<h3 style="text-align: justify;">अरहर</h3> <h4 style="text-align: justify;">पर्याप्त नमी</h4> <p style="text-align: justify;">कलियां बनते समय वर्षा न होने की स्थिति में खेत में पर्याप्त नमी रखने के लिए सिंचाई करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">फलीबेधक मक्खी</h4> <p style="text-align: justify;">उत्तर भारत में यह कीट अरहर की फसल को काफी हानि पहुंचाता है। इस कीट द्वारा 20-25 प्रतिशत तक अरहर की फसल को प्रतिवर्ष नुकसान होता है। इसका नियंत्रण करने हेतु मोनोक्रोटोफॉस (0.04 प्रतिशत घोल) नामक दवा का छिड़काव करना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">फली बग</h4> <p style="text-align: justify;">इस कीट के प्रौढ़ एवं निम्फ पत्तियों, कलियों, फूलों तथा फलियों के रस को चूसते हैं। इससे फलियां सिकुड़ जाती हैं और सही तरीके से नहीं बन पाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफॉस (0.04 प्रतिशत घोल) या डाइमिथोएट (0.03 प्रतिशत घोल) का छिड़काव करना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">चना फलीभेदक</h4> <p style="text-align: justify;">चना फलीभेदक के नियंत्रण के लिए सबसे पहले यौन आकर्षण जाल (फेरोमैन ट्रैप) द्वारा नियमित निगरानी करते रहें। जैसे ही 5-6 नर कीट ट्रैप 24 घंटे के अन्दर मिलना शुरू हो जाएं. नियंत्रण तकनीक अपनाएं। एन.पी.वी. 250 लार्वा तुल्य का छिड़काव करें एवं परभक्षियों के लिए खेत में 'टी' आकार की लकड़ी लगा दें। इसके साथ ही नीम की निबौली के सत् का 5 प्रतिशत घोल का छिड़काव लाभदायक सिद्ध हुआ है। रासायनिक नियंत्रण के लिए इंडोक्साकार्ब 1 मि.ली./लीटर या मोनोक्रोटोफॉस (0.04 प्रतिशत) प्रति लीटर पानी का प्रथम छिड़काव या मिथाइल डिमेटान 0.05 प्रतिशत का प्रयोग या क्यूनॉलफॉस (25 ई.सी.) की 1.25 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में घोलकर एक हैक्टर में छिड़काव करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूंग </h3> <h4 style="text-align: justify;">पीला मोजैक</h4> <p style="text-align: justify;">यह रोग मूंग की रोग ग्राही प्रजातियों में अधिक व्यापक होता है। जिन पत्तियों में पीली कुर्बरता या पीली ऊतकक्षय कुर्बरता के मिले-जुले लक्षण दिखाई देते हैं, उनके आकार छोटे रह जाते हैं। ऐसे पौधों में बहुत कम व छोटी फलियां होती हैं। ऐसी फलियों का बीज सिकुड़ा हुआ और मोटा व छोटा होता है। यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है। इसके नियंत्रण के लिए खेत में ज्यों ही रोगी पौधे दिखाई दें, डायमेथाक्साम या इमिडाक्लारोप्रिड 0.02 प्रतिशत मेटासिस्टॉक्स 0.1 प्रतिशत का छिड़काव कर दें। छिड़काव को 15-20 दिनों के अन्तराल पर दोहरायें और कुल 3-4 छिड़काव करें। प्रति हैक्टर 800 लीटर में बना घोल पर्याप्त होता है। वर्षा ऋतु में जब पौधों की अधिकतर फलियां पककर काली हो जाती हैं, तो फसल काटी जा सकती है। जब 50 प्रतिशत फलियां पक जाएं, फलियों की पहली तुड़ाई कर लेनी चाहिए। इसके बाद दूसरी बार फलियों के पकने पर कटाई की जा सकती है। फलियों को खेत में सूखी अवस्था में अधिक समय तक छोड़ने से वे चटक जाती हैं और दाने बिखर जाते हैं। इससे उपज की हानि होती है। फलियों से बीज को समय पर निकाल दें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPic2.jpg" width="183" height="160" /></p> <h3 style="text-align: justify;"> लोबिया</h3> <p style="text-align: justify;"> लोबिया की फसल पकने की अवस्था में रहती है तथा पत्ते पीले पड़ते ही काट लें ताकि फलिया झड़ें नहीं।</p> <h3 style="text-align: justify;">राजमा</h3> <p style="text-align: justify;">राजमा: मैदानों के उत्तरी क्षेत्रों में राजमा उगाने में किसानों ने रुचि दिखाई है। इस फसल की सिंचित क्षेत्रों में 10 सितंबर तक बुआई कर दें, नहीं तो पकने के समय ठंड पड़ने से दाने कम बनते हैं। राजमा की उन्नत प्रजातियां जैसे-उवाला, वी.एल.-63 तथा हिम-1 के 45-50 कि.ग्रा. बीज प्रति एकड़ राइजोबियम जैव-उर्वरक से उपचारित करें तथा 1 फीट की दूरी पर पक्तियों में बुआई कर दें। बुआई के समय 25 कि.ग्रा. यूरिया तथा 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट खेत में बीज के नीचे पोरा या केरा विधि से डालें। पहली सिंचाई बुआई के 17 दिनों तथा दूसरी 30 दिनों बाद करें। बुआई के 20 दिनों बाद एक निराई-गुड़ाई भी करें। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस राठौर, अमन सिंह और ऋषि राज, सस्य विज्ञान विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली।</p>