<h3 style="text-align: justify;">ज्वार की फसल </h3> <h4 style="text-align: justify;">पौधे से पौधे की दूरी</h4> <p style="text-align: justify;">दाने के लिए ज्वार की फसल में विरलीकरण (थिनिंग) करके पंक्तियों में पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सें.मी. अवश्य कर दें।</p> <h4 style="text-align: justify;">टॉप ड्रैसिंग</h4> <p style="text-align: justify;">विरलीकरण का कार्य करने के बाद उन्नत/संकर प्रजातियों में 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से टॉप ड्रैसिंग बुआई के 30-35 दिनों बाद खड़ी फसल में छिड़क दें।</p> <h4 style="text-align: justify;"> असिंचित दशा </h4> <p style="text-align: justify;">असिंचित दशा में 2 प्रतिशत यूरिया का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना अत्यंत लाभप्रद पाया गया है।</p> <h4 style="text-align: justify;">तना मक्खी</h4> <p style="text-align: justify;">तना मक्खी, ज्वार का एक प्रमुख कीट है। इसका प्रकोप पौधों के जमाव के लगभग 7 से 30 दिनों तक होता है। कीट की इल्लियां उगते हुए पौधों की गोफ को काट देती हैं, जिससे शुरु की अवस्था में ही पौधे सूख जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरॉन 3 जी बुआई के समय 20 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से कूंड़ों में डालना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">बाजरा </h3> <h4 style="text-align: justify;">बुआई</h4> <p style="text-align: justify;">बाजरा की बुआई इस माह के प्रथम पखवाड़े तक पूरी कर लें। बुआई के 15-20 दिनों बाद विरलीकरण करके कमजोर पौधों को निकालकर पंक्ति में पौधों के आपस की दूरी 10-15 सें.मी. कर लेनी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">यूरिया की टॉप ड्रैसिंग</h4> <p style="text-align: justify;">संकर/उन्नत प्रजातियों में 85-108 कि.ग्रा. यूरिया की टॉप ड्रैसिंग/हैक्टर की दर से करें। बाजरे की फसल में फूल आने की स्थिति में सिंचाई करना लाभप्रद होता है। वर्षा न होने की स्थिति में 2-3 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पौधों में फुटान होते समय, बालियां निकलते समय तथा दाना बनते समय नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">जल प्लावन</h4> <p style="text-align: justify;">बाजरा जल प्लावन से भी प्रभावित होता है। इसलिए ध्यान रहे कि खेत में पानी इकट्ठा न होने पाये।</p> <h4 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण के लिए 1.0 कि.ग्रा. एट्राजिन/हैक्टर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव बुआई के बाद तथा अंकुरण से पूर्व करते हैं। इसके साथ-साथ 20-40 दिनों के अंदर एक बार कसोला या खुरपी से खरपतवार निकाल दें।</p> <h4 style="text-align: justify;">तनाछेदक कीट एवं नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">मण्डुआ, झंगोरा, रामदाना, कुटू की फसल में तनाछेदक कीट का प्रकोप होता है। इनके नियंत्रण के लिए क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. की 20 मि.ली. दवा प्रति नाली की दर से 15-20 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">तनाछेदक कीट से बचाव के लिए कार्बेरिल 2.5 मि.ली. दवा का घोल प्रति लीटर 500 लीटर पानी में मिलाकर या लिन्डेन 6 प्रतिशत ग्रेन्यूल अथवा कार्बोफ्रयूरान 3 प्रतिशत ग्रेन्यूल 20 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से छिड़काव करें। 8 ट्राइकोकार्ड प्रति हैक्टर लगाने से भी इसकी रोकथाम की जा सकती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">मक्का </h3> <h4>बुआई व टॉप ड्रैसिंग</h4> <p style="text-align: justify;">मक्का में बुआई के 40-45 दिनों बाद 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से दूसरी व अन्तिम टॉप ड्रैसिंग नमी होने पर नर मंजरी निकलते समय करनी चाहिए। मक्का में बाली बनते समय पर्याप्त नमी होनी चाहिए अन्यथा उपज 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">सिंचाई व जल निकास</h4> <p style="text-align: justify;">सामान्यतः यदि वर्षा की कमी हो, तो क्रांतिक अवस्थाओं (घुटने तक की ऊंचाई वाली अवस्था, झंडे निकलने वाली अवस्था, दाना बनने की अवस्था) पर एक या दो सिंचाइयां कर देनी चाहिए, जिससे उपज में गिरावट न हो। सिंचाई के साथ-साथ मक्का में जल निकास भी अत्यंत आवश्यक है। यदि मक्का मेड़ों पर बोई गई है, तो खेत में जल निकास का समुचित प्रबंध होना चाहिए।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>खरपतवारों का प्रकोप एवं नियंत्रण</h3> <p style="text-align: justify;">खरीफ के मौसम में खरपतवारों का प्रकोप ज्यादा होता है, जिससे 50-60 प्रतिशत उपज में गिरावट आ सकती है। इसलिए मक्का के खेत को शुरू के 45 दिनों तक खरपतवारमुक्त रखना चाहिए। खरपतवारों के प्रबंधन के लिए 2-3 निराई-गुड़ाई खुरपी, हैंड-हो या हस्तचालित अथवा शक्तिचालित यंत्रों से खरपतवारों को नष्ट करने से मृदा में पड़ने वाली पपड़ी भी टूट जाती है और पौधों की जड़ों को अच्छे वायु संचार से बढ़वार में मदद मिलती है। खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए एट्राजिन की 1-1.5 कि.ग्रा./हैक्टर मात्र का छिड़काव करके भी नियंत्रित किया जा सकता है। एट्राजिन की आवश्यक मात्र को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के बाद परंतु जमाव से पहले छिड़क देना चाहिए।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और ऋषि राज सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली।</p>