<h3 style="text-align: justify;">सिंचाई की आवश्यकता</h3> <p style="text-align: justify;">इस समय मूंग, उड़द और लोबिया की फसल अपनी बढ़वार की अवस्था में होगी। अधिकतर जगह मार्च के आखिर या अप्रैल के प्रथम सप्ताह में बुआई हो चुकी होगी। मूंग, उड़द और लोबिया की फसल में बुआई के बाद पहली सिंचाई 20-25 दिनों पर तथा दूसरी 35-40 दिनों पर करें। आवश्यकता होने पर 45-50 दिनों पर तीसरी सिंचाई भी करें। अतः मौसम और मृदा की किस्म के आधार पर 3-4 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। अतः सिंचाई 10-15 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार व हल्की करें। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="213" height="186" /></p> <h3 style="text-align: justify;">खरपतवार की समस्या</h3> <p style="text-align: justify;">बुआई के प्रारंभिक 4-5 सप्ताह तक खरपतवार की समस्या अधिक रहती है। पहली सिंचाई के बाद निकाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ भूमि में वायु का संचार भी होता है जो मूल ग्रन्थियों में क्रियाशील जीवाणुओं द्वारा वायुमण्डलीय नाइट्रोजन एकत्रित करने में सहायक होता है। अतः बुआई के 15-20 दिनों के अन्दर कसोले से निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">रोग </h3> <h4 style="text-align: justify;">पीली चितेरी या पीत रोग </h4> <p style="text-align: justify;">मूंग एवं उड़द में प्राय: पीली चितेरी रोग का प्रकोप होता है। सर्वप्रथम कोमल पत्तियों पर पीले तथा हरे धब्बों का दृष्टिगोचर होना इस रोग का प्रमुख लक्षण है। जैसे-जैसे रोग की अवस्था बढ़ती है पीले क्षेत्र का आकार बढ़ता जाता है तथा अंत में सभी फलियां भी पीली हो जाती हैं। उनका आकार एवं साथ ही दानों का आकार भी छोटा हो जाता है। खेत में यह रोग श्वेत मक्खी (बेमीसिया तबाकी) द्वारा संवाहित होता है। </p> <h5 style="text-align: justify;">पीली चितेरी रोग के नियंत्रण के लिये </h5> <ol> <li style="text-align: justify;">मूंग की रोगरोधी प्रजातियां ही उगायें जैसे-पी.डी.एम. 139 (सम्राट), पंत मूंग-4, नरेन्द्र मूंग-1, मेहा, एच.यू.एम-16, एम.एस 2-15, गगंा-8 एवं उड़द की रोगरोधी प्रजातियां जैसे-आई.पी.यू.-94-1 (उत्तरा), नरेन्द्र उड़द-1, के.यू. 300, यू.जी. 218, पन्त उड़द-19 इत्यादि उगानी चाहिए। </li> <li style="text-align: justify;">बुआई के समय कीटनाशी फोरेट या डाइसल्वफोफॉन एक कि.ग्रा. सक्रिय अवयव प्रति हैक्टर की दर से मृदा में प्रयोग करना चाहिए। इससे अन्य कीटों से भी फसल की सुरक्षा हो जाती है।</li> </ol> <h4 style="text-align: justify;">झुर्रीदार पत्ती रोग </h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग के विशिष्ट लक्षण पत्तियों की सामान्य से अधिक वृद्धि का होना तथा बाद में इनमें सिलवटें या मरोड़ के रूप में होता है। ये पत्तियां छूने पर सामान्य पत्ती से अधिक मोटी तथा खुरदरी प्रतीत होती हैं। इसके नियंत्रण के लिये </p> <h5 style="text-align: justify;">नियंत्रण</h5> <ol> <li style="text-align: justify;">रोगरोधी प्रजातियां ही उगाएं। </li> <li style="text-align: justify;">रोगी पौधों को उखाड़कर जला दनेा चाहिए। </li> <li style="text-align: justify;">इसकी राकेथाम के लिये डाईमिथोएट 30 ई.सी. का छिड़काव करने से लाभ होता है। </li> </ol> <h4 style="text-align: justify;">चूर्णी कवक </h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग से ग्रसित पौधों की पत्तियों तथा दूसरे भागों पर सफेद चूर्णिल धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में मटमैले रंग के हो जाते हैं। रोग के अधिक बढ़ने की अवस्था में पत्तियां अपरिपक्व अवस्था में सिकुड़कर गिर जाती हैं।इस रोग के नियंत्रण के लिये</p> <h5 style="text-align: justify;">नियंत्रण </h5> <ol> <li style="text-align: justify;">उड़द की एल.बी.जी. 402 एवं एल.बी.जी. 17 तथा मूंग की रोगरोधी प्रजातियां-पूसा 9072, पूसा 105, सीओ.जी.जी.-4, टार्म-1 इत्यादि उगाना लाभदायक रहता है।</li> <li style="text-align: justify;">घुलनशील गंधक (0.3 प्रतिशत) या कैराथेन (0.1 प्रतिशत) या कार्बेन्डाजिम (0.05 प्रतिशत) का 7-10 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें।</li> </ol> <h4 style="text-align: justify;">सर्कोस्पोरा पर्ण बुदगी रोग </h4> <p style="text-align: justify;">पत्तियों पर स्लेटी से भूरे कोणीय धब्बे पड़ जाते हैं। इन धब्बों के चारों तरफ लाल रंग की किनारी बन जाती है। ये इस रोग के विशिष्ट लक्षण हैं। गम्भीर अवस्था में फलियां बनते समय संक्रमित पत्तियां सड़ जाती हैं।</p> <h5 style="text-align: justify;">नियंत्रण</h5> <p style="text-align: justify;">इस रोग के नियंत्रण के लिये बुआई से पहले थीरम या कैप्टॉन कवकनाशी से 2-3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचार करना चाहिए अथवा कार्बेन्डाजिम (0.05 प्रतिशत) या मैन्कोजेब 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए। </p> <h4 style="text-align: justify;">रूक्ष रोग </h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग से ग्रसित पौधों की पत्तियों तथा फलियों पर भूरे गोल घंसे हुए धब्बे दिखाई देते हैं। इन धब्बों का केन्द्र गहरे रंग का और बाहरी सतह चमकीली लाल रंग की होती है। संक्रमण बढ़ने पर पौधे के रोगग्रसित भाग जल्दी सूख जाते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिये</p> <h5 style="text-align: justify;">नियंत्रण</h5> <ol> <li style="text-align: justify;">बुआई से पहले बीज को थीरम कवकनाशी या कैप्टॉन से 2-3 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।</li> <li style="text-align: justify;">(इंडोफिल जेड-78 या थीरम कवकनाशी 2 ग्राम/लीटर पानी की दर से घोल बनाकर रोग के लक्षण दिखाई देने पर छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार 1-2 छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करने चाहिए।</li> </ol> <h4 style="text-align: justify;">उड़द का पीला चित्तवर्ण रोग </h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग में पत्तियों पर पीले सुनहरे चकत्ते पड़ जाते हैं। रोग की उग्र अवस्था में सम्पूर्ण पत्ती पीली पड़ जाती है एवं यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है।</p> <h5 style="text-align: justify;">नियंत्रण</h5> <p style="text-align: justify;">इसके नियंत्रण के लिये डाइमिथोएट (30 ई.सी.) एक लीटर प्रति हैक्टर का छिड़काव करना चाहिए या मिथाइल-ओडिमेटान (25 ई.सी.) 1.0 लीटर/हैक्टर का छिड़काव करना चाहिए। </p> <h4 style="text-align: justify;">उड़द का पत्र दाग रोग </h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग में पत्तियों पर गोलाई लिए भूरे रंग के कोणीय धब्बे बनते हैं। इसके बीच का भाग राख या हल्का भूरा तथा किनारा लाल बैंगनी रंग का होता है। इसके नियंत्रण के लिये</p> <h5 style="text-align: justify;">नियंत्रण</h5> <ol> <li style="text-align: justify;">कॉपर ऑक्सीक्लोराइड प्रति हैक्टर 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव 500 ग्राम पर्याप्त होगा।</li> <li style="text-align: justify;">गर्मी में गहरी जुताई करें व रोगरोधी प्रजातियों को उगायें।</li> <li style="text-align: justify;">बीज शोधन एवं बीजोपचार किसान भाई अवश्य करें। </li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">अन्य सावधानियां</h3> <p style="text-align: justify;">फलियों के झड़कर गिरने से होने वाली हानि को रोकने के लिये फलियों को झड़ने से पहले काट लें। जब 75-80 प्रतिशत फलियां पक जाएं तो हंसिया की सहायता से कटाई आरंभ कर देनी चाहिए। कटाई उपरांत फसल को 3-6 दिनों तक अच्छी तरह सुखाकर मड़ाई करनी चाहिए। बीजों को तब तक धूप में सुखाना चाहिए, जब तक उनमें नमी 10-12 प्रतिशत के बीच न हो। उपयुक्त विधि से खेती कर 10-12 क्विंटल/हैक्टर की उपज प्राप्त की जा सकती है।</p> <p style="text-align: justify;">पलोबिया की फलियों की तुड़ाई नियमित रूप से 3-4 दिनों के अंतराल पर करते रहें। बेलदार प्रजातियों में 8-10 तुड़ाइयां तथा झाड़ीदार प्रजातियों में 3-4 तुड़ाइयां की जा सकती हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर ’सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-११००१२।</p>