टमाटर टमाटर की अच्छी पैदावार के लिए तापमान का बहुत बड़ा योगदान होता है। तापमान 180 से 270 सेल्सियस के बीच उपयुक्त रहता है। टमाटर की खतेी के लिए दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। इसके लिए जल निकास की व्यवस्था होना जरूरी होता है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए भूमि का पी-एच मान 6-7 के मध्य होना चाहिए। टमाटर की संकर प्रजातियों व गांठगोभी के बीज की बुआई नर्सरी में करें। अगेती किस्मों जैसे गोल्डन एकड़, पूसा हाइब्रिड-2 की बुआई 15 सितंबर तक व पछेती किस्मों/ संकर किस्मों की बुआई 15 सितंबर के बाद प्रारंभ करें। टमाटर की बौनी किस्मों की रोपाई 60×60 सें.मी. तथा अधिक बढ़ने वाली किस्मों की रोपाई 75×60 सें.मी. पर करें। टमाटर की रोपाई के समय प्रति हैक्टर 250 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद अथवा 80 क्विंटल नाडेप कम्पोस्ट के साथ 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 80 कि.ग्रा. पोटाश, 20 कि.ग्रा. जिंक सल्पेफट व 8 कि.ग्रा. बोरेक्स का प्रयोग करें। खरपतवार टमाटर की फसल से पोषक तत्वों, प्रकाश एवं पानी के लिए प्रतियोगिता करते हैं। रोग व कीट को शरण देते हैं, जिससे फलों की उत्पादन को 20-80 प्रतिशत तक कम कर देते हैं। खरपतवार फसलों में शुरुआती 4-6 सप्ताह तक अधिक नुकसान करते हैं। सिंचाई के बाद हल्की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्राण के लिए पेन्डीमिथेलीन (30 ई.सी.) 400 मि.ली. की मात्राा/एकड़ को 200 लीटर पानी में रोपाई से पहले छिड़काव करें। बैंगन एवं फूलगाेभी बैंगन में रोपाई के 45 दिनों बाद 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, मिर्च में 35 कि.ग्रा. नाइट्रोजन तथा फूलगोभी में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की दूसरी व अन्तिम टॉप ड्रेसिंग करें। तनाछेदक कीट सूंड़ी पौधों के प्ररोह को नुकसान करती है तथा बाद में मुख्य तने में घुस जाती है। छोटे ग्रसित पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं। बड़े पौधे मरते नहीं, ये बोने रह जाते हैं तथा इनमें फल कम लगते हैं। फलछेदक कीट इस कीट की सूंडी पौधे के प्ररोह व फल को हानि पहुंचाती है। ग्रसित प्ररोह मुरझाकर सूख जाते हैं। फलों में सूंडियां टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बनाती हैं। फल का ग्रसित भाग काला पड़ जाता है तथा खाने लायक नहीं रहता। फलछेदक की निगरानी के लिए 5 फेरोमोन ट्रैप प्रति हैक्टर लगाएं। बैंगन में तना व फलछेदक कीट की रोकथाम के लिए 5 प्रतिशत नीम बीज अर्क या बी.टी. 1 ग्राम/लीटर या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.ली./4 लीटर या कार्बेरिल, 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या डेल्टामेथ्रिन 1 मि.ली./लीटर का फूल आने से पहले छिड़काव 10-15 दिनों के अन्तराल पर करें। मिर्च की फसल मिर्च की फसल में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई एवं सिंचाई करें। शिमला मिर्च शिमला मिर्च की पौधों की रोपाई 50×40 सें.मी. की दूरी पर करें। रोपाई से पहले 150 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद, 75 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 60 कि.ग्रा. पोटाश अन्तिम जुताई के समय खेत में मिलायें। भिंडी एवं लोबिया भिंडी एवं लोबिया की फसल में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई एवं सिंचाई करें। तैयार फलियों की तुड़ाई नियमित रूप से 4-5 दिनों के अंतराल में करें। गाेभी पुरानी फूलगोभी की फसल में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई एवं सिंचाई करें। 50 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हैक्टर की दर से खड़ी फसल में प्रयोग करें। मध्यकालीन फूलगोभी की उन्नतशील प्रजातियां जैसे इम्प्रूव्ड जापानीज, पूसा दीवाली, पूसा कातकी, पंत सुभरा की रोपाई का उचित समय है। खेत की आखिरी जुताई पर 120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 100 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 60 कि.ग्रा. पोटाश एवं 10 कि.ग्रा. बोरेक्स प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। बदंगोभी, गाठंगोभी एवं पछेती फूलगोभी की नर्सरी में बुआई करें। इससे अक्टूबर में इनकी रोपाई की जा सकती है। पत्तागोभी की रोपाई सितंबर के अन्तिम सप्ताह से प्रारंभ कर सकते हैं। रोपाई से पूर्व 200-250 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद या 80 क्विंटल नाडेप कम्पोस्ट, 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा., फॉस्फोरस व 60 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से खेत में अन्तिम जुताई के समय मिला दें। कद्दूवर्गीय सब्जियां जब फल कच्चे व मुलायम हों तब बेल वाली फसलों जैसे-खीरा, घिया, तोरई, करेला व कद्दू में तुडा़ई कर बाजार भेजें। कद्दूवर्गीय फसल में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई एवं सिंचाई करें। अदरक एवं हल्दी अदरक एवं हल्दी की फसल में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई एवं सिंचाई करें। 50 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हैक्टर की दर से खड़ी फसल में प्रयोग करें। झुलसा रोग झुलसा रोग दिखाई देने पर 0.2 प्रतिशत इंडोपिफल-45 दवा का घोल बनाकर एक छिड़काव अवश्य करें। अगेती आलू की बुआई के लिए कुफरी सूर्या, कुफरी अशोका, कुफरी चन्द्रमुखी किस्मों की व्यवस्था करें। खेत की आखिरी जुताई 100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 80 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 80 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय प्रयोग करें। खरीफ प्याज खरीफ प्याज की रोपाई के 30 दिनों बाद खरपतवार निकालकर 35 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग प्रति हैक्टर की दर से करें। पालक एवं मेथी पत्तों वाली सब्जियों में कैल्शियम, लोहा, विटामिन ए, बी, व सी काफी मात्रा में होते हैं। माैसम पालक व मेथी हल्की मृदा में तथा ठंडे व शुष्क मौसम में अच्छी होती है। दोनों सब्जियों की सितंबर के शुरू में बुआई कर दें। पालक एवं मेथी की किस्में पालक की उन्नत किस्में जैसे-पूसा ज्योति, पूसा हरित, आल ग्रीन। मेथी की उन्नत किस्में जैसे-पूसा अर्ली बनचिंग व मेथी कसूरी किस्में 6-7 कटाई देती हैं। दोनों फसलों 100-200 क्विटंल प्रति एकड़ पैदावार देती हैं। उर्वरक एवं सिंचाई खेत तैयार करते समय 17 टन देसी खाद के साथ 2.7 बोरे सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा आधा बोरा यूरिया डालें। हर कटाई के बाद पालक तथा मेथी में आधा बोरा यूंरिया डालें। पालक के लिए 10 कि.ग्रा. बीज को 1 फुट दूर लाइनों में लगायें । पौधे के बीच 4-6 इंच का फासला रखें। सिंचाई प्रत्येक सप्ताह करें तथा दो बार खरपतवार निकालें। धनिया धनिया की प्रजाति पन्त हरितिमा, आजाद धनिया-1 की बुआई के अन्तिम पखवाड़े में वर्षा समाप्त होने पर कर सकते हैं। मूली मूली की एशियाई किस्मों की बुआई जैसे जापानी, व्हाइट, पूसा चेतकी, हिसार मूली-1, कल्याणपुर-1 की बुआई करें। बीज की मात्रा मूली का एक हैक्टर में बुआई के लिए 6-8 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है। अगेती मूली की एशियाई किस्मों की बुआई जैसे-जापानी, व्हाइट, पूसा चेतकी, हिसार मूली-1, कल्याणपुर-1 की बुआई करें। मूली का एक हैक्टर में बुआई के लिए 6-8 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है। चारे वाली फसलाें में आवश्यक सस्य क्रियाएँ बरसीम फसल सितंबर में लगी फसल , नवंबर से मई तक 4-6 कटाइयों में 300-370 क्विंटल हरा चारा देती है, जिसे पशु बड़े चाव से खाते हैं तथा अधिक दूध देते हैं। इसे हल्की खारी मृदा में भी उगाया जा सकता है। बरसीम की प्रजाति वरदान, मेस्कावी, टी-5, टी-26, टी-780 आदि की बुआई मध्य सितंबर से 30 नवंबर तक कर दें। बरसीम का 25-30 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। बुआई से पूर्व बीज को कल्चर से उपचारित करें। बरसीम की फसल की बुआई के समय 25 कि.ग्रा. नाइट्रोजन व 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस का प्रयोग करें। अगेती बोयी गयी चारे वाली फसलों की कटाई समय से करें। ग्वार, बाजरा, ज्वार, मक्का आदि चारे वाली फसलों में वर्षा न होने अथवा सूखे की स्थिति होने पर हल्की सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। बहुवर्षीय घासों में कटाई के पश्चात 30-40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर का छिड़काव अवश्य करें। पशुधन की आवश्यकतानुसार के लिये रोपी गई बहुवर्षीय नेपियर, गिनी, सिटेरिया की कटाई करें। वर्षा के जल की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहती है। इन घासों को स्वयं के ज्ञान के आधार पर अंतराल निर्धारित कर आवश्यकता पानी लगाएं और बराबर कटाई करते रहें। स्त्राेत : राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012, खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)।