हैं। ये फलियों को छेदकर अपने सिर को फलियों के अन्दर डाल कर दानों को खा जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिये फली बनना प्रारम्भ होते ही फेनवेलरेट २० ई०सी० की ५०० मि०ली० या मोनोक्रोटोफॉस ३६ ई०सी० की ७५० मि०ली० मात्रा ६०० से ८०० लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेअर खेत में छिड़काव करें। फसल में पहला छिड़काव ५०% फूल आने के बाद करें। यदि छिड़काव के लिये रसायन उपलब्ध नहीं हो तो मिथाइल पॅराथियान २ % धूल की २५ कि०ग्रा० मात्रा का बुरकाव करें। चना की फसल फूल आने की अवस्था में होगी तो एक सिंचाई देने से अच्छा दाना पडेगा तथा पैदावार में बढ़ोतरी होगी । जस्ते की कमी होने पर फसल में पुरानी पत्तियां पीली तथा बाद में जली सी हो जाती है । जिंक सल्फेट की स्प्रे से उपचार करें । इसकी विधि पिछले माह बता चुके है । कटवा सुण्डी उगते पौधों के तनों को या शाखओं को काटकर नुकसान पहुचातें है । रोकथाम के लिए 0.4 प्रतिशत फैनबालरेट पाउडर 10 कि.ग्रा. के हिसाब से घुडा करें । हैलियोथिस, पत्तों, फुलों , फलियों को खा जाने वाली सुण्डी है । रोकथाम के लिए 400 मि.ली. ऐण्डोसल्फान 37 ई सी को 100 लीटर पानी में घोलकर छिडके तथा 151 दिन बाठ फिर छिड़काव करें | यदि बीजोपचार किया है तो बहुत सी बीमारियों की रोकथाम अपने आप हो जाती है । दाना मटर दाना मटर में सिंचाई जरूरत के अनुसार देते रहें । सिाप के नियंत्रण के लिए 700 मि.ली.एण्डोसल्फान 37 इ सी को 270 लीटर पानी में घोलकर छिडके । पाउडरी मिल्डयु नियंत्रण के लिए 0.3 प्रतिशत घुलनशील सल्फर का घोल छिडकें । मसूर में व्हील हैंड हो से खोदकर खरपतवार निकाल दें इससे फसल में वृद्धि होगी । उपलब्धतानुसार सिंचाई कर सकते है । चारा बरसीम, रिजका व जई की हर कटाई बार सिंचाई करते रहें इससे बढ़वार तुरंत होगी तथा अच्छी गुणवत्ता को चारा मिलता रहेगा । जई में कटाई के बाद आधा बोरा यूरिया भी डालें । शरदकालीन मक्की इसमें में आवश्यकतानुसार सिंचाई करने से पाले से बचाव के साथ-साथ फसल भी अच्छी होती है । सुरजमुखी सुरजमुखी की बीजाई जनवरी में भी हो सकती है । दिसम्बर में बोई फसल में नत्रजन की दूसरी व अंतिम किस्त एक बोरा यूरिया बीजाई के 30 दिन बाद दे दें तथा पहली सिंचाई भी करें | फसल उगने के 17 से 20 दिन बाद गुड़ाई करके खरपतवार निकाल दें । गन्ना शरदकालीन गन्ने में 1/3 नत्रजन की तीसरी व आखरी किस्त 1 बोरा यूरिया डाल दें । जस्तें की कमी नजर आए तो 0.7 प्रतिशत जिंक सल्फेट एवं 2.7 प्रतिशत यूरिया का घोल छिडके । खरपतवार की स्थिति में गुडाइ एवं सिंचाई करें । दीमक के आक्रमण होने पर 2.7 लीटर क्लोरपाइरीफास 20 ईसी 600 लीटर पानी में घोलकर फुवारे से छिडके । टमाटर टमाटर नवम्बर माह में लगाई नर्सरी जनवरी माह में रोपी जा सकती है परंतु पाले से बचाव करते रहे । प्रत्येक 10 दिन बाद हल्की सिंचाई देते रहे । टमाटर के खेते में खरपतवार बिल्कुल नहीं होने चाहिए । इन्हें समय-समय पर निकालते रहें । पुरानी फसल में यदि फल छेदक का संक्रमण हो जाए तो खराब फलों को तुरंत तोडकर तुरंत नष्ट कर दें । अधिक संक्रमण की स्थिति में 0.1 प्रतिशत मैलाथियान या 0.1 प्रतिशत थायोडान 15 दिन के अन्तराल पर छिडके | छिड़काव से पहले तैयार फल तोड लें तथा अगली तुडाई 17 दिन बाद करें । मिर्च मिर्च नवम्बर माह में लगाई गई नर्सरी जनवरी में रोपी जा सकती है । लाईनों व पौधों में 18 ईच का फासला रखें । फैलने वाली किस्मों में फसला 24 ईच तक बढ़ा दें । रोपाई से पहले खेत में 100 किवंटन गोबर की सडी गली खाद 1 बोरा यूरिया (1/2 नेत्रजन की दूसरी किस्त) 1.7 बोरा सिंगल सुपर फास्फेट तथा 1 बोरा म्युरेट आफ पोटाश डालें । सर्दियों में 10-17 दिन बाद हल्की सिंचाई से फूल व फल गिरते नहीं हैं व फसल पाले से भी बची रहती है । मटर मटर की फलियां तोडने के लिए तैयार हो गई होगी तथा फूल भी आ रहे होंगे । हल्की सिंचाई 10-17 दिन बाद करते रहें । इससे फूल, फलियां तथा कोपलें भी पाले से बची रहेगी । कीट नियंत्रण के लिए 0.1 प्रतिशत मैलाथियान या 0.1 प्रतिशत एण्डोसल्फान का स्प्रे 15 दिन बाद करते रहें । पाउडरी मिल्डयु के लिए 0.3 प्रतिशत (3 ग्राम प्रति लीटर पानी में ) घुलनशील सल्फर की स्प्रे 7 दिन के अन्तर पर करें । फ्रेचबीन इसे सभी प्रकार की मिट्टियों में उगया जा सकता है । मैदानी क्षेत्रों में 20 से 30 जनवरी तक बोया जा सकती है । झाड़ीनुमा किस्मों कोनटनडर व पूसा सरवती का 37 कि.ग्रा. बीज को 2 फुट लाईनों में तथा 8 ईच पौधों में दूरी पर लगाएं । लम्बी ऊची किस्में कैन्टुकी व हेमलता के 17 कि.ग्रा. बीज को 3 फुट लाईनों में तथा 1 फुट पौधे में दूरी पर लगाएं । बेले चढने के लिए लकडी या लोहे के खम्बे लगाएं । बीजाई से पहले खेत में 100 किवटल गोबर की सडी-गली खाद, 4 बोरे सिंगल सुपर फास्फेट, 1 बोरा म्युरेट आफ पोटाश तथा 1 बोरा यूरिया डालें । पहली सिंचाई, बीजाई के 17 दिन बाद करें । पालक व मेथी हर 17-20 दिन बाद कटाई करके पालक में 20 कि.ग्रा. तथा मेथी में 10 कि.ग्रा. यूरिया छिडक कर हल्की सिंचाई करें तथा खरपतवार निकाल दें । कीट नियंत्रण के लिए दवाई प्रयोग न करें परंतु बहुत अधिक आक्रमण होने पर कटाई करके खेत में 2 मि.ली. मैलाथियान 70 ई सी प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें । मूली व गाजर पूसा हिमानी मूली किस्म दिसम्बर से फरवरी तक लगा सकते है । यह 40 से 70 दिन में तैयार हो जाती है तथा हल्का तीखा स्वाद देती है । जापानी व्हाइट मूली खेत में है तो सिंचाई तथा गुडाई समय-समय पर करें तथा खरपतवार निकाल दें । मूली व गाजर को तैयार होने पर उखाडने से 2-3 दिन पहले हल्की सिंचाई करें । इन फसलों को उखाडने में देर न करें क्योकि देर से इनकी गुणवत्ता खराब हो जाती है तथा मूल्य भी कम मिलता है । आलू व प्याज आलू की फसल में जब पत्तियां व तने पीले पडने लगे तो उन्हें काट दें तथा 10-17 दिन बाद मिट्टी खोदकर आलू निकाल लें इससे आलू काफी देर तक खराब नहीं होता । प्याज की रोपाई 17 जनवरी तक की जा सकती है । रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करें । फल आम, अमरुद, अंगूर, निम्बू जाति के बागों में साफ़ सफाई, गुड़ाई, काट छाट, खाद देने का काम जनवरी में कर सकते है । कटाई-छटाई में पुरानी बीमार व सूखी टहनियां निकाल दें तथा फंफूद नाशक 0.3 प्रतिशत कापर आक्सीक्लाराइड स्प्रे करें । जनवरी में अंगूर, आडू, अनुचा, अनार व नाशपाती के पेड लगाने के लिए सर्वोत्तम समय है । विधि हम पिछले माह बता चुके है । पेड लगाने के समय दीमक नियंत्रण जरूर करें । अंगूर के बेलें 17 जनवरी से 17 फरवरी तक १० फुट के फासले पर लगा दें । नई बेलों को गोबर की खाद 20 कि.ग्रा. प्रति बेल जनवरी माह में देकर सिंचाई करें ।बेल चडाने के तरीको में हैड, निफिन, टेलीफोन तथा बाबर मुख्य है इनका चुनाव किस्मों के हिसाब से करें । फूल बसंत ऋतु के फूल पूरी बहार पर है । निरंतर गुडाई व सिंचाई करते रहें तथा पाले से बचाव रखें । गर्मी के फूलों के लिए भी नर्सरी की तैयारी शुरू कर दें । स्रोत: जेवियर समाज सेवा संस्थान