रोग का प्रकोप चने की फसल का यह रोग प्रमुख रूप से हानि पहुंचाता है। इस रोग का प्रकोप इतना भयावह है कि पूरा खेत इसकी चपेट में आ जाता है। प्रमुख कारक उकठा रोग का प्रमुख कारक फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम प्रजाति साइसेरी नामक फफूंद है। यह मृदा तथा बीजजनित रोग है। यह रोग पौधे में फली लगने तक किसी भी अवस्था में हो सकता है। लक्षण उकठा रोग के लक्षण शुरुआत में खेत में छोटे-छोटे हिस्सों में दिखाई देते हैं और धीरे-धीरे पूरे खेत में फैल जाते हैं। इस रोग में पौधे की पत्तियां सूख जाती है और उसके बाद पूरा पौधा मुरझाकर सूख जाता है। ग्रसित पौधे की जड़ के पास चीरा लगाने पर उसमें काली संरचना दिखाई पड़ती है। रोग की रोकथाम उकठा रोग की रोकथाम के लिए बुआई अक्टूबर के अंत या नवंबर के प्रथम सप्ताह में कर देनी चाहिए। बाविस्टीन 2.5 ग्राम या कार्बक्सिन + 2 ग्राम थीरम या 2 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी + 1 ग्राम/कि.ग्रा. बीजकी दर से बीजोपचार करें। प्रजातियां उन्नत देसी प्रजातियां उन्नत देसी प्रजातियां जैसे-पूसा- 372, जेजी 11, जेजी | 12, जेजी 16. जेजी 63.जेजी 74,जेजी 130. जेजी 32, जेजी 315. जेजी 322, जे 5637, जे 5655, आरएसजी 888, आरएसजी 896, डीसीपी-92-3, हरियाणा चना-1, जीएनजी 663 उन्नत काबुली प्रजातियां उन्नत काबुली प्रजातियां जैसे पूसा चमत्कार, जवाहर काबुली चना-1, विजय, फुले जी- 95311, जेजीके 1, जेजीके 2, जेजीके 3 आदि उकठा रोगरोधी प्रजातियों का चयन करें। स्त्रोत : खेती पत्रिका(दिसंबर माह, आईसीएआर), राजीव कमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कमार उपाध्याय , एस.एस. राठौर-सस्य विज्ञान विभाग, भाकृअनुप.-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012; अमन सिंह- आनुवंशिकी विभाग, आचार्य नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या, 224229 (उत्तर प्रदेश); और नितिन कुमार शुक्ला-श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय, पौढ़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)।