<p style="text-align: justify;">यदि खेत मक्का, बाजरा, मूंग, उड़द, तिल, लोबिया आदि फसलों के कटने से खाली हो तो तोरिया की फसल सितंबर के पहले सप्ताह में लगा दें। यह गेहूं बोने से पहले नवम्बर में पक जाती है। इससे बरसात की नमी का पूरा उपयोग होगा तथा 6-7 क्विंटल पैदावार भी मिलेगी। तोरिया/लाही की फसल के लिए 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। अधिक या कम तापमान होने पर फसल में विकृति आने लगती है। तोरिया की खेती से अच्छी उपज के लिए रेतीली दोमट एवं हल्की दोमट मृदा अधिक उपयुक्त है। भूमि क्षारीय एवं लवणीय नहीं होनी चाहिए। तोरिया की खेती अधिकांशतः बारानी स्थिति में की जाती है। इसके लिए खेत को खरीफ में परती छोड़ना चाहिए। खेत में जल निकासी का उचित प्रबंध होना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">खेत की तैयारी</h3> <p style="text-align: justify;">पहली जुताई वर्षा ऋतु में मृदा पलटने वाले हल से करें। इसके बाद 3 से 4 जुताइयां करें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं, जिससे भूमि में नमी की कमी न हो और मृदा भुरभुरी हो जाए। सिंचित खेती के लिए भूमि की तैयारी बुआई के 3 से 4 सप्ताह पूर्व प्रारम्भ करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">बुआई का समय</h3> <p style="text-align: justify;">सरसों की बुआई के लिए सितंबर का प्रथम एवं द्वितीय पखवाड़ा उपयुक्त है।</p> <h3 style="text-align: justify;">उन्नत किस्में</h3> <p style="text-align: justify;">तोरिया की बुआई के लिए सितंबर का दूसरा पखवाड़ा सबसे उत्तम है। इसके लिए उन्नत प्रजातियां जैसे-टाइप-9, भवानी, टाइप-1, पी.टी.-303, पी.टी-507, संगम टी एल 15, जवाहर तोरिया-1, पन्त तोरिया-303, राज विजय तोरिया-3, बस्तर तोरिया-1 एवं तपेश्वरी अच्छी हैं। इसके लिए उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा सरसों 25, पूसा सरसों 27, पूसा सरसों-28, पूसा तारक, पूसा महक व पूसा अग्रणी अच्छी हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="174" height="152" /></p> <h3 style="text-align: justify;">बीज शाेधन</h3> <p style="text-align: justify;">तोरिया की बुआई बीज शोधन के उपरान्त 4-5 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर की दर से 30x10-15 सें.मी. की दूरी पर 3-4 सें.मी. गहरे कूड़ों में करें। घने पौधों को बुआई के 15 दिनों के अंदर पौधों की आपस की दूरी 10 से 15 सें.मी. कर देनी चाहिए तोरिया की फसल में खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरक की मात्रा</h3> <p style="text-align: justify;">मृदा परीक्षण न होने पर सिंचित दशा में बुआई के समय 60-80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 50 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। तोरिया की फसल में 30 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से सल्फर का प्रयोग आवश्यक है। असिंचित दशा में 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन,30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 30 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। फॉस्फेट तत्व के लिए सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग करें। यदि सिंगल सुपर फॉस्फेट उपलब्ध न हो, तो प्रति हैक्टर 30 कि.ग्रा. गन्धक का प्रयोग करना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">खरपतवार</h3> <p style="text-align: justify;">फसल को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए 20-25 दिनों में एक बार निराई-गुड़ाई करना आवश्यक है। यह देखा गया है कि इस निराई के बाद सरसों की फसल अच्छी तरह और जल्दी से बढ़ती है। खरपतवारों के नियंत्रण के लिए बुआई से पूर्व फलूक्लोरेलिन 2.0 लीटर प्रति हैक्टर की दर से 500 से 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। खरपतवार ज्यादा हो, तो पेंडीमेथिलीन 30 ईसी का 3.3 लीटर की दर से 800 लीटर पानी में घोलकर बुआई के बाद और जमाव से पहले छिड़काव करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस राठौर, अमन सिंह और ऋषि राज, सस्य विज्ञान विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली।</p>