बागवानी फसलें और जरुरी बातें अमरूद की नई बढ़वार, जिस पर फूल लग रहे हों, की शाखा का 3/4 भाग काटकर निकाल दें। इससे बरसात की फसल तो कम हो जायेगी परंतु रबी की फसल में वृद्धि हो जायेगी। अमरूद म में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें। पुष्पन अवस्था पर 10 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव 10-15 दिनों के अंतर पर करने से जायद के मौसम में 3-8 गुना अधिक फसल प्राप्त होती है। अमरूद की फसल में मार्च से मई में फूल आते हैं। इसकी फसल अगस्त से लेकर मध्य अक्टूबर तक मिलती रहती है। अमरूद में बहार नियंत्रण के लिए 10 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव अप्रैल व मई में फूलों पर करें। मई की छंटाई के बाद उभरने वाली नई शाखाओं में सर्दियों की फसल के लिए अधिक फल देने की क्षमता होती है। तेज धूप से झुलसन को रोकने के लिए पेड़ों के बड़े अंगों और तनों पर कॉपर तथा चूने का लेप लगाएं। आम के फलों का ऊतक क्षय रोग से बचाव के लिए 8 ग्राम बोरेक्स का 1 लीटर पानी में घोलकर इसका छिड़काव करें। आम में फुदका कीट नियंत्रण के लिए फलों के मटर के आकार की अवस्था पर मोनोक्रोटोफॉस 1.25 मि.ली./लीटर पानी में मिलाकर करना चाहिए। दासी मक्खी के नियंत्रण के लिए कार्बोरिल 0.2 प्रतिशत के साथ 0.1 शर्करा और 0.1 प्रतिशत मैलाथियान मिलाकर ट्रैप बनाकर लटकाएं। खर्रा या पाउडरी रोग के लिए 0.2 प्रतिशत घुलनशील गंधक का प्रयोग करें। कोइलिया फल विकार के लिए बोरेक्स 1 प्रतिशत का छिड़काव फल लगने पर सिंचाई के साथ करें। फलों को टपकने से रोकने के लिए वृद्धि हार्मोन एनएए 20 पीपीएम का छिड़काव करें। लीची के पौधों में फल मई-जून में पक कर तैयार हो जाते हैं। फल, पकने के बाद गहरे गुलाबी या लाल रंग के हो जाते हैं। इनकी तुड़ाई मई से जुलाई तक होती है। लीची को फटने से बचाने हेतु बागों में सिंचाई को उपयुक्त प्रबंधन होना आवश्यक है। साथ ही फल विगलन रोग से बचाव हेतु फलों को पकने से 20-25 दिनों पूर्व बाविस्टीन की 10 ग्राम मात्रा को 10 लीटर पानी में घोलकर फलों पर छिड़काव करें। केला रोपण हेतु 1.5 मीटर की दूरी पर 50×50 सें.मी. के गड्ढे बना लें। प्रत्येक गड्ढे को 10 कि.ग्रा. गोबर/कम्पोस्ट की खाद, 10 ग्राम कार्बोफ्यूरॉन, 50 ग्राम फॉस्फोरस तथा खेत के ऊपर की मिट्टी मिलाकर गड्ढों को भरें। रोपित केले में 25 ग्राम नाइट्रोजन पौधे से 50 सें.मी. दूर गोलाई में डालकर मिट्टी में मिलाकर सिंचाई करें। अंगूर के बाग में गर्मी के मौसम में लगातार एक सप्ताह के अंतराल पर सिंचाई करें। एंथ्रेक्नोज एवं सरकोस्पोरा पत्ती धब्बा की रोगों की रोकथाम के लिए फाइटोलोन या ब्लाईटाक्स का 0.3 प्रतिशत का छिड़काव अर्थात 750 ग्राम 250 लीटर पानी में प्रति एकड़ की मात्रा से एक बार मई के प्रथम सप्ताह में करें और 15 दिनों के अंतराल पर सितम्बर तक करते रहें। आम, अमरूद, पपीता, लीची, अंगूर, आंवला,बेर, नाशपाती, आलूबुखारा एवं नीबू में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। गर्मी के कारण उचित जल प्रबंधन आवश्यक होता है। अतः बागवानी फसलों में 10-12 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। जरूरत के हिसाब से कटाई-छंटाई करते रहना चाहिए। कागजी नीबू में फल फटने की समस्या के निराकरण हेतु पोटेशियम सल्फेट के 4 प्रतिशत का घोल पानी में मिलाकर छिड़काव करें। पुष्प व सुगंध वाले पौधों का प्रबंधन रजनीगंधा में एक सप्ताह के अंतराल पर सिंचाई व दो सप्ताह के अंतराल पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। इससे खेत में खरपतवार को बढ़ने से रोका जा सकता है। यह फसल के लिए हानिकारक होता है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में कंद लगाने का उचित समय फरवरी के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई तक है। देर से लगाने पर व्यवसाय के योग्य पुष्प डंडियां तो मिल जाती हैं परंतु नवजात कंद कम बनते हैं। पहाड़ी इलाकों में कंद रोपण का उचित समय मई से जून तक रहता है। कंद को पंक्तियों में लगाना ठीक रहता है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-40 सें.मी. एवं पंक्तियों में कंद से कंद की दूरी 15-20 सें.मी. रखनी चाहिए। एक एकड़ रजनीगंधा लगाने हेतु लगभग 50-60 हजार कंद की आवश्यकता होती है। अच्छी पुष्प डंडियां प्राप्त करने के लिए 3 से 5 सें.मी. व्यास वाले कंद लगाने चाहिए। कंद लगाते समय खेत में नमी का रहना आवश्यक है। गुलाब की फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई व निराई-गुड़ाई करते रहें। कंद से कल्ले अंकुरित होकर दिखाई देने लगें, तब सिंचाई कर देनी चाहिए।समय-समय पर वातावरण के अनुसार सिंचाई करते रहें। अच्छी पैदावार के लिए खेत में नमी बनी रहनी चाहिए कीट या बीमारी का प्रकोप हो तो 0.2 प्रतिशत फफूंदीनाशक कैप्टॉन या बाविस्टिन और 0.2 प्रतिशत कीटनाशक दवा-रोगोर, मेटासिस्टाक्स आदि का घोल बनाकर 20-25 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करते रहें। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), पूसा रोड, नई दिल्ली ।