खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादन वृद्धि ही एकमात्र साधन है, जिसके द्वारा हम बढ़ती हुई जनसंख्या को भोजन उपलब्ध करा सकते हैं। खरीफ के मौसम का इंतजार करता जुलाई का महीना खेती के लिहाज से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इस महीने मानसून आ चुका होता है, इसलिए जरूरी हो जाता है कि सभी कृषि कार्यों को समय पर खत्म किया जाए। खरीफ फसलों का देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में आधे से अधिक का योगदान होता है। खरीफ मौसम में उगायी जाने वाली धान्य फसलें (धान, ज्वार, बाजरा, मक्का), दलहनी फसलें (मूंग उड़द, अरहर, लोबिया, सोयाबीन) व तिलहनी फसलें (मूंगफली, सूरजमुखी, कुसुम, तिल) एवं रेशे वाली फसलें (कपास, जूट) आदि प्रमुख हैं। फसलों के उत्पादन में उपयुक्त सस्य विधियां अपनाकर उत्पादन लागत में कमी एवं प्रति इकाई उपज में वृद्धि की जा सकती है। अनुसंधान परिणामों से ज्ञात हुआ है कि अधिक उपज देने वाली प्रजातियों की उत्तम गुणवत्ता का स्वस्थ बीज, संतुलित पोषर तत्व प्रबंधन, खरपतवार प्रबंधन, समुचित जल, कीट एवं रोग प्रबंधन, उपयुक्त समय पर फसल की कटाई एवं मड़ाई तथा उपयुक्त भंडारण इत्यादि तकनीकें अपनाकर किसान लागत कम करके उत्पादन में बढ़ोतरी कर सकते हैं। इस श्रृंखला में फसलों के उत्पादन की आधुनिक वैज्ञानिक विधियों के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत जानकारी दी गई है। मिट्टी,सिंचाई एवं मिट्टी के उपचार के साथ जुताई धान की खेती के लिए अच्छी जलधारण क्षमता वाली चिकनी, मटियार या मटियार दोमट मृदा सर्वोत्तम मानी जाती हैं। रेतीली अथवा रेतीली-दोमट मृदा धान के लिए उपयुक्त नहीं होती है क्योंकि इनसे जल का रिसाव अपक्षोकृत अधिक होता है। धान की खेती के लिए मृदा का पी.एच.मान प्रायः 6.5-8.5 सर्वोत्तम होता है। सिंचाई की समुचित व्यवस्था तथा सही प्रबधंन से अधिकतर मृदाओं में धान की अच्छी पैदावार ली जा सकती है। गर्मी की जुताई के बाद 2-3 जुताई करके खेत की तैयारी करनी चाहिए। धान की रोपाई के लिए एक सप्ताह पूर्व खेत की सिंचाई कर दें। रोपाई से पहले 2-3 जुताई हैरो से करके तथा बाद में पानी भर कर खेत में पडलर एवं टिलर से जुताई करके व पाटा लगा कर मिट्टी को लेहयुक्त एवं समतल बना दें। 20-25 कि.ग्रा. ट्राइकोडर्मा को 60 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद या वर्मीकम्पोस्ट में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर एक सप्ताह तक छाया में सुखाने के बाद खेत में एक समान छिड़काव कर दें, जिससे मृदाजनित रोगों में कमी आयेगी। राेपाई पौध 20-25 दिनों पुरानी हो जाए तथा उसमें 4-5 पत्तियां निकल आएं तो यह रोपाई के लिए उपयुक्त होती है। यदि पौध की उम्र ज्यादा होगी तो रोपाई के बाद कल्ले कम फूटते हैं और उपज में कमी आती है। मध्यम व देर से पकने वाली प्रजातियों की रोपाई माह के प्रथम पखवाड़े तक पूरी कर लेनी चाहिए। धान की शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की रोपाई जुलाई के दूसरे पखवाड़े तक की जा सकती है। सुगन्धित प्रजातियों की रोपाई माह के अंत में प्रारंभ करें। प्रत्येक वर्ष धान-गेहूं लेने वाले क्षेत्रों में हरी खाद या 100-120 क्विंटल/हैक्टर गोबर की सड़ी खाद का प्रयोग करें। पौध को उखाड़ने के पहले दिन क्यारियों की अच्छी तरह सिंचाई करके पौध रोपण वाले दिन सुबह नर्सरी से कमजोर, रोगमुक्त तथा अन्य किस्मों की नवपौधों को अलग कर देना चाहिए। नवपौधों को किसी मुलायम सामग्री से 5-8 सें.मी. व्यास वाले सुविधाजनक बंडलों में बांध लेना चाहिए। पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे की दूरी 20-30×15 सें.मी. की होनी चाहिए। पौध की खेत में रोपाई 3 सें.मी. की गहराई पर करते हैं। एक जगह पर 2-3 पौधे ही लगायें। एक वर्गमीटर क्षेत्रफल में कम से कम 33 पौधे होने चाहिए। देर से रोपाई करने की दशा में अथवा ऊसर भूमि में रोपाई के लिए 15×10 सें.मी. की दूरी पर लगभग 35-40 दिनों पुरानी पौध तथा प्रत्येक स्थान पर 3-4 पौध की रोपाई करें। खाद एवं उर्वरक अधिक उपज और भूमि की उर्वरता शक्ति बनाए रखने के लिए गोबर या कम्पोस्ट या हरी खाद का प्रयोग करना चाहिए। उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। धान की बौनी प्रजातियों के लिए 100-130 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 50 कि.ग्रा. पोटाश एवं 25 कि.ग्रा. जिकं सल्फेट/हैक्टर का प्रयोग करें। बासमती प्रजातियों के लिए 80-100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50-60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 40-50 कि.ग्रा. पोटाश एवं 20-25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट/हैक्टर देना चाहिए। सिगंल सुपर फॉस्फेट, म्यूरेट ऑफ पोटाश एवं जिंक की पूरी मात्रा आखिरी जुताई के समय देनी चाहिए। पौध अच्छी तरह से जड़ पकड़ लें तो यूरिया की पहली तिहाई मात्रा रोपाई के 5-8 दिनों बाद समान रूप से छिड़क कर दें। दूसरी एक तिहाई मात्रा कल्ले फूटते यानी रोपाई के 25-30 दिनों बाद तथा शेष एक तिहाई मात्रा का फूल आने से पहले यानी रोपाई के 50-60 दिनों बाद खड़ी फसल में छिड़काव करें। हरी खाद का उपयाेग करने की स्थिति में यदि हरी खाद या गोबर की खाद का प्रयोग किया गया हो तो नाइट्रोजन की मात्रा 20-25 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से कम कर देनी चाहिए। नील हरित शैवाल की अधिकतर प्रजातियां नाइट्रोजन का मृदा में एकत्रीकरण करती हैं। नील हरित शैवाल के प्रयोग से प्रतिवर्ष/हैक्टर करीब 20-30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन मृदा में स्थापित होती है, जिसका उपयोग धान की फसल के द्वारा होता है। 10-15 कि.ग्रा. टीका रोपाई के एक सप्ताह बाद खड़े पानी में प्रति हैक्टर की दर से बिखेर दें। शैवाल का प्रयोग कम से कम तीन साल तक लगातार करें। शैवाल का प्रयोग कर रहे हों तो इस बात का ध्यान रखें कि खेत में पानी सूखने नहीं पायें। सारणी : धन की फसल में खरपतवार नियंत्रण शाकनाशी वास्तविक मात्रा कि.ग्रा. या ली./है पानी की मात्रा लीटर/हैक्टर प्रयाेग का समय बिसपाईरीबैक सोडियम 10 एस.सी. (नोमिनी गोल्ड) 0.020-0.025 600-700 रोपाई/बुआई के 25-30 दिनों बाद पेन्डिमेथेलिन 30 ई.सी. (स्टाम्प) 1.0-1.5 600-800 रोपाई/बुआई के एक से दो दिनों के अंदर ऑक्सीडायरजाइल 0.080-0.100 500-600 रोपाई/बुआई के 2-3 दिनों बाद पाईराजोसल्फ्यूरॉन इथाइल 10 डब्ल्यू.पी 0.020-0.025 600-700 रोपाई/बुआई के 1-2 दिनों बाद प्रोटिलाक्लोर 50 ई.सी. + सेफनर 0.750 600-700 रोपाई/बुआई के 3-5 दिनों बाद ब्यूटाक्लोर 50 ई.सी. 2.5-4.0 600-800 फसल रोपने के दो से तीन दिनों के बाद छिड़काव करें थायो बेनकार्ब 50 ई.सी. 2.0-3.0