<h3 style="text-align: justify;">फूलगोभी की नर्सरी</h3> <h4 style="text-align: justify;">आर्द्रगलन फफूंद रोग</h4> <p style="text-align: justify;">फूलगोभी की नर्सरी अवस्था में आर्द्रगलन फफूंद नामक रोग से पौधों का तना सतह के पास से गलने लगता है और पौध मर जाती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="163" height="189" /></p> <p style="text-align: justify;"><strong>नियंत्रण</strong></p> <p style="text-align: justify;">इसके नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम/मि.ली. में मिलाकर बीज को उपचारित करें। ट्राइकोडर्मा 25 ग्राम/10 कि.ग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद को नर्सरी (100 वर्ग मीटर) में अच्छी प्रकार मिलायें। बाविस्टीन या कैप्टॉन 2 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से बीज का उपचार करें। बाविस्टन या कैप्टॉन 2 ग्राम/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">उन्नत प्रजातियां</h4> <p style="text-align: justify;">फूलगोभी की अगेती उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा दीपाली, पूसा कार्तिक संकर, पूसा अली र्सिन्थेटिक, पूसा मेघना, पूसा कार्तिकी, पूसा अश्वनी, पूसा हिमानी, अर्का कांति एवं काशी कुंवारी आदि प्रमुख हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">बीज की मात्रा एवं बीजाेपचार</h4> <p style="text-align: justify;">अच्छी जमाव क्षमता वाला 500-600 ग्राम तथा संकर किस्मों के लिए 350-400 ग्राम बीज/हैक्टर की दर से पर्याप्त होता है। फूलगोभी की अगेती बुआई का समय मध्य मई से जून के बीच तथा 5-6 सप्ताह वाली पौध की रोपाई की जाती है। बीज उपचार के लिए बाविस्टीन या कैप्टॉन 2 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से या ट्राइकोडर्मा 5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">नर्सरी क्यारी</h4> <p style="text-align: justify;">नर्सरी क्यारी छायादार एवं पर्याप्त नमी वाले स्थान पर बनानी चाहिए। क्यारी का आकार 3.0×0.45×0.15 मीटर, 20 नर्सरी क्यारी प्रति हैक्टर क्षेत्र के लिए पर्याप्त होता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">खेत की तैयारी</h4> <p style="text-align: justify;">खेत की अंतिम तैयारी के समय 25-30 टन/हैक्टर की दर से अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मृदा में मिला दें। रोपाई से पहले 120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 100 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 60 कि.ग्रा. पोटाश व 10 कि.ग्रा. बोरेक्स/हैक्टर तथा खेत की अंतिम तैयारी के समय आधी मात्रा में नाइट्रोजन तथा सम्पूर्ण मात्रा में फॉस्फोरस व पोटाश मृदा में मिला दें। शेष नाइट्रोजन को बराबर दो हिस्सों में बांटकर एक हिस्सा रोपाई के एक महीने पश्चात निराई-गुड़ाई के साथ डालें। दूसरा हिस्सा फूल बनने की स्थिति में पौधों को मिट्‌टी चढ़ाते समय मिलाएं।</p> <h4 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण के लिए रोपाई से पहले बेसालीन 2.5 लीटर या स्टॉम्प 3.3 लीटर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव कर हल्की सिंचाई करें। अगेती फसल में रोपाई के तुरन्त बाद तथा उसके पश्चात साप्ताहिक अंतराल पर व मध्यम व पछेती फसल में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। अगेती फसल के लिए पंक्ति से पंक्ति एवं पौधों से पौधों की दूरी 45×30 सें.मी. रखें। </p> <p style="text-align: justify;">फूलगोभी, गांठगोभी, पत्तागोभी, गाजर, मूली, पालक, मेथी एवं शलजम की बीज वाली फसलों की कटाई करें और बीजों को इतना सुखाएं कि उनमें 8 फीसदी ही नमी रहे। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर ’सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-११००१२।</p> <p style="text-align: justify;"> </p>