<h3 style="text-align: justify;"> दलहनी फसलों का महत्व </h3> <p style="text-align: justify;">भारतीय कृषि में दलहनी फसलों का महत्व सदैव रहा है। ये फसलें अपनी जड़ ग्रन्थियों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु द्वारा वातावरण के नाइट्रोजन का दोहन कर मृदा में स्थिर करती हैं। आश्रित पौधे के उपयोग के बाद, जो नाइट्रोजन मृदा में शेष रह जाती है, वह आगामी फसल द्वारा उपयोग में लायी जाती है। दलहनी फसलें अपने विशेष गुणों जैसे भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने और प्रोटीन की प्रचुर मात्रा के कारण पोषकीय चारा उपलब्ध करवाने तथा मृदाक्षरण के अवरोधक के रूप में विशेष स्थान रखती हैं। दलहनी एवं गैर दलहनी फसलों को उनके वानस्पतिक वृद्धिकाल में उपयुक्त समय पर मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए जुताई करके मृदा में अपघटन के लिए दबाना ही हरी खाद कहलाता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">हरी खाद के लिए दलहनी फसलें</h3> <p style="text-align: justify;">हरी खाद के लिए दलहनी फसलों में ढैंचा, सनई, उड़द, मूंग, अरहर, चना, मसूर, मटर, लोबिया, मोठ, खेसारी तथा कुल्थी मुख्य हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जायद में हरी खाद के रूप में अधिकतर ढैंचा, उड़द एवं मूंग का प्रयोग ही प्रायः प्रचलित है। हरी खाद के लिए उगाई जाने वाली फसल का चुनाव भूमि, जलवायु तथा उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। हरी खाद के लिए फसलों में निम्न गुणों का होना आवश्यक है</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="193" height="137" /></p> <h3 style="text-align: justify;">हरी खाद की फसल की विशेषताएँ</h3> <p style="text-align: justify;">दलहनी फसलों की जड़ों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु ग्रंथियां वातावरण में मुक्त नाइट्रोजन को यौगिकीकरण द्वारा पौधों को उपलब्ध करवा सकें। </p> <p style="text-align: justify;">हरी खाद के लिए ऐसी फसल होनी चाहिए, जिसमें तना, शाखाएं और पत्तियां कोमल एवं अधिक हों, ताकि मृदा में शीघ्र अपघटन होकर अधिक से अधिक जीवांश तथा नाइट्रोजन मिल सके और फसल शीघ्र वृद्धि करने वाली हो। फसल सूखा अवरोधी के साथ जल मग्नता को भी सहन करती हों।</p> <p style="text-align: justify;">हरी खाद के साथ-साथ फसलों को अन्य उपयोग में भी लाया जा सके। हरी खाद के लिए ढैंचा या सनई की बुआई मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए बहतु ही आवश्यक है। इन फसलों से 50-60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्राप्त होती है। ढैंचा या सनई की बुआई करने के लिए 60 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बीज की आवश्यकता है। फसलें मूसला जड़ों वाली हों, ताकि गहराई से पोषक तत्वों का अवशोषण हो सके। क्षारीय एवं लवणीय मृदाओं में गहरी जड़ों वाली फसल अंतःजल निकास बढ़ाने में आवश्यक होती है। रोग एवं कीट कम लगते हों तथा बीज उत्पादन की क्षमता अधिक हो।</p> <p style="text-align: justify;">विभिन्न हरी खाद वाली फसलों की उत्पादन क्षमता सारणी में दी गयी है।</p> <h3 style="text-align: justify;">बुआई </h3> <p style="text-align: justify;">बुआई से पूर्व बीज को 12 घंटे पानी में भिगोने के बाद बीज अंकुरण जल्दी होता है। हरी खाद फसलें बुआई के 35-40 दिनों में पलटने योग्य हो जाती हैं। अतः खरीफ में धान की रोपाई के समय को ध्यान में रखते हुए ढैंचा, सनई और लोबिया की बुआई करें।</p> <p style="text-align: justify;">हरी खाद की विभिन्न फसलों की उत्पादन क्षमता जलवायु, फसल वृद्धि तथा कृषि क्रियाओं पर निर्भर करती है। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर ’सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-११००१२।</p>