<h3>बुआई एवं मूंगफली-गेहूं फसलचक्र </h3> <p style="text-align: justify;">सिंचित क्षेत्रों में जायद मूंगफली की बुआई मई के पहले सप्ताह तक कर सकते हैं। इसके लिए मूंगफली-गेहूं फसलचक्र अपनाया जा सकता है। परन्तु एक ही भूमि पर हर वर्ष मूंगफली न उगायें। इससे मृदा में कई तरह के रोग पैदा होते हैं। जायद मूंगफली की उन्नत किस्में एचबी 84, एम 522, एम 335, सिंचित क्षेत्रों में तथा एम 37 बारानी क्षेत्रों में, जहां वर्षा अच्छी हो, वहां लगाई जा सकती है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="187" height="147" /></p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग </h3> <p style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना लाभदायक रहता है। अधिक उत्पादन लेने के लिए सिंचित क्षेत्रों में उर्वरकों का प्रयोग 25-30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50-60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 40 कि.ग्रा. पोटाश, जबकि बारानी क्षेत्रों में 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजेन, 40 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 20-30 कि.ग्रा. पोटाश/हैक्टर संस्तुत किया गया है। अधिक उपज लेने के लिए बुआई के समय 250 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से जिप्सम का प्रयोग करना चाहिए। यदि किसी कारण से बुआई के समय जिप्सम को मृदा में नहीं डाला गया है, तो फसल जब 40-45 दिनों की हो जाये, तब पौधों की जड़ों में डालना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">जैविक खाद एवं अन्य तत्वाें की कमी पूरी करना</h3> <p style="text-align: justify;">ग्रीष्मकालीन मूंगफली मृदा में बुआई से पहले 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट/हैक्टर या जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। यदि खड़ी फसल में जिंक की कमी के लक्षण दिखाई दें, तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट व 0.25 प्रतिशत बुझे हुए चूने (200 लीटर पानी में 1 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट तथा 0.5 कि.ग्रा. बुझा चूना) का घोल बनाकर पर्णीय छिड़काव करना चाहिए। लोहे की कमी वाले क्षेत्रों में फसल में जैसे ही इसकी कमी के लक्षण दिखाई दें, तो 1 प्रतिशत फेरस सल्फेट (1 लीटर पानी में 10 ग्राम फेरस सल्फेट) का पर्णीय छिड़काव करें। बोरॉन की कमी वाली भूमि में बोरेक्स 10 कि.ग्रा./हैक्टर या जिप्सम के साथ खड़ी फसल में 40-45 दिनों की अवस्था में दें। </p> <h3 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण</h3> <p style="text-align: justify;">मूंगफली की फसल में खरपतवारों द्वारा लगभग 40-45 प्रतिशत तक की उपज में कमी आ जाती है। मूंगफली की फसल शुरूआती 30-35 दिनों की अवस्था में खरपतवारों के प्रति संवेदनशील होती है। खरपतवार निकालने के लिए 3 सप्ताह बाद निराई-गुड़ाई करना लाभदायक रहता है, जिसमें पहली निराई-गुड़ाई बुआई के 20-25 दिनों बाद एवं दूसरी निराई-गुड़ाई बुआई के 35-40 दिनों बाद करनी चाहिए।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%; text-align: justify;">मूंगफली की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिये ट्रेफलान या बासालिन (फ्लूक्लोरालिन) की 0.75-1.0 कि.ग्रा./हैक्टर सक्रिय तत्व की मात्रा बुआई से पहले मृदा में मिला दें। बुआई से पहले खरपतवारनाशी का प्रयोग नहीं किया गया हो तो बुआई से 1-3 दिनों के अन्दर लासों की 1.5-2.0 कि.ग्रा./हैक्टर या पेन्डीमिथेलिन की 1.0-1.25 कि.ग्रा./हैक्टर सक्रिय तत्व की मात्रा छिड़काव द्वारा अच्छी तरह मिट्टी में मिलाएं। खड़ी फसल में चौड़ी पत्ती एवं घास वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए इमेजेथाफायर (10 प्रतिशत एसएल) की 75-100 ग्राम/हैक्टर सक्रिय तत्व की मात्रा का बुआई के 20-25 दिनों पर छिड़काव अवश्य करें।</td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">एफिड/रस चूसने वाले चेंपा कीट</h3> <p style="text-align: justify;">एफिड/रस चूसने वाले चेंपा कीट अर्भक और प्रौढ़ (5-10 एपिफड/अंतस्थ कलिका) कीट नयी प्ररोहों व फूलों का रस चूसकर नुकसान पहुंचाते हैं। प्रभावित पौधे छोटे रह जाते हैं तथा पत्तियां व तना टेढ़े हो जाते हैं। चेंपा/एफिड रोगकारक विषाणुओं के वाहक का काम भी करता है जैसे-मूंगफली का रोजेट विषाणु एवं मूंगफली का धारी विषाणु। मूंगफली की फसल में रस चूसने वाले कीटों के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 एसएल 2.5 मि.ली./लीटर या इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 एसएल 0.3 मि.ली./लीटर या डायमेथोएट 30 ईसी 2.0 मि.ली./लीटर या एसीटामीप्रिड 20 एसपी का 0.2 ग्राम/लीटर की दर से पानी में घोलकर बुआई के 25-30 दिनों के बीच छिड़काव करें। रोगों की रोकथाम के लिए बीजोपचार ही सबसे सर्वोत्तम तरीका है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर ’सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-११००१२।</p>