शिमला मिर्च सिंचाई मिर्च, सब्जी मटर, राजमा, सेम और शिमला मिर्च में समयानुसार एक हल्की सिंचाई का प्रबंध करें। बुआई एवं राेपाई शिमला मिर्च के लिए बुआई अक्टूबर एवं राेपाई दिसंबर-जनवरी में उपयुक्त है। रोपाई की दूरी किस्म पर निर्भर करती है। सामान्यतः पंक्ति से पंक्ति की दूरी व पौधे से पौधे की दूरी 45 सें.मी. पर्याप्त होती है। खेत की तैयारी खेत की तैयारी के समय प्रति हैक्टर 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 100 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 100 कि.ग्रा. पोटाश डालें तथा रोपाई के 30-35 दिनों बाद खड़ी फसल में 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। रोग नियंत्रण झुलसा रोग की रोकथाम शिमला मिर्च में झुलसा रोग की रोकथाम हेतु स्वस्थ बीजों का प्रयोग करें। फसलचक्र में गैर सोलनेसी कुल के पौधों का उपयोग करें। फफूंदनाशक रसायन फफूंदनाशक रसायन में मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर, जिनेब 2 ग्राम प्रति लीटर, साइमोक्सानिल+मैंकोजेब 1.5-2 ग्राम या एजोक्सीस्ट्रांबिन 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के साथ छिड़काव अवश्य करें। शीर्षमरण (डाईबैक) एवं फल सड़न रोग मिर्च की फसल में शीर्षमरण (डाईबैक) एवं फल सड़न रोग दिखाई दें, तो इनकी रोकथाम के लिए लिए कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा बीज की दर से उपचारित करें। क्लोरोथैलोनील 1.5 ग्राम प्रति लीटर या डाइफेनोकोनाजोल 1.0 ग्राम प्रति लीटर या प्रोपिनेब 3.5 ग्राम प्रति लीटर या टेबुकोनाजोज 1.0 ग्राम प्रति लीटर या एजोक्सी स्ट्रोबिन 1.0 ग्राम प्रति लीटर की दर से पानी के साथ मिलाकर छिड़काव करें। गाजर किस्में गाजर की किस्मों पूसा यमदग्नि, पूसा नयन ज्योति एवं नैन्ट्स की दिसंबर से फरवरी में बुआई कर सकते हैं। बुआई के 75-80 दिनों बाद तैयार एवं औसत उपज 200-250 क्विंटल/ हैक्टर देने में सक्षम हैं। चप्पन कद्दू यदि लो टनल की सुविधा हो तो दिसबंर में भी बुआई की जा सकती है। चप्पन कद्दू की बुआई इस महीने की जा सकती है। इसकी आस्ट्रेलियाई ग्रीन किस्म से उपज लगभग 250-300 प्रति क्विटंल प्रति हैक्टर है। पूसा अलंकार भी एक अच्छी किस्म है, जिसकी पैदावार 450 क्विटंल प्रति हैक्टर तक प्राप्त होती है। शेष नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुआई के 20 व 35 दिनों के बाद पौधों की जड़ों के पास देकर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। पत्तीदार सब्जियां पालक व मेथी पत्तीदार सब्जियां पोषण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, सोडियम,पोटेशियम, रेशे तथा विटामिन 'ए', 'सी' की अच्छी स्रोत हैं। पालक व मेथी में पत्तियों की प्रत्येक कटाई के बाद प्रति हैक्टर 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की टॉपड्रेसिंग एवं सिंचाई करें। मूली किस्में उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्राों में मूली की यूरोपियन प्रजातियां जैसे-पूसा हिमानी, व्हाइट आइसकिल, रैपिड रेड व्हाइट टिप्ड एवं इस्कारलेट ग्लोब आदि की बुआई अक्टूबर से जनवरी तक कर सकते हैं। बुआई बुआई के समय खेत में नमी अच्छी प्रकार से होनी चाहिए। इसकी बुआई या तो छोटी-छोटी समतल क्यारियों में या 30-45 सें.मी. की दूरी पर बनी मेड़ों पर करते हैं। बीज जमने के बाद पौधों की दूरी 6-7 से.मी. रखते हैं। शरदकालीन फसल में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। मेड़ों पर सिंचाई हमेशा आधी मेड़ करनी चाहिए ताकि पूरी मेड़ भुरभुरा व नमीयुक्त बनी रहे। धनिया धनिया के पौधे 3-4 सें.मी. के हो जाने पर प्रति हैक्टर 15 कि.ग्रा. नाइट्रोजेन की टॉपड्रेसिंग कर दें। 15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की दूसरी टॉपड्रेसिंग पहली टॉपड्रेसिंग के 20-25 दिनों बाद करें। खीरा पॉलीहाउस तकनीक खीरावर्गीय सब्जियों की इस माह में पॉलीहाउस तकनीक द्वारा सर्दी से बचाव कर अच्छी फसल ले सकते हैं। इस समय बाजार में इन फसलों के दाम भी अच्छे मिलते हैं। इसके लिए इस महीने में पॉलीहाउस में बे-मौसमी नर्सरी लगाईं जा सकती है। 50 वर्ग मीटर वाले पॉलीहाउस को बनाने के लिए अनुमानित 11000 रुपये का खर्च आता है। इसमें अन्य बे-मौसमी सब्जियां जैसे-खीरा, चप्पन कद्दू, फ्रेंचबीन, टमाटर, लौकी आदि की फसल भी उगाई जा सकती है। स्त्रोत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अजय कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012