सिंचाई बालियां तथा फूल निकलने के समय खेत में पर्याप्त नमी बनाये रखने के लिए आवश्यकतानुसार सिचाई करें। अनुसंधान के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि एक सिंचाई से दूसरी सिंचाई में अंतराल रखें यानी खेत का पानी सूखने के 2-3 दिनों बाद दूसरी सिंचाई करें। उर्वरक धान में नाइट्रोजन की दूसरी व अन्तिम मात्रा टॉप ड्रेसिंग के रूप में 50-55 दिनों के बाद अर्थात बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था में, अधिक उपज देने वाली उन्नतशील प्रजातियों के लिए 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन तथा सुगंधित प्रजातियों के लिए 15 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। राेग पत्ती का जीवाणु झुलसा रोग यह रोग जीवाणु द्वारा होता है। पौधों की छोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक यह रोग कभी भी हो सकता है। इस रोग में पत्तियों के किनारे ऊपरी भाग से शुरू होकर मध्य भाग तक सूखने लगते हैं। सूखे पीले पत्तों के साथ-साथ राख के रंग के चकत्ते भी दिखाई देते हैं। संक्रमण की उग्र अवस्था में पूरी पत्ती सूख जाती है। रोकथाम के लिए उपचारित बीज का प्रयोग करें। इसके लिए 2.5 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन + 25 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड प्रति 10 लीटर पानी के घोल में बीज को 12 घंटे तक डुबोएं। नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग कम कर दें। जिस खेत में रोग लगा हो उसका पानी दूसरे खेत में न जाने दें। इससे रोग फैलने की आशंका होती है। खेत में रोग को पफैलने से रोकने के लिए खेत से समुचित जल निकास की व्यवस्था की जाए तो रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। रोग की रोकथाम के लिए 74 ग्राम एग्रीमाइसिन-100 और 500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टर की दर से तीन-चार बार छिड़काव करें। पहला छिड़काव रोग प्रकट होने पर तथा उसके पश्चात आवश्यकतानुसार 10 दिनों के अन्तराल पर करें। रोग सहिष्णु किस्में जैसे पन्त धान-4, पन्त धान-12, रत्ना, गोबिन्द व मनहर आदि का प्रयोग करना चाहिए। फाल्स स्मट एवं उसकी राेकथाम धान की फसल के पकते समय नसवार जैसे दाने धान के दानों के साथ लग जाते हैं। इससे फसल की उपज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस रोग को 'फाल्स स्मट' के नाम से जाना जाता है। रोगग्रस्त दाने आकार में सामान्य दानों से दोगुने या 5-6 गुना होते हैं। रोग को कम करने के लिए 500 ग्राम मैंन्कोजेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को 200 लीटर पानी में प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए। भूरा धब्बा नामक रोग की रोकथाम के लिए जिंक मैंग्नीज कार्बोनेट 75 प्रतिशत की 2 कि.ग्रा. मात्रा को 800 लीटर पानी में घोलकर/हैक्टर में छिड़काव करें। धान का तना छेदक कीट यह धारीदार गुलाबी पीले या सफेद रंग का कीट होता है। इस कीट की गिडार ही नुकसान पहुंचाती है। फसल की प्रारम्भिक अवस्था में इसके प्रकोप से पौधों का मुख्य तना सूख जाता है। इसके नियंत्रण के लिए अगर डेड हार्ट की संख्या 5 प्रतिशत या ज्यादा हो जाये तो तनाछेदक कीट के नियंत्रण के लिए डाईमेक्रान 590 मि.ली. प्रति हैक्टर या मोनोक्रोटोफॉस (36 ई.सी.) 1.4 लीटर प्रति हैक्टर या कोरबा 2.5 लीटर प्रति हैक्टर या कार्टेप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर या क्यूरालफॉस (5 जी) 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर या फोरेट (10 जी) 10 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर या यूराडॉन (3 जी) 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर या कुइनलफॉस 20 ई.सी. प्रति 2 मि.ली. प्रति लीटर की दर से 500-700 लीटर पानी में घोलकर 3-4 सें.मी. खड़े पानी में छिड़काव करें। लाइट ट्रैप द्वारा पकड़कर भी इसकी रोकथाम की जा सकती है। रोपाई के 30 दिनों बाद से ट्राइकोकार्ड 1-1.5 लाख अंडे प्रति हैक्टर प्रति सप्ताह की दर से 2-6 सप्ताह तक प्रयोग करें। गंधीबग का आक्रमण एवं राेकथाम गंधीबग का आक्रमण होने पर धान के खेत से दुर्गंध आती है। इसके वयस्क एवं शिशु कीट दोनों दूधिया अवस्था में दानों से रस चूसकर उन्हें खोखला कर देते हैं तथा उन पर काले धब्बे बन जाते हैं। गंधीबग के नियंत्रण के लिए मैलाथियान धूल 5 डी/1-5 ग्राम प्रति हैक्टर या एफीसेट 75 एस.पी. /1-5 ग्राम प्रति लीटर पानी या डी.डी.वीपी. 76 ई.सी./1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्यूनालफॉस 25 ई.सी./2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। स्त्राेत : राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012, खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)।