<p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span style="font-family: Mangal, serif;">मई में सिंचित क्षेत्रों में जायद की फसलें उगाई जाती हैं जबकि बरानी क्षेत्रों में आने वाले बरसात के मौसम के लिए सफल और अधिक उत्पादन को सुरक्षित करने के लिए तैयारी शुरू की जाती है। इस समय तक अधिकांश क्षेत्रों में गर्मी के मौसम में बोई जाने वाली फसलों की बुआई हो चुकी होती है। कुछ क्षेत्रों में अल्पावधि जैसे कद्दूवर्गीय और चारे वाली फसलों की बुआई की जानी है। समय पर बोई गयी फसलें जैसे लौकी, तोरई, टिंडा, तरबूज, खरबूजा, भिंडी एवं कपास आदि पौध अवस्था में हैं। अधिक फसल उत्पादन के लिए इन फसलों को जैविक और अजैविक तनावों, विशेष रूप से नमी की कमी से बचाना बेहद जरुरी होता है। मृदा में नमी की उपलब्धा सुनिश्चित करने के साथ-साथ सिंचाई जल की उपयोग दक्षता पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है।</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span style="font-family: Mangal, serif;">गर्मी के मौसम में सिंचाई जल की उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए उपयुक्त सिंचाई विधि और समय के चुनाव पर विशेष ध्यान रखना चाहिए। उपलब्ध भूमि एवं जलवायु तथा संसाधनों के अनुसार फसलों की प्रमाणित प्रजातियों का चयन, सही समय पर उपयुक्त विधि से बुआई, मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई, खरपतवार, कीट व रोग नियंत्रण के आवश्यक उपाय तथा विपणन बेहद जरूरी है। इसके साथ-साथ रबी फसलों की कटाई-मड़ाई, गहाई इस समय तक पूर्ण हो जाती है। इन फसलों का सुरक्षित भंडारण भी एक चुनौती होती है। अनाज के साथ-साथ भूसा भी एक बहुमूल्य उत्पाद है। अतः उसका भंडारण भी सावधानीपूर्वक करना चाहिए। रबी फसलों के उत्पादों को वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। इस समय खाली खेतों में ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई और मृदा सौरीकरण का भी एक विशेष महत्व होता है। मई में किए जाने वाले प्रमुख कृषि कार्यों का विवरण है-</span></p> <h3 style="text-align: justify;">गेहूं एवं जौ की फसल कटाई उपरांत प्रबंधन</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>अधिकांश किसान गेहूं की कटाई दरांती से करते हैं, जिसमें सतह से 3-6 से.मी. ऊपर से कटाई की जाती है। कटाई का समय और विधि, कुल फसल उत्पादन का प्रमुख कारक है। किसान कटे हुए गेहूं के पौधों को छोटे-छोटे बंडलों में बांधकर खेत में 2-3 दिनों तक सूखने के लिए छोड़ देते हैं। इसके विपरीत मशीन अथवा कम्बाईन द्वारा कटाई करने से नमी वाले दानों को सुखाने का समय नहीं मिलता है। कटाई का उचित समय एक महत्वपूर्ण कारक है। अतः उचित परिपक्वता अवधि का ध्यान रखना चाहिए। इससे दानों को झड़ने अथवा गिरने से बचाया जा सकता है। विभिन्न प्रजातियों को अलग-अलग हिस्सों में रखना चाहिए। इससे प्रजातियों की शु)ता बनी रहती है। फसल को सीधे धूप में सुखाने से भी बचना चाहिए। दानों को साफ बोरों में भरना चाहिए। इससे भंडारण और परिवहन की हानि को रोका जा सकता है। कटाई के उपरांत दानों को तुरंत सुखाना, एक समान शुष्कता, उचित मड़ाई, साफ-सफाई, साफ बोरों का उपयोग, वैज्ञानिक तरीके से नमी और कीट प्रबंधन, समुचित हवा का प्रबंधन और ढेरियों को समयब) चरणों में हिलाना चाहिए। इन सब तरीकों को अपनाकर प्रक्षेत्र और बाजार स्तर पर होने वाली हानि को कम किया जा सकता है।</li> <li>वैज्ञानिक तरीके से बीज भंडारण करने पर कीट और रोगों का प्रकोप कम होता है, जिससे बीज लंबे समय तक स्वस्थ और सुरक्षित रहता है। बीज को भंडारण से पहले ठीक प्रकार से सुखा लेना चाहिए। भंडारण में विभिन्न प्रकार के कीटों का प्रकोप होता है। नमी की अधिकता से कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है। भंडारण के लिए धान्य वाली फसलों में नमी की मात्रा 8-10 प्रतिशत और दलहनी एवं तिलहनी फसलों में 6-8 प्रतिशत तक नमी होने पर ही भंडारण करना चाहिए। ऐसा पाया गया है भडांरण के समय धान्य वाली फसलों के बीजों में 10-12 प्रतिशत से अधिक नमी होने पर कीट-मकोड़ों का प्रकोप, 14-15 प्रतिशत से अधिक होने पर फफूंदीजनित रोग और 15 प्रतिशत से अधिक नमी होने पर अच्छी तरह अंकुरण नहीं हो पाता है।</li> <li>सबसे पहले भंडारगृह वाली जगह पर अच्छी प्रकार से साफ-सफाई करनी चाहिए। पुराने अवशेषों, मकड़ी के जालों को निकालकर साफ कर देना चाहिए एवं दीवारों या फर्श पर पड़ी दरारों को सीमेंट से बंद कर देना चाहिए। कीटों से बचाव के लिए मैलाथियान 50 इर्.सी. मात्रा को 100 लीटर पानी में घोलकर भंडारणगृह में अच्छी तरह से छिड़काव करें। इस कमरे को कम से कम एक सप्ताह तक बंद रखने पर इसमें छिपे हुए कीट-मकोड़े आदि मर जाते हैं। यदि कीटों का छिड़काव से नियंत्रण न किया जा सके और दो कीट प्रति कि.ग्रा. बीज या अनाज में उपस्थित हों तो धुआं देने वाले विषैले रसायन से कीट मर जाते हैं। इनके धुएं में विषैली गैसें निकलती हैं। प्रायः एल्युमिनियम फॉस्फेट की 2 गोली/टन की दर से विभिन्न ऊंचाई पर रख दी जाती है। छल्ली को गैस अवरोधी चादर से ढ़क दिया जाता है। गोलियों से हवा की नमी शोषित होती है और फॉस्फीन गैस निकलती है, जो कीटों को मार देती है। मिथाइल ब्रोमाइड का प्रयोग करना हो तो ढेर में 3 से 5 मि.ली. मिथाइल ब्रोमाइड प्रति 100 कि.ग्रा. अनाज रखने के बाद बर्तन बंद कर दिया जाता है और बर्तन में गैस निकलने से कीट मर जाते हैं। यदि अनाज को नीम के बीज के पाउडर के साथ मिलाकर रखें तो कीटों का प्रकोप नहीं होगा।</li> <li>गोदाम में बीज भंडारण के लिए हमेशा एक लकड़ी का प्लेटफार्म बनायें जो कि करीब एक फुट फर्श से ऊंचा हो, साथ ही दीवारों से भी लगभग एक फुट की दूरी पर हो। बोरों को गोदाम की दीवारों से सटाकर कभी भी नहीं रखना चाहिए। भंडारण प्रायः जूट के बोरों में करना चाहिए, नए बोरों का प्रयोग करें तो ज्यादा अच्छा है। पुराने बोरे होने पर उनको अच्छी तरह सुखाना चाहिए और 3-4 दिनों तक तेज धूप में सूखने देना चाहिए। पुराने बोरों को उपयोग में लेने के लिए उन्हें या तो गरम पानी से धो लें या फिर 0.1 प्रतिशत मैलाथियान घोल में 15-20 मिनट तक डुबोकर रखिये। फिर उसे अच्छी तरह धूप में सुखाकर उपयोग करना चाहिए।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">ग्रीष्मकालीन मूंग, उड़द और लोबिया</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>इस समय मूंग, उड़द और लोबिया की फसल अपनी बढ़वार की अवस्था में होगी। अधिकतर जगह मार्च के आखिर या अप्रैल के प्रथम सप्ताह में बुआई हो चुकी होगी। अतः सिंचाई 10-15 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार व हल्की करें।</li> <li>बुआई के प्रारंभिक 4-5 सप्ताह तक खरपतवार की समस्या अधिक रहती है। पहली सिंचाई के बाद निराई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ भूमि में वायु का संचार भी होता है, जो मूल ग्रन्थियों में क्रियाशील जीवाणुओं द्वारा वायुमंडलीय नाइट्रोजन एकत्रित करने में सहायक होता है। अतः बुआई के 15-20 दिनों के अंदर कसोले से निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए।</li> </ul> <h4 style="text-align: justify;">पीत या पीला चितेरी रोग</h4> <p style="text-align: justify;">उड़द एवं मूंग में प्रायः पीली चितेरी रोग का प्रकोप होता है। सर्वप्रथम कोमल पत्तियों पर पीले तथा हरे धब्बों का दृष्टिगोचर होना इस रोग का प्रमुख लक्षण है। जैसे-जैसे रोग की अवस्था बढ़ती है, पीले क्षेत्र का आकार बढ़ता जाता है तथा अंत में सभी फलियां भी पीली हो जाती हैं। उनका आकार छोटा हो जाता है। इसके साथ ही दानों का आकर भी छोटा हो जाता है। खेत में यह रोग श्वेत मक्खी (बेमीसिया तबाकी) द्वारा संवाहित होता है। 1) पीली चितेरी रोग के नियंत्रण के लिए उड़द रोगरोधी प्रजातियां ही उगायें जैसे-के.यू. 300, यू.जी. 218, आईपी.यू.-94-1 (उत्तरा), पंत उड़द-19 एवं नरेन्द्र उड़द-1 तथा मूंग में सम्राट (पी.डी.एम. 139) मेहा, एच.यूएम-16, एम.एस 2-15, गंगा-8, पंत मूंग-4 एवं नरेन्द्र मूंग-1 इत्यादि उगानी चाहिए। 2) बुआई के समय कीटनाशी डाइसल्फोयान या फोरेट 1 कि.ग्रा. सक्रिय अवयव प्रति हैक्टर की दर से भूमि में प्रयोग करना चाहिए। इससे अन्य कीटों से भी फसल की सुरक्षा हो जाती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">चूर्णी कवक</h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग से ग्रसित पौधों की पत्तियों तथा दूसरे भागों पर सफेद चूर्णिल धब्बे पड़ जाते हैं, जो बाद में मटमैले रंग के हो जाते हैं। रोग के अधिक बढ़ने की अवस्था में पत्तियां अपरिपक्व अवस्था में सिकुड़कर गिर जाती हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए उड़द की एल.बी.जी. 402 एवं एल.बीजी. 17 तथा मूंग की रोगरोधी प्रजातियां पूसा 9072, टार्म-1, सी.ओ.जी.जी.-4 तथा पूसा 105 इत्यादि प्रजातियां उगाना लाभदायक रहता है। 2) घुलनशील गंधक (0.3 प्रतिशत) या कैराथेन (0.1 प्रितशत) या कार्बेन्डाजिम (0.05 प्रतिशत) का 7-10 दिनों अंतराल पर 2 से 3 छिड़काव करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">सरकोस्पोरा पर्ण बुदंगी रोग</h4> <p style="text-align: justify;">पत्तियों पर सिलेटी से भूरे कोणीय धब्बे पड़ जाते हैं। इन धब्बों के चारों तरफ लाल रंग की किनारी बन जाती है। ये इस रोग के विशिष्ट लक्षण हैं। गम्भीर अवस्था में फलियां बनते समय संक्रमित पत्तियां सड़ जाती हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए बुआई से पहले बीज का कैप्टॉन या थिरम कवकनाशी से 2-3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचार करना चाहिए। या कार्बेन्डाजिम (0.05 प्रतिशत) या मेन्कोजेब 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">रूक्ष रोग</h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग से ग्रसित पौधों की पत्तियों तथा फलियों पर भूरे गोल धंसे हुए धब्बे दिखाई देते हैं। इन धब्बों का केन्द्र गहरे रंग का और बाहरी सतह चमकीली लाल रंग की होती है। संक्रमण बढ़ने पर पौधे के रोगग्रसित भाग जल्दी सूख जाते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए 1)बुआई से पहले बीज को थिरम कवकनाशी या कैप्टॉन से 2-3 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से उपचार करना चाहिए। 2) इंडोफिल जेड-78 या थिरम कवकनाशी 2 ग्राम/ लीटर पानी की दर से घोल बनाकर रोग के लक्षण दिखाई देने पर छिड़काव करें तथा आवश्यकतानुसार 1 से 2 छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">झुर्रीदार पत्ती रोग</h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग के विशिष्ट लक्षण पत्तियों की सामान्य से अधिक वृद्धि तथा बाद म में इनमें सिलवटें या मरोड़ होता है। ये पत्तियां छूने पर सामान्य पत्ती से अधिक मोटी तथा खुरदरी प्रतीत होती हैं। इसके नियंत्रण के लिए 1) रोगरोधी प्रजातियां ही उगाएं। 2) रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए। 3) इसकी रोकथाम के लिए डाईमिथोएट 30 ई.सी. का छिड़काव करने से लाभ होता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">प्रमुख कीट एवं उनकी रोकथाम</h4> <ul style="text-align: justify;"> <li>उड़द-मूंग पर पाये जाने वाले हानिकारक कीटों की समस्या विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न होती है। फसल की अवस्था, तापमान, नमी, सूर्य के प्रकाश तथा वर्षा पर निर्भर करती है। इन कीटों को हानि के प्रकार के आधार पर या फसल में लगने वाले कीटों में तना मक्खी, सफेद मक्खी, हरा फुदका (लीफ हॉपर या जैसिड), माहूं, पत्ती छेदक भृंग (गेलूरूसिड बीटिल) पर्ण जीवक (थ्रिप्स), चना फलीभेदक एवं मटर फलीभेदक आदि प्रमुख हैं।</li> <li>तना मक्खी के नियंत्रण हेतु इंडसिस्टोन या फोरेट से बीजोपचार करके 2-4 सप्ताह तक फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। बुआई के समय एल्डीकार्ब 10 जी एवं फोरेट 10 जी 1.6 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व/हैक्टर का प्रयोग करना अधिक लाभदायक होता है। मोनोक्रोटोफॉस 40 ई.सी. 624 मि.ली./ हैक्टर या ऑक्सीडिमेटान मिथाइल 25 ई.सी. 750 मि.ली./हैक्टर की दर से छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए।</li> <li>सफेद मक्खी के प्रभावी नियंत्रण के लिए ऑक्सीडिमेटान मिथाइल 0.1 प्रतिशत या डाइमेथोएट 0.3 प्रतिशत/हैक्टर 650-700 लीटर पानी में मिलाकर 3-4 छिड़काव करना चाहिए। इमिडाक्लोरोपिड 0.5 मि.ली./लीटर पानी (500 लीटर/हैक्टर) की दर से छिड़काव बुआई के 10-15 दिनों बाद अवश्य करें।</li> <li>जैसिड के नियंत्रण के लिए मानोक्रोटोफॉस फिनिट्रोथियान,क्लोरफेनविनफास, मैलाथियान, डाइमेथोएट का क्रमशः 0.075 प्रतिशत, 0.05 प्रतिशत व 0.03 प्रतिशत या इमिडाक्लोरोपिड 0.5 मि.ली./लीटर पानी (500 लीटर/ हैक्टर) की दर से छिड़काव बुआई के 10-15 दिनों बाद लाभदायक पाया गया है। साथ ही बुआई के समय में भी परिवर्तन करके नियंत्रण किया जा सकता है।</li> <li>माहूं के नियंत्रण हेतु फेनवलेरेट, साइमेरेंथ्रिन एवं डेकामिथ्रिन आदि काफी प्रभावी पाया गया है। बुआई के समय डाइसल्फोटोन ग्रेन्यूल 1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व/हैक्टर के प्रयोग करने से लगभग पांच सप्ताह तक माहूं का नियंत्रण आसानी से हो जाता है।</li> <li>पत्ती छेदक भृंग के प्रभावी नियंत्रण के लिए डाइसल्फोटोन 5 जी 1.5 कि.ग्रा./ हैक्टर की दर से बुआई के समय प्रयोग करने से लाभ होता है।</li> <li>पर्ण जीवक की रोकथाम करने के लिए कीटनाशी जैसे कार्बोफ्यूरॉन 3 जी या फोरेट 10 जी 1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व/ हैक्टर की दर से मिट्‌टी में बुआई के समय डालना अधिक उपयोगी हुआ है। इसी तरह साइपरमेथ्रिन 0.1 प्रतिशत या फ्लूवैलिनेट 0.075 प्रतिशत या फेनवलरेट 0.1 प्रतिशत से भी खरीफ की फसल में पर्ण जीवक से छुटकारा पाया जा सकता है। 0.03 प्रतिशत डाइमेथोयट अथवा 0.03 प्रतिशत मिथाइल ओडिमेटान का प्रयोग भी अधिक प्रभावी पाया गया है। इसके साथ ही किसान गर्मी में खेत की गहरी जुताई अवश्य करें।</li> <li>चना फलीभेदक के नियंत्रण के लिए सबसे पहले यौन आकर्षण जाल (फेरोमैन ट्रैप) के द्वारा नियमित निगरानी करते रहें। जैसे ही 5-6 नर कीट/ट्रैप 24 घंटे के अंदर मिलना शुरू हो जाये, नियंत्रण तकनीक अपनायें। एन.पी.वी. 250 लार्वा तुल्य का छिड़काव करें एवं परभक्षियों के लिए खेत में टी आकार की लकड़ी लगा दें। उसके साथ ही नीम की निबौली के सत का 5 प्रतिशत घोल का छिड़काव लाभदायक सिद्ध हुआ है। मटर फलीछेदक के लिए मिथाइल डिमटोन 0.05 प्रतिशत का प्रयोग काफी प्रभावी पाया गया है।</li> </ul> <h4 style="text-align: justify;">कटाई एवं मड़ाई</h4> <p style="text-align: justify;">जब 80 प्रतिशत से अधिक फलियां पक जाएं तो हंसियां की सहायता से कटाई कर लेनी चाहिए। ज्यादा विलंब या देर से कटाई करने पर फलियों से दाने चिटकने का अंदेशा रहता है। उड़द एवं मूंग की नई प्रजातियां ज्यादातर एक साथ पक जाती हैं, जिससे सम्पूर्ण फसल की कटाई एक साथ की जा सकती है। कटाई उपरान्त फसल को 3-6 दिनों तक अच्छी तरह सुखाकर मड़ाई करनी चाहिए। बीजों को तब तक धूप में सुखाना चाहिए, जब तक उसमें नमी 10-12 प्रतिशत के बीच न हो।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूंगफली की फसल में सस्य प्रबंधन</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>सिंचित क्षेत्रों में जायद मूंगफली की बुआई मई के पहले सप्ताह तक कर सकते हैं। इसके लिए मूंगफली-गेहूं फसलचक्र अपनाया जा सकता है, परंतु एक ही भूमि पर हर वर्ष मूंगफली न उगायें। इससे भूमि से कई रोग पैदा हो जाते हैं। जायद मूंगफली की उन्नत किस्में एम 522, एम 335, एचबी 84 सिंचित क्षेत्रों में तथा एम 37 बारानी क्षेत्रों में जहां वर्षा अच्छी हो वहां लगाई जा सकती है।</li> <li>उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना लाभदायक रहता है। अधिक उत्पादन लेने के लिए सिंचित क्षेत्रों में उर्वरकों का प्रयोग 25-30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50-60 कि.ग्रा फॉस्फोरस एवं 40 कि.ग्रा.पोटाश जबकि बारानी क्षेत्रों में 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 20-30 कि.ग्रा. पोटाश/हैक्टर संस्तुत की गयी है। अधिक उपज लेने के लिए बुआई के समय 250 कि.ग्रा./ हैक्टर की दर से जिप्सम का प्रयोग करना चाहिए। यदि किसी कारण से बुआई के समय जिप्सम को मृदा में नहीं डाला गया है, तो जब फसल 40-45 दिनों की हो जाये तब पौधों की जड़ों में डालना चाहिए। मृदा में बुआई से पहले 25 कि.ग्रा. जिंक सल्पेफट/ हैक्टर या जैविक खाद के रूप में पय्रोग किया जा सकता है। यदि खड़ी फसल में जिंक की कमी के लक्षण दिखाई दें तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट व 0.25 प्रतिशत बुझे हुए चूने (200 लीटर पानी में 1 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट तथा 0.5 कि.ग्रा. बुझे हुए चूने) का घोल बनाकर पर्णीय छिड़काव का प्रयोग करना चाहिए। लोहे की कमी वाले क्षेत्रों में फसल में जैसे ही इसकी कमी के लक्षण दिखाई दें तो 1 प्रतिशत फेरस सल्फेट (1 लीटर पानी में 10 ग्राम फेरस सल्फेट) का पर्णीय छिड़काव करें। बोरॉन की कमी वाली भूमि में बोरेक्स 10 कि.ग्रा./हैक्टर या जिप्सम के साथ खड़ी फसल में 40-45 दिनों की अवस्था में दें।</li> <li>मूंगफली की फसल में खरपतवारों के द्वारा लगभग 40-45 प्रतिशत तक की उपज में कमी आ जाती है। मूंगफली की फसल शुरूआती 30-35 दिनों की अवस्था में खरपतवारों के प्रति संवेदनशील होती है। खरपतवार निकालने के लिए 3 सप्ताह बाद निराई-गुड़ाई करना लाभदायक रहता है। इसमें पहली निराई-गुड़ाई, बुआई के 20-25 दिनों बाद एवं दूसरी निराई-गुड़ाई बुआई के 35-40 दिनों बाद करनी चाहिए। मूंगफली की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए बासालिन (फ्रलूक्लोरालिन) या ट्रेफ्लॉन की 0.75-1.0 कि.ग्रा./हैक्टर सक्रिय तत्व की मात्रा बुआई से पहले मिट्‌टी में मिला दें। बुआई से पहले खरपतवारनाशी का प्रयोग नहीं किया गया हो तो बुआई से 1-3 दिनों के अंदर लासो की 1.5-2.0 कि.ग्रा./ हैक्टर या पेन्डीमिथेलिन की 1.0-1.25 कि.ग्रा./हैक्टर सक्रिय तत्व की मात्रा को छिड़काव द्वारा अच्छी तरह मिट्‌टी में मिलाएं। खड़ी फसल में चौड़ी पत्ती एवं घास वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए इमेजेथाफायर (10 प्रतिशत एस एल) की 75-100 ग्राम/हैक्टर सक्रिमय तत्व की मात्रा बुआई के 20-25 दिनों पर छिड़काव अवश्य करें।</li> <li>बुआई के बाद 15-20 दिनों के अतंराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। सिंचाई करते समय इस बात का ध्यान रहे कि खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए। जिन खेतों में पानी भराव की समस्या हो, वहां पर जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।</li> <li>चेंपा, जो कि पौधों से रस चूसते हैं, का प्रकोप हो तो उसके नियंत्रण के लिए 200 मि.ली. मैलाथियान 50 ई.सी. को 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें। रोगों की रोकथाम के लिए फफूंदीनाशक जैसे बाविस्टिन या थीरम नामक दवा से बीजोपचार ही सबसे सर्वोत्तम तरीका है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), पूसा रोड, नई दिल्ली ।</p>