<h3 style="text-align: justify;">चारे की फसल और महत्वपूर्ण जानकारी </h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>सिंचाई के इंतजाम वाले खेतों में चारे के लिहाज से बाजरा, ज्वार व मक्के की बुआई करें। इसकी बुआई मार्च के अंत या अप्रैल तक कर दी जाती है सिंचाई का विशेष ध्यान रखें। प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करें। नाइट्रोजन की मात्रा को भी ठीक प्रकार से प्रयोग करें। मई में सिंचित हालत में चारे के लिए मक्की (किस्में-जे 1006, प्रभात, प्रताप, केसरी व मेघा) ज्वार (किस्में-जे एम 20, एचसी 136, 171, 260, 308, एसएल 44 व पंजाब सूडेक्स चरी-1) बाजरा (पीसीबी 141) मकचरी (टीएल-1), नेपियर-बाजरा हाइब्रिड (पीवीएन-233 व 83, संकर-21), गिनी घास (पीजी.जी. 518 व 101), ग्वार (एफएस. 277 व ग्वार-80), लोबिया (लोबिया-88 व 90)। यह सिफारिश की जाती है कि चारे की फसलें मिलाकर बोने में चारा पौष्टिक बनता है, पैदावार भी अधिक तथा ज्यादा कटाई मिलती हैं। मिश्रित चारे में सही मात्रा में बीज लेकर रोगों के लिए उपचारित कर लें। फिर खेत में 2-3 बार जुताई करके 10 टन देसी खाद तथा 1 बोरा यूरिया डालकर बीज छिड़कर बुआई करें। काफी बढ़वार होने पर जरूरत के अनुसार चारे की कटाई लेते रहें तथा कटाई के बाद आधा बोरा यूरिया छिड़क दें।</li> <li>एक कटाई वाली ज्वार की किस्मों में नाइट्रोजन की आधी मात्रा को पहली सिंचाई के बाद खेत में प्रयोग करते हैं। बहुकटाई वाली चरी में 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन या 65 कि.ग्रा. यूरिया तथा मक्के में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन या 87 कि.ग्रा. यूरिया बुआई के 30 दिनों बाद टॉप ड्रेसिंग करें। हर कटाई के बाद शेष नाइट्रोजन को बराबर मात्रा में उपयोग करने पर हरे चारे की अच्छी बढ़वार होती है। बरसीम, जई व लोबिया की बीज वाली फसल की कटाई कम करें एवं 10-12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें।</li> <li> </li> </ul> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>हरी खाद वाली फसलों में देखभाल</h3> <ul> <ul> <li>दलहनी एवं गैर दलहनी फसलों को उनकी वानस्पतिक वृद्धिकाल में उपयुक्त समय पर मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए जुताई करके मिट्‌टी में अपघटन के लिए दबाना ही हरी खाद देना कहलाता है। भारतीय कृषि में दलहनी फसलों का महत्व सदैव रहा है। ये फसलें अपनी जड़ ग्रंथियों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु द्वारा वातावरण में नाइट्रोजन का दोहन कर मिट्‌टी में स्थिर करती हैं। आश्रित पौधे के उपयोग के बाद जो नाइट्रोजन मिट्‌टी में शेष रह जाती है, वह आगामी फसल द्वारा उपयोग में लायी जाती है। दलहनी फसलें अपने विशेष गुणों जैसे भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने, प्रोटीन की प्रचुर मात्रा के कारण पोषकीय चारा उपलब्ध कराने तथा मृदा क्षरण के अवरोधक के रूप में विशेष स्थान रखती हैं।</li> <li>हरी खाद के लिए दलहनी फसलों में सनई, ढैंचा, उड़द, मूंग, अरहर, चना, मसूर, मटर, लोबिया, मोठ, खेसारी तथा कुल्थी मुख्य है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जायद में हरी खाद के रूप में अधिकतर सनई, ढैंचा, उड़द एवं मूंग का प्रयोग ही प्रायः प्रचलित है। हरी खाद के लिए उगाई जाने वाली फसल का चुनाव भूमि जलवायु तथा उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। हरी खाद के लिए फसलों में निम्न गुणों का होना आवश्यक हैः</li> <ul> <ul> <li>हरी खाद के लिए ऐसी फसल होनी चाहिए जिसमें तना, शाखाएं और पत्तियां का मेल एवं अधिक हो ताकि मिट्टी में शीघ्र अपघटन होकर अधिक से अधिक जीवाशं तथा नाइट्रोजन मिल सकें और फसल शीघ्र वृद्धि करने वाली हो। फसल, सूखा अवरोधी होने के साथ जल मग्नता को भी सहन करती हों।</li> </ul> </ul> </ul> </ul> <img src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cGreen_Grass.jpg" width="176" height="154" /> <ul> <ul> <ul> <li>दलहनी फसलों की जड़ों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु ग्रंथियां वातावरण में मुक्त नाइट्रोजन को यौगिकीकरण द्वारा पौधों को उपलब्ध कराती हैं।</li> <li>हरी खाद के साथ-साथ फसलों को अन्य उपयोग में भी लाया जा सकता है। हरी खाद के लिए सनई या ढैंचा की बुआई भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ाने के लिए बहुत ही आवश्यक है। इन फसलों से 50-60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्राप्त होती है। ढैंचा या सनई की बुआई करने के लिए 60 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बीज की आवश्यकता है।</li> <li>फसलें मूसला जड़ों वाली हों ताकि गहराई से पोषक तत्वों का अवशोषण हो सके। क्षारीय एवं लवणीय मृदाओं में गहरी जड़ वाली फसल अंतःजल निकास बढ़ाने में आवश्यक होती है। इनमें रोग एवं कीट कम लगते हों तथा बीज उत्पादन को क्षमता अधिक हो।</li> </ul> </ul> <li>बुआई से पूर्व बीज को 12 घंटे पानी में भिगोने के बाद अंकुरण जल्दी होता है। हरी खाद की फसलें बुआई के 35-40 दिनों में पलटने योग्य हो जाती हैं। अतः खरीपफ में धान की रोपाई के समय को ध्यान में रखते हुए ढैंचा, सनई और लोबिया की बुआई करें।</li> </ul> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">गर्मी की जुताई, मृदा परीक्षण एवं भूमि का समतलीकरण</h3> <ul> <li style="text-align: justify;">मिट्‌टी की जांच करवाने का यह उपयुक्त समय होता है। मृदा में पोषक तत्वों की कमी जानने के लिए मृदा परीक्षण कराने के साथ-साथ उसका पी-एच मान भी पता करना चाहिए। यदि पी-एच मान 6.5-7.5 तक हो तो फसलों के लिए उत्तम है, परंतु बहुत अधिक या कम होने पर मृदा का उपचार आवश्यक लें।</li> <li style="text-align: justify;">अपने हर खेत से लगभग 15 स्थानों से 15 सें.मी. गहराई तक खुरपी की सहायता से मृदा नमूने इकट्‌ठे करें। मृदा के नमूना खेत के किनारे किसी खाद वाले स्थान, छायादार स्थान व सिंचाई की नाली के पास से न लें। एक खेत से इकट्‌ठे किए गए नमूने की मिट्‌टी आपस में अच्छी तरह मिलाकर अंत में उसमें से 500 ग्राम मिट्‌टी एक कपड़े की थैली में भरकर पूरे विवरण के साथ मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में भेजें। नमूनों की जांच के उपरांत मृदा स्वास्थ्य कार्ड अवश्य प्राप्त करें ताकि अगली खरीफ की फसल में मृदा स्वास्थ्य के आधार पर संस्तुत खाद व उर्वरकों का प्रयोग किया जा सके। मिट्‌टी पलटने वाले हल से इस माह खेतों की जुताई करना लाभदायक है। जुताई के लिए मिट्‌टी पलटने वाला हल या ट्रैक्टरचालित यंत्र भी उपयोग में ले सकते हैं। इससे निचली परत की मिट्‌टी के साथ रोगों के कीटाणु, अंडे, खरपतवार के बीज आदि ऊपर आ जाते है, जो सूरज की गर्मी से मर जाते हैं। इस प्रकार कीटे-मकोड़े और खरपतवारों की संख्या कम हो जाती है। इसके साथ ही भूमि में वर्षा-जल का अवशोषण बढ़ जाता है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति में भी सुधार होता है।</li> </ul>