<table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 98.6043%;"> <h3>धान नर्सरी </h3> <p style="text-align: justify;">धान की फसल के लिए आधार व प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें। इनमें पूर्ण जमाव, प्रजाति की शुद्धता एवं स्वस्थ होने की प्रमाणिकता होती है। धान की नसर्री के लिए मध्यम आकार की प्रजातियों के लिए 40 कि.ग्रा., मोटे धान के लिए 45 कि.ग्रा. तथा बासमती व लंबे बारीक दाने वाली प्रजातियों के लिए 10-12 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है। धान के बीज को बोने से पूर्व 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा या 2.5 ग्राम कार्बेण्डाजिम या थीरम से बीजोपचार कर लेना चाहिए। जहां पर जीवाणु झुलसा या जीवाणुधारी रोग की समस्या हो, वहां पर 25 कि.ग्रा. बीज के लिए 4 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन या 40 ग्राम प्लान्टोमाइसीन को मिलाकर पानी में रात भर भिगो दें तथा 24-36 घंटे तक जमाव होने दें। बीच-बीच में पानी का छिड़काव करते रहें तथा दूसरे दिन छाया में सुखाकर नर्सरी डाल दें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="162" height="142" /></p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">विशेष सावधानी</h3> <p style="text-align: justify;">धान की पौध तैयार करने के लिए 8 मीटर लंबी एवं 1.5 मीटर चैड़ी क्यारियां बना लेते हैं। जब तक नवपौध हरी न हो जाए, पक्षियों से होने वाले नुकसान से बचने के लिए विशेष सावधानी बरती जाए तथा शुरू के 2-3 दिनों तक अंकुरित बीजों को पुआल से ढके रहें। इसके बाद पानी की पतली सतह के साथ संतृप्त से गारे वाली स्थिति बनाए रखने के लिए नर्सरी क्यारियों के ऊपर अंकुरित बीजों का समान रूप से छिड़काव करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">संतुलित पोषक तत्वों का उपयोग</h3> <p style="text-align: justify;">अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग से नवपौध की अच्छी बढ़वार के लिए ओजपूर्ण/पर्याप्त पोषण मिलना जरूरी है। 1000 वर्गमीटर क्षेत्र के लिए 10 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद, 10 कि.ग्रा. डाइअमोनियम फॉस्फेट तथा 2.5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट जुताई से पहले मृदा में अच्छी तरह मिलाने के बाद बुआई करें। 10-12 दिनों पश्चात यदि पौधों का रंग हल्का पीला हो जाए, तो एक सप्ताह के अंतराल पर दो बार 10 कि.ग्रा. यूरिया/1000 मीटर की दर से मृदा की ऊपरी सतह पर मिला दें, जिससे पौध की बढ़वार अच्छी होगी। </p> <h3 style="text-align: justify;">स्वस्थ एवं रोगमुक्त पौध तैयार करना</h3> <p style="text-align: justify;">स्वस्थ एवं रोगमुक्त पौध तैयार करने के लिए उचित जल निकास एवं उच्च पोषक तत्वों से मुक्त दोमट मृदा, सिंचाई के स्रोत के पास पौधशाला का चयन करें। बुआई के एक महीने पहले नर्सरी की तैयारी की जाती है। नर्सरी क्षेत्र में 15 दिनों के अंतराल पर पानी देकर खरपतवारों को उगने दिया जाए तथा हल चलाकर या नॉन सेलेक्टिव खरपतवारनाशी जैसे कि पैराक्वाट या ग्लाइफोसेट का 1 कि.ग्रा./ हैक्टर छिड़काव करके खरपतवारों को नष्ट कर दें। ऐसा करने से धान की मुख्य फसल में भी खरपतवारों की कमी आयेगी। नर्सरी क्षेत्र को गर्मियों (मई-जून) में अच्छी तरह 3-4 बार हल से जुताई करके खेत को खाली छोड़ने से मृदा संबंधित रोगों में काफी कमी आती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">शाकनाशी का उपयाेग</h3> <p style="text-align: justify;">बुआई के 1-2 दिन बाद पायराजोसल्फ्यूरॉन 250 ग्राम/हैक्टर की दर से पौध निकलने के पूर्व छिड़काव करें। इसके लिए शाकनाशी को रेत में (10-15 कि.ग्रा/1000 मीटर) मिलाकर उसे नर्सरी क्यारियों पर एक समान रूप से फैला दें तथा हल्का पानी (1-2 सें.मी.) क्यारियों में भरा रहने दें, जिससे खरपतवारनाशी एक समान क्यारियों में फैल जाये।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर ’सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-११००१२।</p>