<h3>लूसर्न व बरसीम चारा</h3> <h4>प्रथम कटाई </h4> <p style="text-align: justify;">बुआई के 45-50 दिनों बाद इन चारा फसलों की प्रथम कटाई कर लेनी चाहिए। इसके बाद 25-30 दिनों के अंतराल से कटाई करते रहें। भूमि सतह से 5-7 सें.मी. की ऊंचाई पर कटाई करें। कटाई के तुरन्त बाद सिंचाई कर देनी चाहिए। गर्मी में पशुओं के लिए लूसर्न व बरसीम चारे का संरक्षण करें। </p> <h4 style="text-align: justify;">सिंचाई </h4> <p style="text-align: justify;">ध्यान रहे कि प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">यूरिया की टॉपड्रेसिंग</h4> <p style="text-align: justify;">20 कि.ग्रा नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से यूरिया की टॉपड्रेसिंग फसल की बढ़वार के लिए अवश्य करें। यदि फसल 50-55 दिनों की हो गयी है तो पहली कटाई कर लें। पहली कटाई करते समय ध्यान रहे कि कटाई 5-6 सें.मी. ऊपर से की जाये, ताकि बाद में वृद्धि अच्छी हो। इसके बाद 20-30 दिनों के अंतराल पर कटाई करते रहें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cDn.jpg" width="228" height="149" /></p> <h4 style="text-align: justify;">बरसीम की फसल एवं तना विगलन रोग</h4> <p style="text-align: justify;">बरसीम की फसल में यदि तना विगलन रोग के लक्षण दिखें तो बहुकटाई वाली फसलों की कटाई समय पर करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">जई </h3> <h4>बुआई</h4> <p style="text-align: justify;">जई की बुआई के 55-60 दिनों बाद जई की चारे के लिये कटाई करें। जई की बुआई के 20-25 दिनों बाद पहली सिंचाई करें तथा उसके बाद 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से टॉपड्रेसिंग करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">सिंचाई</h4> <p style="text-align: justify;">चारे हेतु जई की फसल में 20-25 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें।</p> <h4 style="text-align: justify;"> कटाई-छंटाई</h4> <p style="text-align: justify;">कटाई 8-10 सें.मी. जमीन के ऊपर करने से कल्ले निकलते हैं। बीज लेने के लिए पहली कटाई के बाद फसल छोड़ दें। </p> <p style="text-align: justify;">पुराने स्थापित चारा वृक्ष से प्रजाति के अनुसार 20-30 प्रतिशत कटाई-छंटाई कर हरा चारा प्राप्त करें। नए रोपित चारा वृक्ष की देखरेख करें। सूखे घास के बंडल का पशु चारे के रूप में प्रयोग करें। प्राकृतिक चरागाह में क्रमबद्ध चराई करवाएं। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अजय कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>