<h3 style="text-align: justify;">चना</h3> <h4 style="text-align: justify;">सिंचाई</h4> <p style="text-align: justify;">उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में फूल बनते समय (बुआई के 50 दिनों बाद) एक सिंचाई लाभदायक पायी गयी है लेकिन उत्तर-पश्चिमी मैदानी तथा मध्य भारत के क्षेत्रों में दो सिंचाइयां, जैसे पहली शाखाएं निकलते समय तथा दूसरी फूल बनते समय, सर्वाधिक क्रान्तिक पाई गई हैं।</p> <p style="text-align: justify;">इस माह में सिंचाई के साथ-साथ, खरपतवार और कीट-रोगों का प्रबंधन भी आवश्यक हो जाता है। चने में जल मांग संचित जल से ही पूरी हो जाती है, फिर भी मृदा में नमी के अभाव में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने तथा जाड़े की वर्षा न होने पर पहली सिंचाई बुआई के 40-45 तथा 70-75 दिनों के बाद करना लाभपद्र होता है। फूल आने की अवस्था में सिंचाई नहीं करनी चाहिए अन्यथा फूलों के गिरने तथा अतिरिक्त वानस्पतिक वृद्धि होने की समस्या उत्पन्न होने का खतरा हो सकता है। दलहनी फसलों में स्प्रिंक्लर विधि से सिंचाई करना सर्वोत्तम है।</p> <h4 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण एवं उत्पादकता</h4> <p style="text-align: justify;">उत्पादकता में कमी को रोकने हेतु फसलों को खरपतवारों से मुक्त रखना आवश्यक है। बुआई के 30 दिनों बाद एक निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को निकालना काफी लाभदायक रहता है। इससे जड़ों की अच्छी बढ़वार तथा फसल से अधिक उपज प्राप्त होती है। चने में बुआई के 35-40 दिनों बाद शीर्ष कलिका की तुड़ाई से अधिक शाखाएं बनने से भी पैदावार अधिक होती है। </p> <p style="text-align: justify;">देर से बोई गई फसल में शाखाओं के बनते समय अथवा फली बनते समय 2 प्रतिशत यूरिया/डी.ए.पी. के घोल का छिड़काव करने से समुचित पैदावार मिलती है। जिन खेतों में बोरॉन तथा मॉलिब्डेनम की कमी हो, वहां 10 कि.ग्रा बोरेक्स पाउडर व 10 कि.ग्रा अमोनियम मॉलिब्डेट का प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">रोग</h4> <p style="text-align: justify;">चने की फसल में भी बहुत से रोग लगते हैं, जिनसे चने की पैदावार पर काफी बुरा असर पड़ता है। समय पर इन रोगों की पहचान एवं उचित रोकथाम से फसल को होने वाले नुकसान को काफी कम किया जा सकता है। झुलसा रोग की रोकथाम के लिए प्रति हैक्टर 2.0 कि.ग्रा. जिंक मैंगनीज कार्बामेंट को एक हजार लीटर पानी में घोलकर 10 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मृदाजनित और बीजजनित रोगों के नियंत्रण</strong></p> <p style="text-align: justify;">मृदाजनित और बीजजनित रोगों के नियंत्रण हेतु जैव कवकनाशी टाइकोडर्मा विरिडी 1 प्रतिशत डब्ल्यूपी या टाइकोडर्मा हरजिएनम 2 प्रतिशत डब्ल्यू पी 2.5 कि.ग्रा प्रति हैक्टर मात्रा को 60 से 75 कि.ग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 7 से 10 दिनों तक छाया में रखने के बाद बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से चना फसल को मिट्‌टी बीजजनित रोगों से बचाया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कवकजनित रोग</strong></p> <p style="text-align: justify;">फसल की नियमित निगरानी करें। इन फसलों में कवकजनित रोगों जैसे चूर्णिल आसिता के नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम (1 ग्राम/लीटर पानी) अथवा डीनोकैप, केराथेन 48 ई.सी. (0.5 मि.ली./लीटर पानी) का भी प्रयोग कर सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>रतुआ तथा चूर्णिल आसिता रोग की रोकथाम</strong></p> <p style="text-align: justify;">रतुआ रोग की रोकथाम के लिए मैंकोजेब दवा की 2.0 कि.ग्रा या डाइथेन एम.-45 को 2 कि.ग्रा./हैक्टर या हेक्साकोनाजोटा 1 लीटर या प्रोपीकोना 1 लीटर की दर से 600-800 लीटर पानी में घोलकर खड़ी फसल पर छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">उचित फसलचक्र अपनायें एवं रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दें या रतुआ तथा चूर्णिल आसिता की रोकथाम के लिए सल्फरयुक्त कवकनाशी जैसे सल्फेक्स का 2.5 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल में 2-3 बार फसल पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें या घुलनशील गंधक (0.2-0.3 प्रतिशत) का फसल पर छिड़काव करें। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3 style="text-align: justify;">चना फसल में रोग रोकथाम<br /><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="224" height="164" /></h3> <h4>उकठा रोग</h4> <p style="text-align: justify;">चना फसल में उकठा रोग का प्रमुख कारक फ्रयूजेरियम ऑक्सीस्पोरम प्रजाति साइसेरी नामक फफूंद है। यह सामान्यतः मृदा तथा बीजजनित रोग है, जिसकी वजह से 10-12 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आती है। यह व्याधि पर्याप्त मृदा नमी होने पर और तापमान 25 से 30 डिग्री सेल्सियस होने पर तीव्र गति से पफैलती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">लक्षण</h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग के प्रमुख लक्षण</p> <ol> <li style="text-align: justify;">रोग ग्रसित चने की पौधे के ऊपरी हिस्से की पत्तियां आरै डंठल झुक जाते हैं।</li> <li style="text-align: justify;">पौधा सूखना शुरू कर देता है और मरने के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।</li> <li style="text-align: justify;">सूखने के बाद पत्तियों का रंग भूरा या तने जैसा हो जाता है।</li> <li style="text-align: justify;">वयस्क और अंकुरित पौधे कम उम्र में ही मर जाते हैं एवं भूमि की सतह वाले क्षेत्र में आंतरिक ऊतक भूरे या रंगहीन हो जाते हैं।</li> </ol> <h4>रोकथाम</h4> <p style="text-align: justify;">उकठा रोग की रोकथाम के लिए चना की बुआई अक्टूबर से नवंबर के प्रथम सप्ताह तक करें। गर्मियों में मई से जून में गहरी जुताई करने से फ्यूजेरियम फफूंद का संवर्धन कम हो जाता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">रोग प्रतिरोधी प्रजातियां</h4> <p style="text-align: justify;">चना की उकठा रोग प्रतिरोधी प्रजातियां जैसे-पूसा-372, पूसा चमत्कार (काबुली), डीसीपी-92-3, हरियाणा चना-1, केडब्ल्यूआर-108, जीएनजी 663, जेजी-315, जेजी-16 (साकी 9516), जेजी-74, जवाहर काबुली चना-1, विजय, फूले जी-95311 आदि का प्रयोग करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">फफूंदनाशी द्वारा बीजशोधन</h4> <p style="text-align: justify;">फफूंदनाशी द्वारा बीजशोधन के लिए 1.0 ग्राम कार्बोक्सिन या कार्बेन्डाजिम या 2 ग्राम थिरम और 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी/कि.ग्रा. बीज की दर से बीज शोधन करें। इसी प्रकार, 1.5 ग्राम बेन्लेट टी (30 प्रतिशत बेनोमिल तथा 30 प्रतिशत थिरम) प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार मिट्‌टीजनित रोगाणुओं को मारने में लाभप्रद है।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अजय कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>