<h3 style="text-align: justify;">आइपोमिया प्रजाति (बेल)</h3> <p style="text-align: justify;">अगस्त में गन्ने पर चढ़ने वाले खरपतवार यथा आइपोमिया प्रजाति (बेल) की बढ़वार होती है। इसे खेत से उखाड़कर फेंक दें अथवा मेटा सल्फ्यूरॉन मिथाइल 4 ग्राम प्रति हैक्टर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर, जब इसमें छोटे पौधे खेत में दिखाई पड़ें, प्रयोग करना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई </h3> <p style="text-align: justify;">वर्षा न होने की स्थिति में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। हल्की मृदा वाले क्षेत्रा में फसल को गिरने से बचाने तथा देर से फूटने व कल्लों को निकलने से रोकने के लिए वर्षा प्रारंभ होते ही पौधे की जड़ों पर अच्छी तरह मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। अगस्त में गन्ने को बांधें, ताकि फसल गिरने से बचे। फसल गिरने से उपज तथा गन्ने में शक्कर की मात्रा दोनों कम हो जाती हैं। अगस्त में पौध संरक्षण पर पूरा ध्यान दें, क्योंकि इस कीटों व रोगों के लगने का भय रहता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कीट व रोग</h3> <h4 style="text-align: justify;">गुरुदासपुर बेधक</h4> <p style="text-align: justify;">इस कीट का प्रकोप जुलाई से अक्टूबर तक रहता है। इसकी सूंडी ऊपर से दूसरी या तीसरी पोरी में गन्ना प्रवेश कर अंदर से गन्ने को खोखला कर देती है। इसकी रोकथाम के लिए गन्ने की सूखी पत्तियों को काटकर अलग कर देना चाहिए। एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन के अंतर्गत ट्राइकोग्रामा कीलोनिस के 10 कार्ड/हैक्टर की दर से 15 दिनों के अंतराल पर सायंकाल प्रयोग करना चाहिए। प्रभावी नियंत्रण के लिए जल निकास की व्यवस्था करें। </p> <p style="text-align: justify;">मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. एस.एल. 2.0 लीटर प्रति हैक्टर या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 1-1.5 लीटर प्रति हैक्टर 600-800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। कार्बोफ्यूरॉन 3 प्रतिशत सी.जी. 30 कि.ग्रा. या फोरेट 10 प्रतिशत सी.जी. 30 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">जड़बेधक कीट</h4> <p style="text-align: justify;">इस कीट की सूंडी का प्रकोप छोटे व बड़े दोनों ही पौधों पर पाया जाता है। इसकी सूंडी जमीन से लगे हुए गन्ने के भाग में छिद्र बनाकर घुस जाती है तथा डेड हार्ट बनाती है। इन मृतसारों से कोई दुर्गन्ध नहीं निकलती है तथा इसे आसानी से निकाला नहीं जा सकता है। इसकी रोकथाम के लिए कीट के अंड समूहों को इकट्ठा करके तथा प्रभावित तनों को जमीन से काटकर नष्ट कर देना चाहिए। तलहटी वाले खेतों में पेड़ी की फसल नहीं लेनी चाहिए तथा इमिडाक्लोरप्रिड 17.8 एस.एल. 350 मि.ली. अथवा क्लोरोपायरीफॉस 20 प्रतिशत ई.सी. 1.5 लीटर प्रति हैक्टर अथवा फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत धूल 25 कि.ग्रा. की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">पायरिला कीट</h4> <p style="text-align: justify;">इसका प्रकोप जुलाई से सितंबर तक रहता है। इस कीट का सिरा लंबा व चोंचनुमा होता है। इसके शिशु तथा वयस्क गन्ने की पत्ती से रस चूसकर क्षति पहुंचाते हैं। इस कीट के नियंत्रण के लिए अंड समूहों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिए। फसल वातावरण में पायरिला कीट के परजीवी एपीरिकेनिया मेलोनोल्यूका को संरक्षण प्रदान करना चाहिए। परजीवी कीट की पर्याप्त उपस्थिति में कीट की स्वतः रोकथाम हो जाती है। रासायनिक नियंत्रण के लिए क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 2.0 लीटर अथवा डाइक्लोरोवास 76 ई.सी. 375 मि.ली. अथवा क्लोरोपायरीफॉस 20 प्रतिशत ई.सी. 1.5 लीटर प्रति हैक्टर 600-800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">पत्ती का लाल धारी रोग</h4> <p style="text-align: justify;">इसका प्रकोप जून से सितंबर से फसल के अंत तक रहता है। गन्ने की पत्तियों पर लाल रंग की धारियां निचली सतह पर पड़ जाती हैं। अत्यधिक प्रकोप की दशा में पूरी पत्ती लाल हो जाती है। पत्तियों का क्लोरोफिल समाप्त हो जाता है तथा बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लाल सड़न रोग का प्रकोप जुलाई से फसल के अंत तक रहता है। ऊपर से तीसरी तथा चैथी पत्ती सूखने लगती है। इसके साथ ही पत्ती के बीच की मोटी नस में लाल या भूरे रंग के धब्बे पड़़ने लगते हैं। गन्ने को बीच से चीरने पर गूदा मटमैला लाल दिखाई पड़ता है, जिसमें से सिरके जैसी गंध आती है। गन्ने की पिथ में सपेफद अथवा भूरी रंग की फफूंदी भी विकसित हो जाती है। पत्ती में लाल धारी एवं लाल सड़न रोग की रोकथाम के लिए रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का ही प्रयोग करना चाहिए। यदि किसी बीज गन्ने के कटे हुए सिरे अथवा गांठों पर लालिमा दिखे तो ऐसे सैट का प्रयोग नहीं करना चाहिए। स्वस्थ बीज गन्ना की बुआई करनी चाहिए, जिसका बीज आर्द्र गर्म वायु उपचार (54 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 2.5 घण्टे तक 99 प्रतिशत आर्द्रता पर) विधि से पूर्वोपचारित किया गया हो। पौधशालाओं के लिए खेत के चयन में समुचित जल निकास की व्यवस्था सुनिश्चित कर लेनी चाहिए, ताकि वर्षा ऋतु में पानी का जमाव न हो सके। ट्राइकोडर्मा 2.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से 75 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए। स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स 2.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से 100 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और ऋषि राज सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली।</p>