मिट्टी मक्का की खेती के लिए उत्तम जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि उपयुक्त होती है। बुआई सिंचित क्षेत्रों में मक्का की बुआई मानसून आने के 10-15 दिनों पहले कर देनी चाहिए। वर्षा आधारित क्षेत्रों में सामान्यतः वर्षा के आने पर ही मक्का की बुआई की जाती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मेड़ बनाकर उनके ऊपर मक्का की बुआई करनी चाहिए तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कूंड़ में बुआई करनी चाहिए। बीज की मात्रा मक्का की बुआई के लिए देसी छोटे दाने वाली प्रजाति के 16-18 कि.ग्रा., संकर के लिए 20-22 कि.ग्रा. एवं संकुल प्रजातियों के लिए 18-20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से बीज पर्याप्त होता है। मक्का में कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी 75×20 सें.मी. या 60×25 सें.मी. रखते हैं। यदि मक्का की बुआई बेबीकॉर्न व पॉपकार्न के लिए की जा रही है तो पौधों के बीच की दूरी 60×20 सें.मी. उचित पाई गई है। बीज शाेधन बीज बोने से पूर्व यदि शोधित न किया गया हो तो1 कि.ग्रा. बीज को थीरम 2.5 ग्राम या 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम से बोने से पहले शोधित कर लें। जिन क्षेत्रों में दीमक का प्रकोप होता है वहां आखिरी जुताई पर क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. की 2.5 लीटर मात्रा को 5 लीटर पानी में घोलकर 20 कि.ग्रा. बालू में मिलाकर प्रति हैक्टर की दर से बुआई के पहले मिट्टी में मिला दें। किस्में जल्दी पकने वाली प्रजातियां मक्का की जल्दी पकने वाली प्रजातियां जैसे-पीईएचएम 3, पीईएचएम 5, पीईएचएम 2, प्रकाश, विवेक संकर मक्का 4, विवेक संकर मक्का 5, विवेक संकर मक्का 9, विवेक संकर मक्का 15, विवेक संकर मक्का 17 आदि हैं। ये प्रजातियां 75-85 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। मध्यम परिपक्वता वाली प्रजातियां मक्का की मध्यम परिपक्वता वाली प्रजातियां जैसे-जवाहर मक्का, एमएमएच 69, एचएम 10, एमएचएम 2, केएच 510, बायो 9637 आदि 85-95 दिनों में पक जाती हैं। मक्का की पूर्णकालिक परिपक्वता वाली प्रजातियां जैसे-पूसा एच एम-4, पूसा एच एम-8, पूसा एच एम-9, केएच 528, सीड टैक 2324, शीतल, बुलंद, पीएचएच 3 आदि 100-110 दिनों में पकती हैं। प्रोटीनयुक्त प्रजातियां मक्का की प्रोटीनयुक्त प्रजातियां जैसे-पूसा विवेक एचक्यूपीएम 9, एचक्यूपीएम 1, एचक्यूपीएम 4, एचक्यूपीएम 5, एचक्यपूीएम 7, शक्तिमान 1, शक्तिमान 2, शक्तिमान 3, शक्तिमान 42 व प्रताप क्यूपीएम-1 आदि प्रमुख हैं। इन प्रजातियों को उन क्षेत्रों में बोना चाहिए जहां पर सिंचाई देकर समय से बुआई हो सके। उर्वरकाें का प्रयाेग मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। सामान्यतः पूर्णकालिक प्रजातियों के लिए 120-150 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर नाइट्रोजन तथा मध्यम एवं जल्दी पकने वाली प्रजातियों के लिए क्रमशः 80-100 व 60-80 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर नाइट्रोजन पर्याप्त होता है। जबकि 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 40 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर पोटेशियम सभी प्रजातियों के लिए आवश्यक होता है। निराई-गुड़ाई मक्का की खेती में निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ ही ऑक्सीजन का संचार होता है। इससे वह दूर तक फैल कर भोज्य पदार्थ को एकत्र कर पौधों को देती है। पहली निराई अंकुरण के 15 दिनों बाद कर देना चाहिए और दूसरी निराई 35-40 दिनों बाद करनी चाहिए। शाकनाशी का प्रयाेग एट्राजीन का 2 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से मध्यम से भारी मृदाओं में तथा 1.25 कि.ग्रा./ हैक्टर हल्की मृदाओं में बुआई के 2 दिनों में 500 लीटर/हैक्टर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। इस शाकनाशी के प्रयोग से एकवर्षीय घास कुल एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार बहुत ही प्रभावी रूप से नियंत्रित हो जाते हैं। इस रसायन द्वारा विशेष रूप से पत्थरचट्टा भी नष्ट हो जाता है। जहां पर पत्थरचट्टा की समस्या नहीं है वहां पर एलाक्लोर 5 लीटर/हैक्टर बुआई के दो दिनों के अंदर प्रयोग करना आवश्यक है। हार्डी खरपतवारों जैसे कि वन पट्टा, रसभरी को नियंत्रित करने के लिए बुआई के दो दिनों के अंदर एट्राटॉफ 600 ग्राम/एकड़+ स्टाम्प 30 ई.सी. या ट्रेफ्लान 48 ई.सी.(ट्रेफ्लूरेलिन) प्रत्येक 1 लीटर प्रति एकड़ अच्छी तरह से मिलाकर 200 लीटर पानी के साथ प्रयोग करने पर अच्छे परिणाम आते हैं। स्त्राेत: राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012