<h3 style="text-align: justify;">अनुमोदित किस्म एवं अधिक पैदावार</h3> <p style="text-align: justify;">पछेती बुआई की परिस्थितियों में भी अधिकतर किसान सामान्य प्रजातियों को ही उगाते हैं, जिनसे उनकी उत्पादकता काफी कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में अधिक पैदावार लेने के लिए देरी से बुआई के लिए अनुमोदित किस्मों को ही बोना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/PIC1jpg.jpg" width="157" height="137" /></p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचित अवस्था में देरी से बुआई के लिए</h3> <p style="text-align: justify;">सिंचित अवस्था में देरी से बुआई के लिए उन्नत प्रजातियां जैसे-एच.आई.-1621, एच.डी.-3271, एच.डी.-3018, एच.डी.-3167, एच.डी.-3117. एच.डी.-3118.एच.डी.-3059.एच.डी. 3090, एच.डी. 2985, एच.डी. 2643, एच.डी. 2864, एच.डी. 2824,एच.डी. 2932, एच.डी.-2894, एच.डी.-2833, एच.डी.-2501, डब्ल्यू.आर. 544 (पूसा गोल्ड), डी.बी. डब्ल्यू. 14, डी.बी.डब्ल्यू. 16, डी.बी.डब्ल्यू. 71</p> <h3 style="text-align: justify;">पर्वतीय क्षेत्रों के लिए</h3> <p style="text-align: justify;">पर्वतीय क्षेत्रों के लिए वी.एल. 892, एच.एम.-375, एच.एस.-207, एच.एस.-420 व एच.एस. 490 प्रमुख हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">दानों का आकार बड़ा या छोटा होने की स्थिति में</h3> <p style="text-align: justify;">यदि दानों का आकार बड़ा या छोटा है, तो उसी अनुपात में बीज दर घटाई या बढ़ाई जा सकती है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(दिसंबर माह, आईसीएआर), राजीव कमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कमार उपाध्याय , एस.एस. राठौर-सस्य विज्ञान विभाग, भाकृअनुप.-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012; अमन सिंह- आनुवंशिकी विभाग, आचार्य नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या, 224229 (उत्तर प्रदेश); और नितिन कुमार शुक्ला-श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय, पौढ़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)।</p>