गेहूँ बढ़वार की क्रांतिक अवस्था समय पर गेहूं की बोई गयी फसल में इस समय बढ़वार की क्रांतिक अवस्था होती है और उपयुक्त सस्य कृषि क्रियायें, गेहूं में कल्लों की संख्या के साथ-साथ सम्पूर्ण वृद्धि चरण को भी प्रभावित करती हैं। सिंचाई गेहूं की बुआई के 20-25 दिनों पर 5-6 सें.मी. की पहली सिंचाई ताजमूल (सी.आरआई.) अवस्था पर और दूसरी सिंचाई 40-45 दिनों पर कल्ले निकलते समय करें। सघन या बहु कृषि प्रणालियाें के लाभ वर्तमान समय में प्रति इकाई भूमि से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए सघन या बहु कृषि प्रणालियों को अपनाया जा रहा है। मुख्य फसलों के बीच में कम अवधि वाली फसलें जैसे मटर, आलू, तोरिया आदि को उगाया जाता है। इससे गेहूं की बुआई समय पर नहीं हो पाती है। इसी प्रकार गन्ने की कटाई के बाद गेहूं की बुआई भी समय पर नहीं हो पाती है। सामान्यतः पाया गया है कि देरी से बोये गये गेहूँ में भी किसान सामान्य गेहूं हेतु अनुमोदित सस्य कृषि क्रियायें अपनाते हैं। इसी कारण इसकी उत्पादकता काफी कम हो जाती है। दिसंबर में तापमान कम होने के कारण अंकुरण काफी कम होना, प्रारंभ में धीमी गति से वृद्धि एवं फरवरी-मार्च में तापमान बढ़ जाने का कारण फसल का जल्दी पकना है। अतः देरी से बोये जाने वाले गेहूं से अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु उन्नत तकनीकियों को ही अपनाना चाहिए। पछेती गेहूं से अधिक उत्पादन पछेती गेहूं से अधिक उत्पादन लेने के लिए बुआई एक निश्चित समय जैसे कि पूर्वी भारत में 10 दिसंबर तक, उत्तरी भारत में 25 दिसंबर तक एवं दक्षिणी भारत में 30 नवंबर तक कर देनी चाहिए। पछेती बुआई के लिए गेहूं की किस्में पछेती बुआई की परिस्थितियों में भी अधिकतर किसान सामान्य प्रजातियों को ही उगाता है, जिनसे उनकी उत्पादकता कापफी कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में अधिक पैदावार लेने के लिए देरी से बुआई हेतु अनुमोदित प्रजातियों को ही बोना चाहिए। सिंचित अवस्था में देरी से बुआई के लिए उन्नतशील प्रजातियां जैसे-एच.आई.-1621, एच.डी.-3271, एच.डी.-3018, एच.डी.-3167, एच.डी.-3117, एच.डी.-3118, एच.डी.-3059,एच.डी3090, एच.डी. 2985, एच.डी. 2643, एच.डी. 2864, एच.डी. 2824,एच.डी. 2932, एच.डी.-2894, एच.डी.-2833, एच.डी.-2501,डब्ल्यू.आर. 544 ;पूसा गोल्डद्ध, डी.बीडब्ल्यू. 14, डी.बी.डब्ल्यू. 16, डी.बी.डब्ल्यू. 71, डी.बी.डब्ल्यू. 90, डी.बी.डब्ल्यू. 107, पी.बी.डब्ल्यू. 373, पी.बी.डब्ल्यू. 590, पी.बी.डब्ल्यू. 154, पी.बी.डब्ल्यू.-335, एच. डब्ल्यू2045,एच.पी.1744, एन.डब्ल्यू-2036,डब्ल्यू.एच. 102, एच.आई. 1563, एच.आई.-1977, एच.यू. डब्ल्यू.-234, के. 9423, के. 9533, यू.पी. 2338, यू.पी. 2425, एच.पी. 1744, राज. 3765, राज. 4328, राज.-3077, एम.पी. 4010, एम.पी. 3336, एम.पी.१२०३ पर्वतीय क्षेत्रों के लिए वी.एल. 892, एच.एम.-375, एच.एस.-207, एच.एस.-420 औरएच.एस. 490 प्रमुख हैं। यदि दानों का आकार बड़ा या छोटा है तो उसी अनुपात में बीज दर घटाई या बढ़ाई जा सकती है। बीज एवं उसका उपचार बीज साफ, स्वस्थ एवं खरपतवारों के बीजों से रहित होना चाहिए। छोटे व कटे-फटे तथा सिकुड़े हुए बीजों को निकाल देना चाहिए। आधारीय एवं प्रमाणित बीजों को ही बोना चाहिए। यदि बीज शोधित न हो तो 1.0 कि.ग्रा. बीज को 2.5 ग्राम बाविस्टीन या 2 ग्राम कैप्टॉन या 2.5 ग्राम थिरम नामक दवा से शोधित कर लें। गेहूं की अवशेष बुआई शीघ्र पूरी कर लें। बीज की मात्रा सिंचित क्षेत्रों में पछेती बुआई एवं लवणीय-क्षारीय मृदाओं के लिए बीज दर 125 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर पर्याप्त होता है। इसी प्रकार उत्तरी-पूर्वी मैदानी क्षेत्र, जहां धान के बाद गेहूं बोया जाता है, के लिए 125 कि.ग्रा./हैक्टर बीज की आवश्यकता होती है। सामान्यतः गेहूं को 15-23 सें.मी. की दूरी पर पंक्तियों में बोया जाता है। देरी से बोने पर तथा ऊसर भूमि में पंक्तियों की दूरी 15-18 सें.मी. रखनी चाहिए। अच्छे अंकुरण के लिये बीज की गहराई 4 से 5 सें.मी. हो। बुआई की विधि बुआई देसी हल या सीडड्रिल से ही करनी चाहिए। छिड़कवां विधि से बोने से बीज ज्यादा लगता है तथा जमाव कम, निराई-गुड़ाई में असुविधा तथा असमान पौध संख्या होने से उपज कम हो जाती है। अतः इस विधि को नहीं अपनाना चाहिए। आजकल सीडड्रिल से बुआई काफी लोकप्रिय हो रही है, क्योंकि इससे बीज की गहराई तथा पंक्तियों की दूरी नियंत्रित रहती है। इससे जमाव अच्छा होता है। विभिन्न परिस्थितियों में बुआई हेतु फर्टिसीड ड्रिल, जीरो-टिल ड्रिल या शून्य फर्बड्रिल आदि मशीनों का प्रचलन बढ़ रहा है। खाद एवं उर्वरकाें का उपयाेग बुआई से पूर्व गोबर की खाद 5 से 10 टन प्रति हैक्टर की दर से मृदा में अच्छी तरह मिला दें। यह भूमि का उचित तापमान एवं जल धारण क्षमता बनाये रखने में सहायक होता है, जिससे पौधों की अच्छी बढ़वार एवं विकास होता है। पछेती गेहूं के लिये प्रति हैक्टर 120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 40 कि.ग्रा. पोटाश की जरूरत होगी। बुआई के समय बलुई दोमट भूमि में फॉस्फेट और पोटाश की समूची मात्रा के साथ 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, जबकि भारी दोमट मृदा में 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन का प्रयोग करें। जिंक सल्फेट की कमी गेहूं की फसल में यदि जिंक सल्फेट की कमी है तो 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय खेत में डालनी चाहिये। यदि इसके बाद भी जिंक सल्फेट की कमी दिखाई देती है तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का पर्णीय छिड़काव (21 प्रतिशत) किसान अवश्य करें। नाइट्रोजन की टॉपड्रेसिंग बलुई दोमट भूमि में प्रति हैक्टर 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन व भारी दोमट भूमि में 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की टॉपड्रेसिंग पहली सिंचाई के समय अवश्य करें। बलुई दोमट भूमि में नाइट्रोजन की शेष 40 कि.ग्रा. मात्रा दूसरी सिंचाई के समय आवश्यक होगी। गंधक की कमी गंधक की कमी को दूर करने के लिए गंधकयुक्त उर्वरक जैसे-अमोनियम सल्फेट या सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग अच्छा रहता है। इसी प्रकार मैंगनीज की कमी वाली भूमि में 1.0 कि.ग्रा. मैंगनीज सल्फेट को 200 लीटर पानी में घोलकर पहली सिंचाई के 2-3 दिनों पहले छिड़काव करना चाहिए। सिंचाई की आवश्यकता गेहूं की फसल की सम्पूर्ण अवधि में लगभग 35-40 सें.मी. जल की आवश्यकता होती है। इसके छत्रक (क्राउन) जड़ें निकलने तथा बालियों के निकलने की अवस्था में सिंचाई अति आवश्यक होती है, अन्यथा उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। गेहूं के लिए सामान्यतः 4-6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। खरपतवार नियंत्रण गेहूं की फसल में प्रमुख खरपतवार जैसे-गेहूं का मामा, कृष्णनील, मोथा, बथुआ, चटरी-मटरी, हिरनखुरी, सैंजी, अंकरी, अंकरा, जंगली जई, जंगली पालक, जंगली गाजर, मुख्य हैं। फसलों में सर्वाधिक नुकसान खरपतवारों द्वारा होता है। इसलिए खरपतवारों का समय से नियंत्रण बहुत ही आवश्यक है। सामान्यतः खरपतवार फसलों को प्राप्त होने वाली 47 प्रतिशत नाइट्रोजन, 42 प्रतिशत फॉस्फोरस, 50 प्रतिशत पोटाश, 24 प्रतिशत मैग्नीशियम एवं 39 प्रतिशत कैल्शियम तक का उपयोग कर लेते हैं। संकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिये सल्फोसल्फ्यूरॉन 75 डब्ल्यू.पी. की 33.0 ग्राम या टाइसोप्रोटूरॉन + मैटासल्फ्यूरॉन मिथाइल 75 डब्ल्यू.पी+20 डब्ल्यू.पी. की 1.0-1.3 कि.ग्रा. + 20 ग्राम या सल्फोसल्फ्यूरॉन 75 प्रतिशत + मैटासल्फ्यूरॉन मिथाइल 5 प्रतिशत की 40 ग्राम या क्लोडिनाफॉप 15 प्रतिशत + मैटासल्फ्यूरॉन मिथाइल 1 प्रतिशत वेस्टा 15 डब्ल्यू.पी. की मात्रा 600-800 लीटर पानी में घोलकर पहली सिंचाई के बाद, परन्तु 30 दिनों की अवस्था से पूर्व प्रति हैक्टर छिड़काव करें। जाै सिंचाई जाै की खेती के लिए अन्य दानें वाली वाली फसलाें की अपेक्षा कम पानी की आवश्यकता होती है। जौ की सफल खेती के लिए 2-3 सिंचाइयाें की ही आवश्यकता पड़ती है। यदि किसान के पास एक ही सिंचाई उपलब्ध हो तो उसका प्रयोग ब्यांत अवस्था या कल्ले बनते समय (बुआई के 30-35 दिनों बाद) करना चाहिए। दो सिंचाई की सुविधा होने पर पहली सिंचाई सक्रिय कल्ले फूटने की अवस्था(बुआई के 25-30 दिनों बाद) तथा दूसरी सिंचाई बाली आने की अवस्था(बुआई के 65-70 दिनों बाद) पर दें। क्षारीय व लवणीय मृदा में अधिक संख्या में हल्की सिंचाई देना उत्तम माना जाता है। नाइट्रोजन की टाॅपड्रेसिंग सिंचाई के बाद नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा से 30 कि.ग्रा. (66 कि.ग्रा. यूरिया) प्रति हैक्टर की दर से टाॅपड्रेसिंग करें। खरपतवारनाशी का उपयाेग जौ की फसल सामान्यतः शीघ्र बढ़ने वाली होती है तथा अन्य खरपतवाराें को बढ़ने नहीं देती। अधिक मात्रा में खरपतवार हाेने पर ही खरपतवारनाशी का प्रयाेग सावधानीपूर्वक करें। संकरी पत्ती (जंगली जई एवं गुल्ली डंडा) वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिये पैन्डीमिथीलिन (30 प्रतिशत) 3.5 लीटर या आइसोप्रोट्यूराॅन(75 प्रतिशत) 1.25 कि.ग्रा. एवं चाैड़ी(बथुआ, वनगाजर,हिरनखुरीद) वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिय 2,4-डी(सोडियम लवण 80 प्रतिशत) 650 ग्राम एवं संकरी व चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिये 2,4-डी एस्टर 750 ग्राम या आइसोगार्ड प्लस 1.25 कि.ग्रा. या आइसाेप्राेट्यूरॉन(75प्रतिशत) 1.0 कि.ग्रा.बुआई के 30-35 दिनाें बाद 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। स्त्रोत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अजय कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012