भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था तथा आजीविका का एक महत्वपूर्ण आधार है। आज रबी फसलों की उत्पादकता खरीफ फसलों से अधिक है। इसका श्रेय इन फसलों की नवीन प्रजातियों एवं उन्नत सस्य क्रियाओं को अपनाने के अलावा रोगों व कीट-पतंगों की रोकथाम को जाता है। इसी के कारण विगत वर्ष में रबी की फसलों का रिकार्ड उत्पादन हुआ। कृषि उत्पादन में इस वृद्धि का पूरा श्रेय किसान भाइयों की कड़ी मेहनत, कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित नई-नई तकनीकों एवं उपलब्ध संसाधनों के उचित प्रबंधन को जाता है। सर्दी के मौसम का इंतजार करता अक्टूबर का महीना खेती के लिहाज से अहम है। सिंचाई की आवश्यकता फसल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए समुचित मात्रा में सही समय पर सुनिश्चित जल उपलब्धता बहुत महत्वपूर्ण है। धान में फूल आते समय तथा दाने की दुग्धावस्था पर खेत में नमी बनाए रखने के लिए एक सप्ताह के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। परन्तु कटाई से 15 दिनों पूर्व सिंचाई बन्द कर दें। कटाई का उपयुक्त समय धान की अधिक उपज और गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए फसल की उचित समय पर कटाई आवश्यक है। कटाई का सही समय, वातावरण, प्रजातियों, सस्य क्रियायों एवं बढ़ाव पर निर्भर करता है। बालियां निकलने के लगभग एक माह बाद सभी प्रजातियां पक जाती हैं। धान की कटाई के लिए जब दानों में 20 प्रतिशत नमी हो, वह समय कटाई के लिए उपयुक्त होता है। धान का रंग पीला होना भी परिपक्वता परिलक्षित करता है। बालियों में 80 प्रतिशत दाने पक जाने पर ही कटाई करना लाभकारी होता है। फसल की मड़ाई हाथ से पीटकर, बैलों द्वारा या थ्रेशर से कर सकते हैं। कम्बाइन द्वारा कटाई एवं मड़ाई का कार्य एक साथ हो जाता है। भंडारण धान की नमी कम करने के लिए धान के दानों को अच्छी तरह सुखाकर ही भंडारण करना चाहिए। भंडारण से पूर्व दानों को 10-12 प्रतिशत नमी तक सुखा लेते हैं। सैनिक कीट इनकी सूंडियां झुंड में पायी जाती हैं और फसल को काफी नुकसान पहुंचाती हैं। सूंडियां नर्सरी एवं खेत में पौधों को इस प्रकार खाती हैं जैसे कि लगता है पशु एक तरफ से चर गये हों। इस कीट के नियंत्रण के लिए मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण अथवा फेन्थोएट का 2 प्रतिशत चूर्ण 25-30 कि.ग्रा. या एसीफेट 75 एसपी 1.0 ग्राम प्रति लीटर पानी या डीडीवीपी 76 ई.सी. 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 2.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी या मैलाथियान धूल 5 डी. 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से पानी में मिलाकर छिड़काव करें। गंधीबग कीट इसका आक्रमण होने पर धान के खेत से दुर्गन्ध आती है। इस कीट के वयस्क या प्रौढ़ एवं शिशु कीट दूधिया अवस्था में दानों से रस चूसकर उन्हें खोखला कर देते हैं। इससे उन पर काले धब्बे बन जाते हैं व प्रभावित दानों में चावल नहीं बनते हैं। गंधीबग के नियंत्रण के लिए मैलाथियॉन धूल 5 डी 20-25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर या क्विनालफॉस 25 ई.सी./ 2 मि.ली. प्रति लीटर या एसीफेट 75 एसपी 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या डीडीवीपी 76 ई.सी. 1.5 मि.ली. प्रति लीटर अन्यथा कार्बारिल या मिथाइल पैराथियान धूल 25-30 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से पानी में मिलाकर छिड़काव करें। चूहों का नियंत्रण धान की फसल में चूहे भी बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। चूहों का नियंत्रण एक सामूहिक कार्य है। एकाकी नियंत्राण अप्रभावी होता है। इनके नियंत्रण के लिए सभी उपलब्ध विधियों जैसे-गैस उपयोग में लानी चाहिए। इसके अलावा विषयुक्त खाद्य के सही उपयोग के लिए पहले दिन विषरहित खाद्य देना चाहिए। अन्य दिनों में 19 भाग मक्का, गेहूं, चावल, एक भाग रेटाफिन या रोडाफिन को तेल व चीनी के साथ मिलाकर देना चाहिए। एक खाद्य एक सप्ताह तक देने के बाद जिंक फॉस्फाइड मिला हुआ खाद्य, 95 भाग ज्वार के दाने, 2.5 भाग जिंक फॉस्फाइड तथा उतना ही भाग सरसों का तेल मिलाकर देना चाहिए। धान में तनाछेदक कीट प्रकाश प्रपंच के उपयोग से तनाछेदक की संख्या पर निगरानी रखें। निगरानी के लिए फेरोमोन प्रपंच 5 प्रति हैक्टर पीला तनाछेदक के लिए लगाएं। तनाछेदक की सूंडियां ही फसल को नुकसान पहुंचाती हैं। वयस्क पतंगे फूलों के शहद आदि पर निर्वाह करते हैं। बाली आने से पहले इनके नुकसान के लक्षणों को 'डेड-हार्ट' तथा बाली आने के बाद सफेद बाली के नाम से जाना जाता है। रोपाई के 30 दिनों बाद ट्राइकोकार्ड (ट्राइकोग्रामा जैपोनिकम) 1 से 1.5 लाख प्रति हैक्टर प्रति सप्ताह की दर से 2 से 6 सप्ताह तक छोड़ें। तनाछेदक कीट की रोकथाम के लिए दानेदार कीटनाशी जैसे-कार्बोफ्रयूरॉन 3 जी या कारटैप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी या फिप्रोनिल 0.3 जी 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें अथवा क्विनालफॉस 25 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति लीटर या कारटैप हाइड्रोक्लोराइड 50 एसपी 1 मि.ली. प्रति लीटर या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें। धान में हरे फुदके फसल पर इस कीट की निगरानी बहुत जरूरी है। फुदके तने पर होते हैं तथा पत्तों पर नहीं दिखते। इनकी निगरानी के लिए प्रकाश-प्रपंच का प्रयोग भी किया जा सकता है। फुदके काले, भूरे एवं सफेद रंग के छोटे-छोटे कीट होते हैं। इनके शिशु व वयस्क दोनों ही पौधों के तने पर्णच्छद व तने से रस चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। फुदके के नियंत्रण के लिए कार्बेरिल 50 डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति लीटर या बुप्रोफेजिन 25 एस.सी. 1 मि.ली. प्रति लीटर या इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.ली. प्रति 3 लीटर पानी या थायोमेथोक्जम 25 डब्ल्यपूी 1 ग्राम प्रति 5 लीटर या बीपीएमसी 50 ई.सी. 1 मि.ली. प्रति लीटर की दर से पानी में मिलाकर छिड़काव करें। दानेदार कीटनाशी जैसे-फिप्रोनिल 0.3 जी 25 कि.ग्रा. या कार्बोफ्रयूरॉन 3 जी 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग कर सकते हैं। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और बिपिन कुमार ’सस्य विज्ञान संभाग एवं जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001