सितंबर को भादो भी कहते हैं। इस महीने फसलें खेतों में खड़ी होती हैं तथा विकसित होना प्रारम्भ हो जाती हैं। खरीफ फसलें खरीफ फसलों में दलहनी 'फसलें (अरहर, मूंग, उड़द, लोबिया), तिलहनी फसलें (मूंगफली, सोयाबीन, तिल, अरंडी) , धान्य फसलें (धान, मक्का, ज्वार, बाजरा), नगदी (कपास एवं गन्ना) एवं चारे वाली फसलें (ज्वार, बाजरा, बहुवर्षीय गिनी, नेपियर, सिंटेरिया) आदि पकने की अवस्था में होती हैं। तोरिया फसल यह तोरिया फसल की बुआई का समय होता है। इसके साथ ही फसलों में कीटों तथा रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। यह समय सब्जियां, बागवानी एवं पुष्प उत्पादन के लिए काफी महत्वपूर्ण है। सब्जी फसलें कुछ खेतों में फूलगोभी, पत्तागोभी, बैंगन, टमाटर, मिर्च, मूली गाजर हैं तथा कुछ में इन्हें लगाने की तैयारी है। इस माह कुछ अन्य सब्जियां भी लगा सकते हैं तथा भिंडी आदि तैयार फसलों की तुड़ाई करते हैं। आम के लगाये गये नये पौधों की सुरक्षा एवं अमरूद के बगीचों की सिंचाई करते हैं। फसलों, सब्जियों, फल, बागवानी एवं पुष्प के उत्पादन में उपयुक्त सस्य विधियां अपनाकर उत्पादन-लागत में कमी एवं प्रति इकाई उपज में वृद्धि की जा सकती है। समुचित प्रबंधन शोध परिणामों से ज्ञात हुआ है कि अधिक उपज देने वाली प्रजातियों की उत्तम गुणवत्ता का स्वस्थ बीज, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, समुचित जल, खरपतवार एवं कीट व रोग प्रबंधन, उपयुक्त मय पर फसल की कटाई एवं मड़ाई तथा उपयुक्त भंडारण इत्यादि अपनाकर किसान भाई लागत कम करके उत्पादन में बढ़ोतरी कर सकते हैं। स्त्राेत: भा.कृ.अनु.प.(आइसीएआर) नई दिल्ली।