ज्वार उपयुक्त परिस्थितियाँ ज्वार की खेती शुष्क जलवायु अर्थात कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसके लिए तापमान 250-350 सेल्सियस उपयुक्त होता है। इसके लिए 40-60 सें.मी. वार्षिक वर्षा भी उपयुक्त रहती है। ज्वार के लिए हल्की दोमट, बलुई दोमट और भारी दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। इसके साथ में जल निकास अच्छा होना चाहिए। उपयुक्त समय और बीज की मात्रा ज्वार की बुआई के लिए जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक उपयुक्त समय है। बारानी क्षेत्रों में इसकी बुआई वर्षा के तुरंत बाद करनी चाहिए। ज्वार के बीज की मात्रा सामान्य (संकुल) किस्मों के लिए 10-12 कि.ग्रा. और संकर किस्मों के लिए 8-9 कि.ग्रा./हैक्टर उपयुक्त रहती है। ज्वार की बुआई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी एवं पौधे से पौधे की दूरी 45×15 सें.मी. रखी जानी चाहिए। पौधों की संख्या ज्वार की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए एक हैक्टर में पौधों की कुल संख्या लगभग 1,50,000 होनी चाहिए। बुआई से पूर्व बीज को कार्बेंडाजिम या एग्रोसन जीएन या कैप्टॉन आदि से 2-5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त बीज को जैविक उर्वरक एजोस्पीरिलम व पीएसबी से भी उपचारित करने से 15-20 प्रतिशत अधिक उत्पादन लिया जा सकता है। ज्वार की संकर प्रजातियां सीएसएच 1, सीएसएच 9, सीएसएच 11, सीएसएच 13, सीएसएच 14, सीएसएच 16, सीएसएच 17, सीएसएच 18, सीएसएच 23 संकुल प्रजातियां पूसा संकुल 701, पूसा संकुल 1201, वर्षा, सीएसवी 13, सीएसवी 15, एसपीवी 699, एसवी 1066, डीएसवी 1, डीएसवी 2, सीएसवी 10, सीएसवी 11, एसपीवी 462, मोती, एसपीवी 235, जेजे 741, जेजे 938, जेजे 1041, जेजे 35, जीजे 38, जीजे 39, जीजे 40, जीजे 41, एसपीवी 96, एसपीवी 881, सीओ 24, सीओ 25, सीओ 26, सीओ 27, सीओ (एस) 28 आदि प्रमुख हैं। चारा वाली किस्में पूसा चरी-6, पूसा चरी-9, पूसा चरी-23, यूपी-1, यूपी-2, पंत चरी-3, एचसी-308, हरियाणा चरी-171, एसएसजी-5, एसएसजी-8, एसएसजी-9 और पन्नी संकर ज्वार-5 इत्यादि हैं। सिंचित दशा और अच्छी उपज सिंचित दशा में ज्वार की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 100-120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50-60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा 40-50 कि.ग्रा. पोटाश/हैक्टर की आवश्यकता पड़ती है। असिंचित दशा में 50-60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 30-40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा 30-40 कि.ग्रा. पोटाश/हैक्टर पर्याप्त है। सूक्ष्म पोषक तत्वों में जिंक तथा आयरन, ज्वार के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इन तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए जिंक का 0.2 प्रतिशत तथा आयरन के 0.15 प्रतिशत घोल का पर्णीय छिड़काव बुआई के 35-40 दिनों बाद अवश्य कर देना चाहिए। यदि जैविक खाद जैसे गोबर की खाद, कम्पोस्ट खाद आदि उपलब्ध हों तो 10 टन/हैक्टर की दर से बुआई के 15-20 दिनों पूर्व खेत में समान रूप से छिड़क कर भूमि में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। जैविक खाद के प्रयोग से मृदा की भौतिक दशा में सुधार होता है तथा भूमि की जलधारण क्षमता भी बढ़ती है। अन्य फसलों की बुआई इसी प्रकार कोदों, चीना, मंडुआ, रागी और सांवा फसलों की बुआई के लिए भी तैयारी इस माह में शुरू करते हैं। कोदों की 10-12 कि.ग्रा. और अन्य मोटे अनाज वाली फसलों में 8-10 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर का उपयोग करते हैं। बाजरा बाजरा की खेती हल्की भूमि में की जाती है। अतः 10-15 टन गोबर की खाद/हैक्टर उपयोग में ली जानी चाहिए। रासायनिक खादों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के बाद ही करना चाहिए। अनुमान के अनुसार बाजरा की संकर प्रजातियों के लिए 80-90 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 40 कि.ग्रा. पोटाश तथा संकुल प्रजातियों के लिए 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 25 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 25 कि.ग्रा. पोटाश/ हैक्टर बुआई के समय प्रयोग करें। सभी परिस्थितियों में नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा लगभग 3-4 सें.मी. की गहराई पर डालनी चाहिए। नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा अंकुरण से 4-5 सप्ताह बाद खेत में बिखेरकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए। बाजरा की फसल में थायोयूरिया, जो एक पादप वृद्धि नियामक है, का 0.1 प्रतिशत का घोल 1 ग्राम लीटर बुआई के 30-35 दिनों बाद एवं सिट्टे बनते समय दूसरा छिड़काव करने से उपज में 10-15 प्रतिशत वृद्धि की जा सकती है। इससे फसल में सूखा सहन करने की क्षमता में वृद्धि होती है। अनुकूल परिस्थितियां बाजरा की फसल वृद्धि के लिए शुष्क एवं गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी वृद्धि एवं विकास के लिए 280-320 सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। बाजरा की खेती पूर्णतया वर्षा पर आधारित है, जो वर्षा की अनियमितता, देरी, अतिवृष्टि एवं अनावृष्टि से प्रभावित होती है। इन समस्याओं को ध्यान में रखकर बाजरा की खेती करनी चाहिए, जिससे उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। भूमि बाजरा की खेती कई प्रकार की भूमि में की जाती है। इसके लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती है। उपलब्ध होने पर 20-22 टन गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद पहली जुताई के समय खेत में डालें। अच्छी वर्षा होने के बाद 2-3 बार हैरो चलाकर खेत तैयार करें एवं भूमि को समतल करें। इससे वर्षाकाल में जल का निकास अच्छी तरह से हो जाता है। अनुकूल समय बाजरा की बुआई जून से जुलाई में की जाती है, जो वर्षा पर निर्भर है। उपयुक्त समय 15 जून से 15 जुलाई है। जून में अच्छी वर्षा होने के अवसर पर बुआई कर देनी चाहिए। यदि वर्षा देरी से या लगातार भारी वर्षा हो तो ऐसी स्थिति में बाजरा की सीधी बुआई न करें। पौधे तैयार कर मुख्य खेत में रोपित किए जा सकते हैं। उपयुक्त समय 15 जून से 15 जुलाई है। जून में अच्छी वर्षा होने पर बुआई कर देनी चाहिए। यदि वर्षा देरी से हो या लगातार भारी वर्षा हो तो ऐसी स्थिति में बाजरा की सीधी बुआई न कर पौध तैयार कर मुख्य खेत में इसे रोपित किया जा सकता है। बीज बाजरा की फसल के लिए 4-5 कि.ग्रा बीज/हैक्टर पर्याप्त होता है। बुआई इनकी बुआई पंक्तियों में करनी चाहिए, जो बहुत लाभकारी होती है। पंक्तियों में बुआई से फसल को कम पानी की आवश्यकता होती है। पोषक तत्व भी सही मात्रा में पौधे को उपलब्ध होते हैं। बुआई के लिए 45 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति की दूरी और 10-12 सें.मी. पौधे से पौधे की दूरी रखनी चाहिए। 2-3 सें.मी. गहराई पर बुआई करें। इस प्रकार पौने दो लाख से दो लाख पौधे/ हैक्टर होने चाहिए। बाजरा की बुआई जून से जुलाई में की जाती है। यह वर्षा पर निर्भर है। प्रजातियां संकुल प्रजातियां पूसा कम्पोजिट 701, पूसा कम्पोजिट 1201, पूसा कम्पोजिट 266, पूसा कम्पोजिट 234, पूसा कम्पोजिट 383, पूसा 443, पूसा कम्पोजिट 643, पूसा कम्पोजिट आई.सी.एमवी-155, डब्ल्यूसीसी-75,एचसी 4, एचसी 10 आई.सी.टीपी 8203, राज बाजरा चरी 2 व राज 171 संकर प्रजातियां पूसा 23, पूसा 415, पूसा 605, पूसा 322, एचएचबी 50, एचएचबी 67, एचएचडी 68, एचएचबी 117, एचएचबी इम्प्रूव्ड, आरएचडी 30, आरएचडी 21, जीएचबी 15, जीएचबी 30, जीएचबी 318, नंदी 8, एलएलबीएच 104, श्रृद्धा, सतूरी, एमएलबीएच 285, आई.सी.एमवी 155, आई.सी.एमवी 221 और आई.सी.एमएच-451 आदि प्रमुख हैं। स्त्रोत: खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), पूसा रोड, नई दिल्ली।