<h3 style="text-align: justify;">सिंचाई की सुविधा</h3> <p style="text-align: justify;">धान की फसल के लिए सिंचाई की पर्याप्त सुविधा का होना बहुत ही जरूरी है। धान की फसल को खाद्यान्न फसलों में सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। फसल को कुछ विशेष अवस्थाओं में जैसे-रोपाई के बाद एक सप्ताह तक कल्ले फूटते समय (ब्यांत), फूल निकलते समय, बाली निकलते समय तथा दाना भरते समय खेत में 5-6 सें.मी. पानी खड़ा रहना अति लाभकारी होता है। फूल खिलने की अवस्था पानी के लिए अति संवेदनशील है। अनुसंधान के आधार पर यह पाया गया है कि धान की अधिक उपज लेने के लिए लगातार पानी भरा रहना आवश्यक नहीं है। इसके लिए खेत की सतह से पानी अदृश्य होने के एक दिन बाद 5-7 सें.मी. सिंचाई करना उपयुक्त होता है। यदि वर्षा के अभाव के कारण पानी की कमी दिखाई दे, तो सिंचाई अवश्य करें। खेत में पानी रहने से फाॅस्फोरस, मैंगनीज तथा लौह पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है और खरपतवार भी कम निकलते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि कल्ले निकलते समय 5 सें.मी. से अधिक पानी ज्यादा समय तक खेत में भरा रहना भी हानिकारक होता है। जिन क्षेत्रों में पानी भरा रहता हो, वहां जल निकासी का प्रबंध करना बहुत आवश्यक है, अन्यथा उत्पादन पर कुप्रभाव पड़ेगा। सिंचित दशा में खेत में निरंतर पानी भरे रहने की दशा में खेत से पानी अदृश्य होने की स्थिति में एक दिन बाद 5-7 सें.मी. तक पानी भर दिया जाए, तो इससे सिंचाई के जल में भी बचत होगी।</p> <h3 style="text-align: justify;">विशेष सस्य क्रियाएं</h3> <p style="text-align: justify;">कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण धान की रोपाई देर से की जाती है। कई बार ऐसा देखा गया है कि वर्षा बहुत अधिक हो जाती है या वर्षा का आगमन देर से होता है। इन परिस्थितियों में जलभराव के कारण समय पर रोपाई सम्भव नहीं हो पाती है। उपरोक्त दशा में कुछ विशेष सस्य क्रियाओं को अपनाया जाए, तो पुरानी पौध के प्रयोग से धान की अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। रोपाई की दूरी घटा देनी चाहिए, जिससे प्रति इकाई पौधों की संख्या बढ़ जाए। ऐसी दशा में धान की रोपाई के लिए पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे की दूरी 20×10 एवं 15×10 सें.मी. होनी चाहिए और प्रति स्थान पर 3-5 पौधों की रोपाई करें। धान की देर से पकने वाली प्रजातियों की रोपाई इस माह बंद कर दें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="184" height="161" /></p> <h3 style="text-align: justify;">मेड़बन्दी</h3> <p style="text-align: justify;">खेतों की मजबूत मेड़बन्दी करें, ताकि वर्षा का पानी खेत से बाहर न निकलने पाए पाए, पछेती प्रजाति के रोपाई वाले खेतों में जिन जगहों पर पौधे मर गए हों, वहां उसी प्रजाति की नये पौध की दोबारा रोपाई करें और खेत में पानी का स्तर 3-4 सें.मी. बनाएं रखें।</p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरक प्रबंधन </h3> <p style="text-align: justify;">धान में इस समय उर्वरक प्रबंधन महत्वपूर्ण होता है। रोपाई के 25-30 दिनों बाद, अधिक उपज वाली प्रजातियों में 65 कि.ग्रा. यूरिया या 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर कल्ले निकलते समय तथा नाइट्रोजन की इतनी ही मात्रा की दूसरी व अन्तिम टाॅप ड्रैसिंग रोपाई के 50-55 दिनों बाद पुष्पावस्था पर करनी चाहिए। सुगंधित प्रजातियों में 33 कि.ग्रा. यूरिया या 15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से टाॅप ड्रैसिंग कर दें। यदि खेत में जिंक की कमी के लक्षण हों, तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का 0.25 प्रतिशत बुझे हुए चूने के घोल के साथ 2-3 छिड़काव 15-20 दिनों के अंतराल पर करें। जिन क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई की जाती है, वहां यदि पौधों में लौह तत्व की कमी 0.5 प्रतिशत पेफरस सल्पेफट का घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">खरपतवारों का नियंत्रण</h3> <p style="text-align: justify;">खरपतवार, फसल से पोषक तत्व, सूर्य का प्रकाश, नमी तथा स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे धान की फसल को कापफी नुकसान होता है और उत्पादन में गिरावट आती है। सीधे बोई गई धान में रोपाई की गई धान की तुलना में अधिक नुकसान होता है। पैदावार में कमी के साथ-साथ खरपतवार धान में लगने वाले रोगों के जीवाणुओं एवं कीटों/रोगों को भी आश्रय देते हैं। कुछ खरपतवारों के बीज धान के बीज के साथ मिलकर उसकी गुणवत्ता को खराब कर देते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">फसल से पूरी उपज प्राप्त करने के लिए खरपतवारों का समय से नियंत्रण बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। खरपतवारों को प्रतिरोपण के बाद 20 से 40 दिनों में नियंत्रित कर लेना चाहिए। खरपतवार प्रबंधन एकीकृत तरीके से करना चाहिए। धान के खेतों में खरपतवारों नियंत्रित करने के लिए जल प्रबंधन हमेशा से ही एक प्रभावी और उन्नत विधि रही है। जिस खड़े हुए पानी में धान के पौधे का रोपण किया जाता है, वह खरपतवार की वृद्धि को दबाते हैं। जलभराव के कारण खरपतवारों की जड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचती है, जिसके कारण खरपतवारों की संख्या में कमी आती है। रोपित धान की पफसल में सारणी-1 के अनुसार खरपतवारनाशी में से किसी भी दवा का प्रयोग किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और ऋषि राज सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली।</p> <p style="text-align: justify;"> </p>